री काशी सस्त मन्थमाला २०६

जदि भिति

अरड्ञरसवेख

4. जयरथकरत “विमरशिनी' सहित ) <

नाका + = +

{^

9 व्याख्याकार

डो० रेवाप्रसाद द्विवेदी

| |. |

वाश्रीः॥ काशी संस्कृत ग्रन्थमाला ९०६ |

ददप राजानक-रुय्यक-सङ्कफषिरचितं | >। | अरङ्ारसवंखम्‌ जयरथछृत “विमरिनी' समुपेतम्‌ एतदुभय-टिन्दीमाष्याज्वादभ्बूषितं

हिन्दीभाष्यानुवादकारः ई०्रेवाप्रसाद्‌ ह्िवेदो एम. ए., पी-एच. डी., साहित्यराखाचायः काशीहिन्दूविडवविद्यालयस्य प्राच्यविद्याधमविन्ञानसंकाये साहित्यविभागाध्यक्षः

९६.७१

भ्रकाडक :

मद्रक संस्करण

मूल्य

चौखम्बा संस्कत सीरीज याफिस, वाराणसी

: विद्याविलास त्रेस, वाराणसी

; प्रथम, वि० संवत्‌ 4 | 9 नि:

©) चौखम्बा संस्छृत सीरीज आष गोपाल मन्दिर तेन पो बा० ठ, वाराणसी-१ ( भारतवषे) फोन :-82१५४५

प्रधानत शाखा चौखम्बा विधाभवन चोक, पो० बा० ६६, वाराणसी-? फोन : ६३०७६

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भिका

अरुंकारोऽस्िति सवेस्वसिदं यस्य महेशितुः शक्ति विमरिनीं तस्य वन्दे रत्नाकरोउञ्वखास्‌

'अलंकारसवस्व' संस्कृत कौ साहित्यविद्या के प्रमुख अंग अलंकार पर आधित एक प्रतिनिधि प्रन्थ है। भरत से जगन्नाथ तक हुए अलंकार चिन्तन की यह्‌ तामिह, सिद्धान्तभूत प्राचीन चिन्तन तो इसमे अपने स्वस्थ तथा वेज्ञानिक रूप में निहितः है ही, परवर्ती अनुवीक्षा ओर समीक्षाके लिए भी यहु मेरुदण्ड रहाहै। इसप्रकार इख ग्रन्थ के अनुज्ीलन के बिना भारतीय अलकार-बोध सुप्रतिष्ठ नहीं माना जा सकता,

$

] ग्रन्थ स्वरूप अलंकारसवंस्व ठीकवेसा हीनामदहै जेसा "वक्तोक्तिजीदित' या मुक्तावली" कन्तक का मुलग्रन्थ कारिकाबद्धदहै ओर उसका नाम काव्याल्ङ्कार' है। वक्रोक्ति जीवित संज्ञा उसको व्याख्या को दी गईहै। विह्वनाथका न्यायम्रन्थ भी सूरतः कारिकात्मक है ओर उसका नाम कारिकावलि' है। मुक्तावलि उसकी वृत्तिका नाम है किन्तु ग्रन्धप्रसिद्धि वृत्तिकेनामसेहीरहै। अलंकारसवंस्व कीभी यही स्थिति है। इसके तीन भाग हे सूत्र, वृत्ति ओर उदाहरण \ इनमे सूत्र भागकानाम है अलङ्कार सूत्र' ओर शेष दोनों भागों का नाम है अलंकारसवेस्व'। किन्तु स्थिति यहहैकि रोताल्दियों पहले से हम केवल (अलंकारसवस्व' नामसे ही जानते रहै है।ः ] श्रन्थ सस्करण अलंकारसवंस्व अनेक बार प्रकाशितो चुकाहै। इसके संस्करणोंकी तालिका यह दे- १. देखिए इसी भूमिका मे दिया अलेकारों का इतिहास रस्त आदिकेचक्एिभी यह्‌ म्रन्थ उत्तम सामभ्री प्रस्तुत करतादहे। २. जयरथ, विद्याधर, विद्यानाथ, विदवनाथ, भटुगोपाल, मल्लिनाथ, कुमारस्वामी,

अप्पयदीक्षित, वीरराघव आदिने सूत्र ओर वृत्ति दोनोंको अलंकारसवंस्व नामे वुकारा है विश्लेष विवरण के च्िए

दरषव्य म० म० काणे तथा ° सुशील्कुमारडे के प्रऽ०ा$ 2 381ता1 706८8 तथा रामचन्द्र द्विवेदी कौ अलंकारमीमांसा

(9.

प्रकाडक संस्करण सन्‌ स्वरूप संपादक संशोधक १. निणंयसागर, बम्बर प्रथमः १८९३ विमटिनीसहित म.म. दुर्गाप्रसाद द्विवेदी द्वितीय १९३६ पं०्गिरिजाप्रसाद द्विवेदी २. अनन्तशयन प्रमा. प्रथम १९१५ समृद्रवंधी टी.स. के. साम्बरिव शास्त्री त्रिबरेन्द्रम केरल द्वितीय १९२६ 5 ३. शारदा प्रंथमाला, कारी प्रथम १९२६९ मूलमात्र पं० गौरीनाथ पाठक ४. मोतीलाल बनारसीदास, प्रथम १९६५ हिन्दी अनुवाद डो. रामचन्द्रे द्विवेदी कारी तथा संजीवनी ५. मेहरचन्द्र ठक्ष्मणदास, प्रथम १९६५ संजीवनी संपा० डा० कु° जानकी दिल्ली संरो० डा. वे. राघवन्‌

[ २३ ] ग्रन्थकार इन सभी संस्करणों में च्रिवेन्द्रमसंस्करण को छोड अन्य किसी संस्करण में ग्रन्थकार का नाम नहीं मिक्ता चरिवेन्द्रम संस्करणमे इसे मंखकी कृति बतलाया गया है। मंखपरम्परा--त्रिवेन््रम के इस संस्करणमें छपी टीका में आरम्भके मंगल पयो मे- कदाचिन्मडखुको पक्त काञ्यारकारटन्तणम्‌ प्रद्श्यं रविवर्माणं प्राथंयन्त विपरश्चितः॥

गम्भीरं नस्तितीषृंणां मङ्खुकमन्थसागरम्‌ नौरस्तु भवतः प्रज्ञा स्थेयसी यदुनन्दन

इस प्रकार मंखको ही ग्रन्थकार कहा गया दहै प्रन्थ के अन्तमं भी वृत्ति की पुप्पिका इति मंघुको वितेने कश्मीरक्तितिपसान्धिविग्रहिकः। सुकविञ्युखालङ्कारं तदिद्मलंकारसवंस्वम्‌ दस प्रकार मंखकोही सवंस्वकार बतलाया गया है, भौर समूद्रबन्ध की अपनी व्याख्या के अन्तम भी- 'मडखुकनिवन्धविबृतौ विहितायामिह समुद्र बन्धेन गुणलेक्रमात्रमित्रेभविषीष्टादोषदर्दिभिः सद्धिः॥'

इस प्रकार इस संस्करण मे वृच्यनूप्रास के लिए उदाहृत (आटोषेन' पद्य [ प° ६२] के पहुले मदीये श्चरीकण्डचरिते" भी छखिखा मिलता है। श्रीकण्डचरित के रचयिता मंखहीरै ओर उनके इस काव्य में यह्‌ पद्य है [ द्र° सगं पद्य ४९|| १. इस संस्करण के आधार पर १९०८ ई० मेँ एच. जेकोवी ने अटंकारसवंस्व का जमंनी भाषा में अनुवाद भी किया था।

५.9

ग्रन्थारम्भे-मंगल-पद्य (नमस्कृत्य ०" के उत्तराध में इस संस्करण मे "गुवंरंकार ०” पाठ ही अपनाया गया है, यद्यपि टीकामें गुरुशब्द की व्याख्या नहीं को गई है। स्मरणीय है जयरथ आदि ने यहाँ गुवंलंकार' के स्थान पर निजालंकार० पाठ माना है इस प्रकार केरलीय पाठ के अनुसार अकुंकारसवंस्व के रचयिता मंदुक या मंख है|

खय्यक-स्चकृ-परम्परा--जयरथ ने विमर्शिनी में गुवंलंकार' के स्थान पर निजालंकार' पाठ माना है उन्होने काव्यप्रकाशसंकेतं [ प° ३७२ ] ओर अलंकारा- नुसरिणी ( ११८, १९२, १९९ ) को ग्रन्थकार की अन्य कृति कहा है काव्यप्रका- संकेत के आरम्भमे- “ज्ञात्वा श्रीतिखकात्‌ सवांरूकारो पनिषद्रसम्‌ काव्यग्रकासंकेतो स्चकेनेह लिख्यते इस प्रकार सुचक को उसका कर्ता माना गयादहै ओर स्तुतिकूसुमांजलि ८।१९ पद्य की टीका में रत्नकण्ठ ने अटंकारानुखारिणी को रुचक की कृति कहा है रुचक र्प्यक का ही दुसरानाम हे। श्रीविद्या चक्रवर्ती ने अलंकारसर्वंस्व पर जो संजीविनी टीका लिखी है उसमे- “सूचकाचार्यो पञ्चे सेयमरूंकारसर्वंस्वे 1 संजीविनीति रोका श्री विद्याचक्रवत्तिना क्रियते ` [ संजीविनीसंगर | (इत्थं भूम्ना सचकवचसां विस्तरः ककशोऽयस्‌' [ अन्त-मंगरू | इस प्रकार रुचक या रष्यक को ही अलंकारसवंस्व का रचयिता मानाहै।

पिनेल द्वारा संपादित सहूदयलीलाः मे उसके रचयिता को-- क्तिः श्री विपद्‌ वर्‌-राजानक-तिरूकात्मज-श्री मदारकारिकःसखमाजा्रगण्य- श्री राजानक-रुय्यकस्य राजानक-ख्चकापरनाम्नोऽलङ्कार सवं स्वक्रतः इस प्रकार रुग्यक, स्चक ओर अरंकारसवस्वकार कहा गया है उभयपरम्पशा- अप्पयदीक्षित ने चित्रमीमांसा के उपमाप्रकरणमे इटेष को अन्यअरंकारों का बाधक बतराते हुए--

(उपमाप्रतिमानेऽपि तस्प्रतिभोत्पत्तिहेतः श्टेष एव, नोपमेति मङ्खकादिभिरभ्युषेयते ` इस प्रकार इस मत का उपस्थापक संखको मानादहै। यह्‌ मत अलंकारसवंस्व की

वृत्तिम आताभीदहि। इसीके साथ अपह्ुति ओर व्याजोक्ति के अन्तर पर प्राचीन आचार्यो के मत उपस्थितं करते हृए-

१. काव्यप्रकाश संकेत कै किए द्रष्टव्य--डं० रामचन्द्र द्विवेदी का काव्यप्रकाश अंग्रेजी अनुवाद--न1७ ?०७१० 1. भाग-२ परििषट-डी°

२. संजीविनी : डा °रामचन्द्रहविवेदी तथा डँरजानकोदा रा पृथक्‌ पृथक्‌ संपादित

३. सहदयलीला नि° सा० पाठके लिए देखिए इसी म्रन्थ का परिशिष्ट-१।

४. चिच्रमीमांसा सं° प° कालिकाप्रसाद शुक्छं पृ० ५६।

^+ =

अत्रेदमपह्वतिकथनं व्याजोक्त्यरूंकारं पएथगनङ्गीकवंताम्‌ उद्धगदीनां मतमनु्धव्य ये त॒-“उद्धि्नवस्त॒निगृहनं ्याजोक्तिरिति ` व्याजोक््यरंकारं प्रथगिच्छन्ति तेषा- मिहापि ग्याजोक्तिरेव नापद्‌चुतिरिति इचकाद्यः ।` इस प्रकार वे मलंकारसवंस्वकार को रुचक भी कहते हैँ स्पष्टही अटंकारसवंस्व के कत्रंत्व के;विषयमें रुय्यक ओर मंखको छोड अन्य के नामकी परम्परा नहींदै। आगे अने वले विवरणसेस्पष्टटहै कि रुथ्यक आर मंख दोनों ही कदमीर के निवासीर्है। प्रन उव्ताहै कि सवंस्व का टेक इन दोनों मेंसे किसे स्वीकार किया जाए उत्तरम विचारो केदो बन जाते है। एक उनका जौ केवल रुयक को सूत्र ओर वृत्ति दोनों का रचयिता मानते ओर दूखरा उनका जो मंख को इन दोनों में प्रथम का प्रवत्तन निणयस्ागरीय संस्करणसे होता है ओर द्वितीय का त्रिवेन्द्रमसंस्करणसे।* काणे, डंडे, रं राघवन्‌, सेठ कन्हैयालाल पोहार, रामचन्द्र द्विवेदी, जानकी तथा अन्य अनेक विदान्‌ स्य्यक कै पक्षमेरहैँ। मंख का पक्ष च्रिवेन्द्रमसंस्करण के परचात्‌ कदाचितु पहली वार हमने ही च्या है अपने व्यक्तिविवेक ओर उसके व्याख्यान के हिन्दीभाष्य की भूमिका मे इस प्रकार विद्वानों का बहुमत रय्यक के पक्षमेदहे। रु्यकवादी उक्त विद्वानों के भिन्न-भिच्न तर्को का मुरु आधार जयरथ है ओर सार यह- | स्थापना--कड्मीरी गौर दक्षिणी परम्परा में करमीरी-परम्परा ही मान्य है क्योकि

तिः ~ + 0 ~ पणि णि

१. अङंकारसवस्व व्याजोक्ति सूत्र--७७ ६५२

२. चित्रमीमांसा- प° २४२।

आगे इस सूत्र पर कुछ ओर भी निष्कर्णां की कल्पना की गई है।

३. "काणे" तथा ड" 15107 91. ०९68. डँ राघवन्‌ 'कु० जानकी के भलंकारसवंस्व का पए०ए०त, पहार जी--संस्छतसाहित्य का इतिहास भाग-१ पृ १७९१, ° रामचन्द्र द्विवेदी अलंकारमीमांसा-परिचयखण्ड तथा संजीविनी सहित स्पे उनके अक्कारखवस्व की भ्रुमिका, डं० कु° जानकी-- संजीविनी सहित छपे उनके अल्कारसवंस्व की भूमिका पृ० ३।

इनमें से ग्रन्थकार कै नाम की समस्याको पोहारजी ने वडीही सफाईके साथ उपस्थित किया है किन्तु उन्होने यह भी लिखि दिया है कि पण्डितयाज जगन्नाथ भो श्यककानामच्ते है, जबकि तथ्य यह्‌दहैकि पण्डितराज केवल ग्रन्थ कानाम्‌ ठेते हैँ सवस्वछ्ृतु" अथवा “अलंकारघरवंस्वज्ृत्‌" भादि

7

&

तक-( ) करमीरी परम्परा करमीर की है जहाँ ग्रन्थ लिखा गया

(२) करमीरी) परम्परा पुववर्ती है क्योकि जयरथ समुद्रबन्ध से

पूववर्ती हैं

(३) क्मीरी परम्परामें मतभेदनहींहै, जबकि दक्षिणी परम्परा में मतभेदं दक्षिणके ही विद्यानाथ, कुमारस्वामी, मल्लिनाथ आदि सवंस्वकार के रूप में रुय्यक या रुचक का नाम उद्धृत करते हैँ इस प्रकार दक्षिणी विद्वानों मे भी बहुमत रय्यक काही है

करमीरी परम्परा मे सम्यक ही ग्रन्थकार के रूप मे प्रसिद्ध है,

अतः सुग्यक को ही अलकारसवस्व का रचयिता माना जाना चाहिए इन्हीं तकोंके समथेनमें इन विद्वानों ने सहदयलीला कौ पूर्वोदधत पुष्पिका को

भी उद्धृत किया है। इषमेस्पष्टही स्य्यकको अलंकारसवेस्व का रचयिता माना

गया ह्‌

| ~ अलंकारसवेस्व कै कतृत्व के विषय में मुख्य प्रदन यह नहीं है कि रु्यक

इसके कर्ता हैँ या नहीं, क्योकि उनके कृत्व में विवाद नहीं है मुख्य प्रन यह्‌ है कि इसके साथ मंखका नाम व्यो जुड़ा सेठ कन्हैयालालजी, पोदहार, डं० काणे ओर डां० द्विवेदी ने मंख के समथन में केवल इतना ल्खाहै कि मंखने रु्य्यकके बाद उनकी वृत्तिका परिष्कार किया होगा ओौर उसमे अपने श्रीकण्ठचरित कै पद्यभी मिला दिए होगे इसी आधार पर उनकी प्रसिद्धिहो गई होगी प्रसिद्धि भी केवल कोलम्बोके राजघरनेमें हूर, क्योकि मंख भी राजमन्त्री ये ओर समुद्रबन्ध भी। अवद्यही करमीर के राजपरिवार का दक्षिणी राजपरिवारोंसे संबन्ध रहा होगा हमारा त-

वस्तुतः सूत्र के रचयिता रुय्यक हँ ओर वृत्ति के मख इसमें प्रमाण हैँ अप्पयदीक्षित केवे दोनों वाक्य जिनमेंसे एक में उन्होने रुचक का उल्लेख किया ओर दूसरे मे मंखका। ध्यानदेने कीबात यहुदहैकि जिससंदभभमें रुय्यककानामल्ादहै उसमें सूत्रभी दिया हुभाहै ओौर जिस संदभंमें केवल मंखका नाम जिया है उसमे

सिद्धान्त

सूत्र का उद्धरण नहीं है" ! "उद्धिच्चवस्तुनिगहनं व्याजोक्तिः यह अल्कारसवंस्वमेंही

१. छपी चित्रमीमांसा में ^चकादयः' पद नापन्लुतिरिति सुचकादयः' इस प्रकार अन्तमे छपा दहै)

इस प्रकारके पाठसे एसा लगने लगता रै कि 'उद्धिच्ववस्तु' सूत्र श्चक कानहींहै जब कि यह सूत्र सवेस्वकारही। इसकी टीकासुधा सूत्रको रय्यककी ही कृति वतलाती है। प्रसंग भीएेसा है जिसमें पहर उद्धटकामतदिया है शौर बाद में दण्डी का सत तदनुसारयथेतु रुचकादयः' पाठ ही जमताहै यदि “रुचकादयः' अन्त मे आए तन भी यह तो उससे सिद्धहो ही जाता है कि अप्पयदीक्षित सुत्रकार को वृत्तिकारसे भिन्न मानते है

(1 = १/1

(4

आया सूत्र है। अतः दीक्षित जी को सूत्र का उल्लेख करते समय रुचक कानामलेना, {~ जो आवश्यक दिखता है उखका रहस्य, ओर हो क्या सकता टै इसके अतिरिक्त कि सूत्र ` के कतूत्वमे संदेह नहो वेष का विचार केवल वृत्तिमें हुदै भौर उसीमेंइटेष को | अन्य अलंकारो का बाधक माना गयादहै। दूसरे स्थल में इटेष की यह्‌ स्थिति उपस्थित करते समय दीक्षित जीने मंख का नाम लिया इसका भी एकमात्र यही अथं हौ सकता | टै कि वे वृत्ति का निर्माता मंख को मानते 1 |

|

डों० ओर म० म० काणेने दक्षिण भारत के कुछ पाण्डुग्रन्थों का भी संदर्भ दिया है, जिनमें वृत्ति के मंगटपद्य के उत्तराधं के निजालंकारसूत्राणां' पाठके स्थान पर ` 'गुवंलंकारसूत्राणां' पाठ ही मिलता है, जैसा कि त्रिवेन्द्रमसंस्करण में समूद्रवन्धने | माना हि।

श्रीविद्याचक्रवर्ती नेभी पुनरुक्तवदाभास के उदाहरणोंको मंखका मानादै। | वृत्ति में मख के निम्नलिखित पद्यभी उद्धत हँ २।४९, ५।२३, ६।१६,७०, १०।१०

मद्रास राजकीय संस्छृतपाण्ड्म्रन्थागार मे भमंखुकसूत्रोदाहरणः नाम का एक स्वतन्त्र ग्रन्थ भी रक्षित है

तुगभद्रने भी संखकोही सवस्वकार स्वीकार किया दहै ।"

इस प्रकार मंखके पक्षमें भी दक्षिणी विद्वानों का मत अत्पमत नहींदहै।

अलंकारसवंस्व के जो सूत्र है उन्हें अवदय ही ग्रन्थकार ने पहले ही बना लिया है) वृत्ति लिखने कै पूवं उनको भी ग्रन्थकार ने अवश्य ही कोई नाम दिया होगा यह्‌ नाम अटंकारसूव्र ही होगा, क्योकि वृत्तिके मंगपद्य में अलंकारसूत्र ही नाम आता है ओर स्वयं सूत्रकार अन्तिम सूत्रम अलंकाराः संक्षेपतः सूत्रिताः इस प्रकार “अरकार- सूत्र" नाम कासंकेत देते हँ समुद्रवन्ध कीजो टीका मंघयुक कानाम लेकर चलतीहे वहु भी पाठान्तरम “समाप्तं चेदमलंकारसवंस्वम्‌, कृती राजानकश्चीरुचक्रस्य श्‌ इति मुः" इस प्रकार मंघुक के साथ रुचक काभीनाम प्रस्तुत करतीदै। अवश्य ही इसमें सूत्रकार रुथ्यक को ओर वृत्तिकार मंखको मानने का अभिप्राय निहति है।

~ ------~ --~-- - --- ---~~~--~

१. येतु उद्धि° स्चकादयः' का “चकादयः' शब्द ये तु स्चकादयः' होना चाहिए किपिकार से यह शब्द चुट गया होगा ओर उसे इसे पाण्डप्रति मे पादवंभागमें लिख रला होगा संपादकने इसे यथास्थान नहीं रा यदि इसे स्वयं अप्पयने हौ इसी प्रकार छिखाहोतो उससे भीस्पष्टहैकिवे वृत्तिकार को सूत्रकार से भिन्न मानते है।

२. देखिए इलोक सूची, बथवा पृ ६२, ३१७, ३२७, ३२७, ३२७

३. पाण्डरप्रति ऋ० २९७० द्र० कु० जानकी अलकारसवस्व भूमिका प° २।

४. द्र° संजीविनी सं° डँ° हिवेदी प° २४ भूमिका)

( -१९ श्र

जहां तक समुद्रवन्ध के समयकाप्रस्नरहैवेभी उसी शती के है जिसके जयरथ दोनों में जयरथ १३ वींशतीके आरम्भ केँ ओर समुद्रबन्ध उसके मध्यके। अतः समय का भी अन्तर बहुत नहीं पडता

जहां तक कडमीर का सम्बन्ध है करमीरी ग्रन्थों के विषयमे उसी देश की परम्परा को महत्व देना अवश्य हौ तकसंगत है, किन्तु यह्‌ तब संभव है जब करमीर के विद्वान्‌ निष्पक्ष हों उनमें परस्पर में अत्यन्त कलह है जयरथ के पहले शोभाकरनते, जो करमीर के ही है, अपने अलकार-रत्नाकर मे अलंकारसर्वस्व को उसके सूत्र ओर वृत्ति दोनों रूपों. में {पदे पदे उद्धृत किया, किन्तु ग्रन्थकार कानाम एक बारभूरसेभी नहीं लिया स्वयं जयरथ ने रत्नाकर को पर्याप्त मात्रा में उद्धृत करिया, किन्तु शोभाकर का या उनके ग्रन्थ रत्नाकर का नाम नहींलिया। केवल नाम का उल्लेख नहीं क्रिया, आक्षेप भी क्रियादहै। कदाचित्‌ उसी की छाप पण्डितराज पर पडीरहै ओर वे अप्पयदीक्षित पर वरसते दिखाई देते ह।

इन सवके परमगुर्‌ अभिनव भी गाली देकर बात करते ओौर पूव पक्षके साथही नही, मूलग्रन्थ के साथ भी अन्याय करते हैँ कहीं उनकी बुद्धि उल्ट भी जाती है ।१

करमीरी परम्परा से अधिक दाक्षिणात्य परपरा ही मान्य है, क्योकि दक्षिण में यह्‌ देष नहीं था। क्या कारण है किं महिमभेदट्र का व्यक्तिविवेक कश्मीर में नहीं मिला ओर दक्षिणमेंही मिला क्याकारण है कि साहित्यमीमांसा की पाण्डुप्र्ि भी दक्षिण भारतमदही मिलो क्याकारण है कि कडमीर भटुनायक के ध्वनिविरोधी मन्थो की रक्षा नहीं सका हुदयदपंण, ध्वनिनिणंय अवव्यही नष्ट करा दिए गए हृदय- दपण तो महिमभटूकोभी नहींमिलाथा, जौ मम्मट के पहलेकेह। स्वयं मम्मट ने यहच्ष्टाकीदहै कि यह समज्ञमेंन आए कि उनने कन्तक ओर महिमभटुसे भी कुछ लिया है जब कि उनका सप्तम उत्कास महिमभदुकी हीदेन है। क्या यह्‌ क्रम स्वस्थ क्रम हे अवश्य ही करमीर में महिमभटुके व्यक्तिविवेक के द्वितीय विम्ंको मम्मटने दफनादियाथा। उसकीरक्षाका श्रेय दक्षिण को हीदहै। यह्‌ भी सोचने कीवातदहैकि अलंकारो पर सवंस्व, रत्नाकर ओौर विमशिनी में बिखरी सामम्रीको लेकर क्या कोई कायं करमीर मे नहीं हो सकता था, जिसे दक्षिणी आचाय अप्पयदीक्षित ने पूरा किया जिनकी मृलविद्या मीमांसा थी करमीरी शेवशाख्र की शुद्धपरम्परा भी दक्षिण में ही रक्षित मिलती है श्रीविद्याचक्रवर्ती, च्रिपुरारहस्य के [टीकाकार दीक्षित श्रोनिवासब्ुध दक्षिणकेहीरहैं। इसप्रकार परम्पराकी टषटिसे कदमौीर की अपेक्षा दक्षिण ही अधिक मान्य दहै

यहु भी एक महत्व की बात है किं अप्पयदीक्षित की परम्परा केवर दक्षिणी परम्परा नहींदहै। वे काशी मेभीरहेधे। अतः उनके संस्कारों में अन्तर्वेदी की

१. हमने अपने ग्रन्थ आनन्दवधन' मे इन सब दोषों का प्रतिपादन किया है।

~ _ षि नि ~ "= = === ` भो

1.

मध्यदेलीय परम्पराके संस्कार भी मिधित हैँ फलतः अप्पयदीक्षित के उल्लेख को मध्यदेश वे टेकर दक्षिण भारत तक का प्रतिनिधि माना जा सकता दै

उधर कदमीरी परम्परा में सर्वाधिक महच्च जयरथ को दिया जारहाहै, किन्तु उन्हं स्वस्व की पुस्तक बहुत ही मव्यवस्थितः रूपमे प्राप्त हूर्ईदथी। वे स्वयं लिखते कि "उन्हें सिटी प्रति बहुत अन्यवस्थित है" क्या अव्यवस्थित आधार पर कोई निणय च्या जा सकता है।

यह्‌ भी ध्यान देनेकीबातदहै कि निणयसागरसंस्करण से टेकर रामचन्द्र द्िविदी जीर जानकी के युखमीक्षित संस्करणों तक रुग्यक्परम्पर। के किसीभी संस्करण की पुष्पिका में रुय्यक कानामक्यों नहींहै। अवश्य ही इन विह्ानोंको सुय्यक केनामकी पुष्पिका बहुत ही कम पाण्ड्रप्रतिमें मिटीदै ओर वह भी अव्यवस्थित पूना कौ शारदा छ्िपि की जिन दो प्रतियोमें स्चकके नामसे पुष्पिका भिक्ती है उन दोनो में भी पाठभेद है। वे दोनों पुष्पिकाएें येर्है--

१-- समापितमिदमलंकारसवस्वमिति श्रेयः करतिस्तत्र भगवद्‌ राजानकस्स्य कस्येति २- सम्पूणमिदमरंकारसर्वस्वमिति श्रेयो भवतु रेखकपाठकयोः कृती -राजानकर्य्यकस्थेति

दवितीय पाठ्की प्रति भूजंपत्रप्रति दै ओर प्राचीनदहै। उसमे स््यककानाम अवद्य ही प्रतिकिपिकार ने जोडा है एक महच्व की बात यह भी है कि प्रथम पुष्पिका वारी प्रति मे अकंकारस्वंस्वके सूत्रोंको अल्गसेभी लिखा गया है ओर उनको नाम दिया गया है 'स्द॑स्वाटंकारसूव्राणि" 1 अवश्य ही लेलक ने सवंस्व को सूत्रग्रन्थ से भिन्न ग्रन्थ माना है इससे भी सूत्रग्रन्थ के (अलंकारसूत्रण नाम से प्रसिद्ध होने का संकेत मिलता है एकमात्र श्ारदाल्पिकी प्रतियोँपरदही हम पूणं निभेर नहीं रह सक्ते, वर्योकि दक्षिण भारतमें जोप्रति्यां बनी होगी उनका मुरु भधार भी अवव्यही कदमीरी ल्पिकीदही पुस्तके रही होगी क्योकि कश्मीर में वना मु ग्रन्थ कदमौर की ल्पिमेंहीट्िखा गया होगा।

जहां तक सहृदयलीला की पुष्पिका का सम्बन्ध टै उसमे अवद्य ही रुय्यक को अठक।रसर्वस्वं का प्रणेता कहा गया है परन्तु उसपे यह तो धिद्धनहींहोता करि मंख सवंस्व के प्रणेता नहीं हैँ श्यक अंकारसवस्व के आधारभूत सूर्वों कै प्रणेता होने से अङंकारसवस्व कै प्रणेता माने ही जा सकते है वयोकि यहा अलंकारषवस्व शब्द का अथं है वह पूरी ग्रन्थसंहिता जो सूत्र, वृत्ति जीर उदाहरण से बनतीदै। कहाजा चुका दै किं वक्रोक्तिजीवित नाम केवल वृत्ति काटै, किन्तु वहु प्रयुक्त होता दै उसके काग्या- ककार नामक भूक कारिकाग्रन्थके लिए भी। जरह सूत्र ओर वृत्तिम मतभेद नहीं होता वरहा सिद्धान्त को सूव्रकारके नाम पर दही व्यवहूत किया जाता दै।

0

१. द्र प° २२४, ३८९; ४६४ २-३. डा० द्विवेदी कौ संजीविनीभूमिका

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यह भी विचार करने की बात है कि पिशेकसंपादित सहदयलीला की पुष्पिका में रुय्यक्‌ को जो ^रुचकापरनामा' ओर अरंकारसवस्वकृत्‌" विशेषण दिए गएहै, ये स्वयं ग्रन्थकार ने दिए याक्पिकारने जोडेहैँ। नि्णयसागरसंस्करण तें विशेषणर हित पुध्पिका भी [काव्यमा० ५|। इसे स्पष्ठ है कि इसमें प्रतिकिपिकारने भी कुछ अन्तर कियादै। यह अन्तर पुष्पिका की प्रामाणिकता को सदेह मे डाल्देताहै। वृत्तिकार ने साहित्यमीमांसा ओर व्यक्तिविवेकव्याख्यान को अपनी कति कहा, उनमें भी किसी ग्रन्थकार का नाम नहींहै। रेसा क्यों?

ये सव तकं अपने स्थान परदहं। इनसे जोभी सिद हो परन्तु स्वयं ग्रन्थ के अनुशीक्नसे प्रतीत होता दै क्ति सूत्रकार भिन्न हँ ओर वृत्तिकार भिन्च। जो वृत्ति अभी प्राप्त टै वह सूत्रकार की नहीं कही जा सकती प्रमाणार्थं 'पुनसक्तवदाभास' प्रकरण को रीजिए। यहु शब्दालंकार प्रकरण मे पठित है, किन्तु वृत्तिकारने इसे अर्थाल्कार मानादै। जव करि स्वयं वृत्तिकार, संजीविनीकार भौर सभी संस्क्ताभोंने अर्थाक्कारो का आरम्भ उपमा से माना है, क्योकि प्रत्येक संस्करण मे उपमा के आरम्भ मे अ्थालङ्धुारप्रकरणमिदम्‌' लिखा मिलता है वृत्तिकार को यह्‌ भ्रम इसलिए हो गया कि सूत्रम इस अलंकार को अथंपौनस्क्त्य पर आश्रित बतलाया गया है। वस्तुतः सूत्रकार का कहना यहे करंप्रतीततो अथंदही होता है पुनः कथित रूपमे, किन्तु उसका कारण है शब्द, अतः उत्ते माना जाना चाहिए शब्दारंकार ही, जैसा क्रि उसके प्रवत्तक उद्धट ओर उनके अनुयायी मम्मट ने माना है पुनरुक्तवदाभास की इस स्थिति पर ध्यान देने से यहु भी प्रतीत होता है करि आश्रयाश्रयिभाव ओर अन्वयव्यतिरेक के दन्द मे सूत्रकार अवद्य ही अन्वयन्यतिरेक पक्ष के है। आश्रयाश्रयिभाव केवल वृत्तिकार कापक्षहै। यदि सूत्रकार भीइस पक्षके होते तो पुनरुक्तवदाभास को अर्थाल्ङ्कारोंमें ही गिनते शन्दाल्कारोंमे नही, क्योकि पौनस्क्त्य का आध्रय तो वस्तुतः अथही है, शब्द तो उसमे कारण है इस प्रकार तो लाटानुप्रास को भी उभया- कंकार मानकर किसी पृथक्‌ प्रकरण मे रखना चाहिए था क्योकि वहु उभयाधित है

पुनरुक्तवदाभास शाब्द को सूत्रकार ने नपुंसकलिगि में रखा है। वृत्तिकार उखका भाशय नहीं समन्ञ पाए) वेजो हतु देते दँ वह बहुत ही अवेज्ञानिक है। उनका कहना है कि इसे नएसकल्गि में इसकिए रखा है कि उससे लौकिक अलंकारो से काव्या- खकारो का अन्तर सिद्धहो जाए क्या काव्यगत पदार्थो को लौकिक पदार्थोसे भिन्न दिखने $ लिए नपुंसक बनाते हए राम, युधिष्ठिर ओर अपने आश्रयदाता जयसिंह को मंख नपुंसक छ्खि सकते हँ? यह भी कोई तकं? वस्तुतः सुधकार ने पद कोटष्टिमें रखकर उसके अनुसार इस शब्द को बहुव्रीहि समास के दारा नपुंसकिगान्त बनायादहै। एेसाहीउद्धटने भी कियादहै। उन्होने उसे पद का विशेषण माना है। पद शब्द नपुंसकल्गि ही है।

( 2 )

सूत्रकारने ध्वनिया गुणीभूतन्यंग्य के लिए कोई सूत्र नहीं लिखा, जव कि पौनसर्क्त्य के अनेक सूत्र लिखि भूमिकालूपमेही वृत्तिकार वड़ी कम्वी भूमिका रचते जर वह भी सभी अलंकारो को चित्रकाव्य वगंमेंरखनेके लिए वस्तुतः वे मम्मट के चरमेसे भूत्रोंको देख रहे हैँ सच यह्‌ टै कि चित्रकाव्य नाम का कोई कान्य होता ही नहीं ध्वनिकारने यहीकहाहै। वे केवल ध्वनि को काव्य कहते ओर उसके नीचे अप्रधान व्यंग्य वाली उति कोभी काव्यकोटिमें गिनलेते है गुणीभूतव्येग्य नामसे। उसके बादजो उक्ति्यां वच जाती हँ उवे अकाव्य कहते ओर उनमें काव्य जेसी स्थिति मानते है, काव्यत्व नहीं समी अलङ्कारो को उन्होने गुणीभूत- व्यंग्य वगेमें ही अन्तभ्रंत दिखाया है। सूत्रकार अवश्य ही ध्वनिकार के इस पक्ष को जानते होगे, इसलिए उन्होने इस प्रकार के कोर भूमिका-सूत्र नहीं लिखि सूत्रकार के समक्ष आनन्दवधन ओर मम्मटके मतभेद उपस्थितये। वे मम्मट से आनन्दवर्धन को अधिक महत्व देते रहे होगे, वयोकि उन्होने काव्यप्रकाश पर बहुत वड़ी टीका नहीं लखी अरजो किती उसमे भी मम्मटका खण्डन क्रिया यहा सूत्रों मँ भी मम्मटके काव्यप्रकाश के साथ सिद्धान्तभेद है। इकर विरुद्ध वृत्तिकार मम्मट के हौ भक्त प्रतीत होते हैँ ८३ तथार्यवें सूत्रों कामुलरूपभी वे समञ्च नहीं पाए इस प्रकार सूत्रकार अवश्य ही इस वृत्ति के रचयिता से भिन्न

कदाचित्‌ इसीलिए अप्पयदीक्षित ने वृत्ति को स्थ्यक के नाम से प्रस्तुत नहीं किया। पण्डितराज जगन्नाथ "अलङ्कारसवस्व' की अपेक्षा ^रुग्यक' या .रचक' लिखना अधिक सुकर समक्त, यदि उन्हें ग्रन्थकार के नाम का निश्चय होता गोभाकर तो ग्रन्थ का भी नाम नहीं सेते कदाचित्‌ उन्हँ उसमे भी संदेह था इस प्रकार कदमीर से दक्षिण- भारत तक एक परम्परासंदेह कीभी दिखाई देती है। इपे सरलता साथ र्यक के विरोधमे साधक प्रमाणमानाजा सकता

हमे लगता है रु्यक्‌ ने भी कोई अत्यन्त संक्षिप्त वृत्ति अपने सूतौ पर लिखी होगी जिक्चक मंगल पद्य निजालंकार० पाठ होगा। बादर मंते ओर विस्तृत वृत्ति लिली होगी भौर उसमे गुवंछंकार० के पाठान्तर के साथ रुष्यक का ही पद्य अपना ख्या होगा प्रदीपकार ते काव्यप्रकाश पर नई वृत्ति छिली ही है। इधर ध्वन्यालोक पर भौ दीधिति नामक नई वृत्ति लिखी ठे। इप प्रकार भख दारा नईं वृत्ति का लिला जाना अस्वाभाविक नहीं इस दिशा में मगल पद्य का "तात्प" शब्द हमारी सहायता करता है। संप्रति जो वृत्ति प्राप्त ठे उसमे सूत्रोंका तात्प ही नहींदै, उनके प्रतिपाद्यो पर विशद विवेचन भी है ओर उदाहूरणों द्वारा उनका समर्थन भी यह तो वस्तुतः व्याख्या हं जिस वृत्ति मे तात्पथंमात्र दिया गया होगा उसेथातो मंल ने भपनी वृत्ति मँ अन्तभत कर छलिया होगा या उसका प्रचार मं कौ वृत्ति के बाद

| | | |

(९१४ ,

समाप्त हौ गया होगा जयरथ को मिलो प्रतिमे कुछ अंश स्य्यक की वृत्तिका ओर कुछ अंश मंख का मिला होगा, क्योकि उनकी मुल प्रति अत्यन्त अव्यवस्थित थी।

दस प्रकार संप्रति प्राप्त वृत्िके रचयिता मंखही दै मौर सूत्र कै रचयिता उनके गुरु रुय्यक् त्रिवेन्द्रम्‌ संस्करण में भीरसूव्रों को अलकारसूत्र' ही कहा गया है ओर उनका रस्चयिता स्यककोही बतलाया गया है। तृच्यनुप्रास के उदाहरण आटोपेन पटीयसा ०' पद्य के पूवं इसीक्ए मदीये प्रीकण्ठचरिते" पाठ त्रिवेनद्रम्‌ की प्रति मे मिल्तादहै। इसीलिए मंख की कृति श्रीकण्ठ्चरित के ओौरभी ४पद्य वृत्तिम उद्धृत है। श्रीकण्ठस्तव के जो पद्य पुनरुक्तवदाभास मे उदाहूत है उनके पह भी मदीये श्रीकण्डस्तवे' यह्‌ अवतरणिका इस संस्करण मं है संभवतः श्नीकण्डस्तव भी स्वयं मख की कृति रही हो।

शिष्य ओर गुरु दोनों मिलकर कोई एक ग्रन्थ लिखते तो लेखक केरूपमें नाम गुरु काही चलता दै। पाणिनि का तद्विषयता का सिद्धान्त इसके लिए प्रमाण दै डं ° इ्यामसुन्दरदास ओर आचाय पद्यनारायण जी ने मिककर भाषारहुस्य लिखा, किन्तु नाम ङ० श्यामसुन्दरदासजीकाही चल रहाहै। हमने स्वयं कालिदास- राब्दानुक्रम ॐं० वासुदेवशरणजी अग्रवाल के निदेशमें बनाया तो उसकी प्रसिद्धि अभी भौ अग्रवार जीकेही नाम सेहै। शताब्दियों तक बनते रहने वाञे भरत- नाघ्यशाल्न, महाभारत ओर पुराण क्या किसी एक व्यक्ति की कृति है, किन्तु प्रसिद्ध केवल भरत ओर व्यास के तामसे है। प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्तिः इसीकिए्‌ कहा गया है इसलिए भी मंख की कृति सुग्यक के नाम प्रसिद्धिपा सक्ती हे।

| | भरन्थकारपरस्विय

सूजकार का परिकय-

सूत्रकार रुय्यक को श्रीकठचरितमें मंख ते अपना गुरु ओर सभी विद्याओं रे निष्णात कहा [सगं २५] साहित्यशासत्र रुय्यक ने अपने पिता राजानक तिलक से ही पदा था,१ जिनने उद्वट के कान्यकंकारसार पर विवरणं नामक कोई व्याख्या लिखी थी, जिसका उज्ञेख जयरथ कदं बार करते हैँ मंख के अनुसार रुय्यक ने अनेक ग्रन्थ छ्िखिये। इनमें से केवर काव्य प्रकारासंकेतः तथा सह्‌दयलीलाः ही इस समय इनके नामसे प्राप्त है

रुय्यक रुचक नाम से भी प्रसिद्ध हैँ सहदयलीला मे इसे इनका दूसरा नाम माना गया दे चक संस्छृतशब्द है ओर श््यक देशी रुचक का अर्थं अशरफ होता हे रुय्यक के व्यक्तिगत जीवन के विषय में इससे अधिक विवरण प्राप्त नहीं होता

अप्राप्त ग्रन्थों मे अलंकारानुखारिणी [ १० ११८, १९२, १९२, १९९ पर

वि. १-२. काव्यप्रकाशसंकेत : काव्यप्रकाश के डं ° रामचन्द्र द्विवेदी कृत अंग्रेजी अनुवाद 106 20616 [हा भाग-२ परिशिष्ट में पुनः प्रकाशित ३. काव्यमाला ग्रन्थमाला में गुच्छक-५ तथा इसी ग्रन्थ परिशि० में।

( १६ )

विमहिनी में उदुधृत | जह्लण के सोमपाठविलास की टीका मानी जाती है रत्नकण्ठने स्तुतिकुसुमान्जलि की टीका मेँ इसे स्यक की कृति कहा है

अरकारमन्जरी ( वृत्ति में प° ३७ ) तथा अलकारवातिक" (विम० मेँ प° २३८) भी सवंस्वकार की कृति मने गए हैँ दोनों अप्राप्त हैँ पता नहीं यह्‌ सूत्रकार की कृति हया वृत्तिकार की। चरु्तिकार का परिचिय-

वृत्तिकार मंख (१) मंख (२) मंखक तथा (३) मंलुक नाम से पुक्रारे जाति दँ अपने श्रीकण्ठचरित में इन्हूनि स्वयं को मंखक ( ३।६३, ७२, ७८, २५ सर्गं ) अधिक वार ओर यत्र तत्र संख ( २५।११२,१५२ } भी कहा है मंघुक नाम॒ कदाचित्‌ दक्षिण के मृदुताप्रिय उच्चारण की देन दहै, क्योकि यह सिमृद्रवन्ध' की दीकामेंही मिलतादहै।

श्रीकण्ठचरित, के अनुसार ये ख्यक के शिष्य तथा कदमीरनरेश जयसिंह के आधित धे राजतरंगिणी' इन्द जयसिंह का सान्धिविग्रहिक भी कहती है जयसिंह का समय ई० सं° ११२८-११४८ है, अतः मंख ओर रय्यक दोनों का समथ १२ वींश्चती सिद्ध होता दै

गृद्धा, भद्ध ओर लकार ( टंकक ) इनक्रे बडे भाई थे। पिता थे श्रीविरवावर््त' तथा पितामह श्रीमन्मथ~। सभी परम विद्वान्‌ थे।

कृतियां-- मल की कृतियो में श्रीकण्डचरित २५ सर्गोकाएकर प्रातिभ महाकाव्य है जो काव्य- मालासेठप चुका है व्यक्तिविवेकभ्याख्यान ( विमशिनी में प° ३५ पर उद्धृत )

का तीसरा संस्करण हमारे हिन्दी अनुवाद के साथ १९६४ चौलम्भासे छप चुका ठं इघकं पहले भी यह्‌ चौखम्भा तथा व्रिवेद्धम्‌ से छपा था साहित्यमीमांसाः,

नाटकमरमासा बरती, हष॑चरितवात्तिक ^ अन्य ग्रन्थ जो अप्राप्य है

१. श्रीकण्ठचरित ३।६६ तथा सगं २५।

२. सन्धिविग्रहिको मंखकाख्योऽलंकारसोदरः

मठस्याभवत्‌ प्रष्ठः श्रीकण्छस्य प्रतिष्ठया ॥८।३३५४ राज

३.५. श्रीकण्ठचरित सगं-३, सभी भ्यो में मं ने अलंकार की वड़ी प्ररंसाकी है

६. त्रिवेन्द्रमूसंस्कृतय्न्थमाका सेचछपी साहित्यमीमांसा मे "अंगङेलवा० पद्य पर वहं विवेचन नहीं मिता जिषके ठिएु सवंस्व पृ० २०१ वह्‌ उर्किखित है, अतः ड° राघवन्‌ आदिदसे मंल की कृति से भिन्न मानते हँ विमशिनी-४६७ मेंभी साहित्यमीर्मासा का उल्टेव है मौर व्यक्तिविवेकव्यास्यान भी।

७.८. व्यक्तिविवकन्याख्यान मेँ उद्धृत

९. व्यक्तिविवेकव्याख्यान तथा सर्वस्व में उदुधृत पृ० २०१।

( १७ ,

त्रिवेन्द्रमसंस्करण मे धीकण्ठस्तव" कोभी मदीय ओर मंखीय कहा गया है। यह प्रथमवृत्तिकार रुष्यक कीभी कति हो सकतीरहै। विरुद्ध प्रमाण मिलने पर इन ग्रन्थो के निर्माता पर पुनविचार किया जा सकता दहै।

मभ्मर से पर्वती-

काव्य प्रदीपकार गोविन्द ठवकुर ओर वामन ज्ललकीकर आदिकी यह्‌ धारणा हैकि काव्यप्रकाशे रटेष सम्बन्धी जो शाल्रार्थं नवम उल्लास में मिता है उसमें खण्डन सवस्व के मत का है वस्तुतः सवेस्व में काव्यप्रकाश की "अलङ्कारोऽथ वस्त्वेव ०' कारिका द्टेष प्रकरणमें उद्धृत है, साथ ही विभावना तथा संसृष्टि प्रकरण में मम्मट कीओर संकेत किया गया है। इस कारण मम्मट ही पूर्व॑वर्ती है पण्डितराज के प्रत्यनीकालंकारसे भीसंकेत मिल्ताहै किवे सवंस्वकारको मम्मट के बाद का मानते हँ

| | खीका तथा खीकाकार

अभी तक सवस्व की तीन टीकाएँ ही प्रकाम आई हँ विमर्शिनी, समुद्रबन्धी तथा संजीविनी, यद्यपि इसकी ओर भी कुक टीकाएँ थीं इनमें

( ) संजीविनी-

श्रोविद्या-चक्रवरत्ती कीटीकाहै 1 कहाजा चुका है कि इपङ़े १९९५ मे दो संस्करण हए हं श्रीविद्याचक्रवत्तीं का पुरा नाम श्रीविद्याचक्रवर्ती ही है। ध्ीचक्रवर्ती ने स्वयं को महान्‌ विद्वान्‌, साधक भौर हासेल नरेश वल्लाल-३ का सभापण्डित कहा है वट्लाल-३ का राज्यकाल १२९१-१३४२ ई० है अतः श्रीचक्रवरत्ती १४बीं शती के मध्यवर्ती सिद्ध होते है श्रीचक्रवर्ती ने प्रत्येक अलङ्कार पर अन्त मे संग्रहुकारिका भी बनाई है ये निष्टृष्टाथंकारिका' नाम से अक्ग भी संगृहीत मिरुती है (२) समुद्रवबन्धी-

समूद्रबन्ध केरल प्रदेश के यदुवंशी महाराज रविवर्मा के खभाषण्डित थे। रविवर्मा का समय १२६५ ई० है अततः श्री समुद्रनन्ध को १३वीं शती कै उत्तराधं कामाना जाता हे ये उत्तम कवि थे अपनी टीका, जिसका नाम कदाचित्‌ विवरण है, के आरम्भ मे इन्ोने जो मंगल पद्य दिए है उनसे लगता है कि इन्हे अभिव्यक्ति कौ उत्तम सूक्ष्मता, उत्तम सटीकता ओर उत्तम प्राल्जलता कगभग श्िग भूपाल के ही समान प्राप्त थी (३) अटक--

रत्नकण्ठ ने स्तुतिकुसुमांजलि की टीका मे स्वस्व के टीकाकारके रूप मे अलकभदटु का भी उत्लेल क्रिया है यहु टीका प्राप्त नहीं होती अतः इसके रचयिता अलक के परिचय के विषयमे इतनाही कहा जा सक्तादहै करिये काव्यप्रकाश के दशम

२अ० भू

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उल्लास के पूरतिकर्तां अलक से भिन्न है, क्योकि इन्होने काव्यप्रकाश्च पर टीका लिखने वा रुय्यक के इस ग्रन्थ पर टीका छ्खीहै। (४ ) विमरिनी-

इसके रचयिता जयरथ दहैँ। विमशिनी के अन्तमं जयरथ ने अपना संक्षिप्त परिचय दिया है। ये सतीसर के समीपवर्ती कदमीरतरेश राजराज के मन्त्री श्युद्धार के पृत्रथे। श्युगार का पूरा नाम श्ुंगाररथ था श्रीतन््राछोक की स्वरचित टीका के अन्त में जयरथ ने अपनी वंशावली इस प्रकार दी है-

=पुणंमनोरथ [ ९३० ई० के कदमीरनरेश यशस्कर के मन्त्री |

२-उत्पलरथः प्रथम

३-प्रकाडरथः

४-सुयरथः [ भाई धमंरथ, उत्तमरथ, मनोरथ |

*५-उत्पलरथ” द्वितीय [ भाई अमृतरथ अन्य दो भाई अनु्ञिखितनामा,

१०२८-१०६३ ई० तक के करमीरनरेश अनन्त के आचित |

६-सम्मरथः | भाई शिवरथ, शक्ररथ, नन्दिरथ, इनमें से शिवरथ विरक्त हुए |

७-गुणरथ* | भाई देवरथ |

८- राजानक गुङ्गरथ- | भाई लद्धुरथ पत्नी सत्वदाी |

९-्णृद्धाररथ [शृङ्गार के जन्मकेवादगुँगरथका शरीर यौवनम ही द्ूट गया]

१०-जयरथः?- |[ भाई जयद्रथ |

राजतरगिणी में प्राप्त करमीरी राजाओं की सुची मे राजराज नाम का कोई राजा नहीं मिक्ता, अतः विद्वानों ते उसे राजदेव नामक राजा से अभिन्न माना है, जिसका समय १२०३-१२२६ ई० है। उधर जयरथने पृथिवीराजविजय का | प० २११ | उल्लेख किया है जो ११९३ ई० में दिवंगत अन्तिम भारतीय हिन्दू सम्राट्‌ पृथिवीराज पर लिखा गया संस्कत महाकाग्य है फलतः जयथ का समय २वीं शती के अन्त से लेकर १३वींशतीके मध्य तक स्थिर होता है।

१. तन्त्रालोक आर्कं ३७ उपसंहार--5 २-३. वही पद्य ९,

वही पद्य १०,

वही पद्य ११,

वही पद्य १९.

वही पद्य २६३,

वही पद्य २५, ३६,

वही पद्य २६,

१०. वही पद्य ३८,

9 = ~ ^=

( १६ )

जयरथ के विद्यागुरुथे श्री शंखधर [ तन्त्रालोक प्रथमाह्लिक अन्तिम पद्य | तथा ध्रीसंगरथ ' ओर दीक्षागुर श्री सुभटरल, जो" त्रिभ्रुवनदत्त के पुत्र तथा श्री विशवदत्त के पौत्र थे सुभटरत्न इनके पिता श्रीष्युङ्काररथ केभी दीक्षागुरु" थे जयरथ ने बहत कुछ अपने पिता से पठा था शेवागम, रमदरेन तथा कुलदर्शन के ये अद्वितीय विषान्‌ ओर विशेषज्ञ थे, अन्य शाच््ो में तो निष्णातये ही इन्होने अभिनवगुप्त के आकरग्रन्थ श्री तन्त्रालोक की व्याख्या लिखी है ओर अन्त में अपने परिचय में लिखा है- ` “पदे वाक्ये माने निखिरुशिवश्चाखोपनिषदि प्रतिष्ठां यातोऽहं यदपि निरवद्यं जयरथः। तथाप्यस्यामङ्ग क्वचन सुवि नास्ति त्रिकटशि, क्रमार्थ वा मत्तः सपदि कुशकः करिचदपरः ॥?° यद्यपि जयरथ, व्याकरण, मीमांसा ओर तकंशास्र के साथ संपूणं शेवशाखर से प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुका हू तथापि त्रिकट ओर करमदशेन में मृज्ञ से अधिक कुशल प्री पृथिवी मे कोई नहीं दहै ।' क्या ही प्रगाढ आत्मविश्वास प्रकट किया हि इस विद्वान्‌ ने अपने वेदप्य के प्रति कभी कभी यह घातक भी बन जाता है विद्वानों की राय है कि तन्त्रालोक की व्याख्यामें भी जयरथ ने अनेक स्थानों पर परौहिवादसे काम लिया है ओर मुलविरुदध निष्कषं निकाले हैं विमश्िनीमेभीवे इसी प्रकार कहीं से कहीं पर्ुचते दिलाई देते हँ किन्तु इसमे संदेह नहीं कि जयरथ एक महान्‌ विद्वान्‌ ओर परिश्रमो लेखक हैँ जयरथ की दरूसरी आलंकारिकं कृति है अल्कासेद्‌ाहरण इसका पाण्डुरनय पूना मे सुरक्षित है ओर उसके आधार पर इघका विवरण डां रामचन्धर हविवेरी ने अरुंकार- मीमांसा में प्रस्तुत करदियाहै। इस विवरणसे स्पष्टदहै करि जयरथ ते सवंस्वकार ओर शोभाकर के ्षगडे को निपटाते-निपटाते ठीक उसी प्रकार स्वयं भो एक अलकार- रास्रीय ग्रन्थ लिख डाला जिस प्रकार काव्यप्रकादाकी टीका लिखते-किखते रुय्यक्‌ ने अकुंकारमूत्र, विश्वनाथ ने साहित्यदपेण ओर पण्डितराज ने रसगंगाधर जयरथ ते इख ग्रन्थ मं शोभाकर के अनेक अलंकार स्वीकारकर ल्एि है क्रियातिपत्ति, ।वितकं, विपयय, उदाहरण, निडचय, आदर, श््कला, प्रसंग, समता, तुल्य, वेधम्यं, परभाग, उद्रेक, विधि, प्रतिप्रसव, तन्त्र, प्रत्यूह, विवेक--इनमे उत्लेखनीय हैं कुछ अलंकासें की कल्पना जयरथ ने स्वयं कौ है तात्पथं, अंग, अनंग, अप्रत्यनीक, अभ्यास, अभीष्ठ, एसे हीदं, विमशिनी का पूणं नाम अलकारविमशिनी है इसे टीका कहकर भाष्य कहना चाहिए सैकड़ों नवीन ललित ओर उपयुक्त काव्य-पयो को उद्धृत करते हृए ग्रन्थ कै

१. तन्त्रालोक ३७ आल्लिक के अन्त के परिचयपद्य-४१ २-३. वही पद्य ३५ ४. वही पद्य ४७

[र

( २० )

संकेताव्मना निर्दिष्ट अंशो को सोदाहरणं विशद करना कम प्ररिश्रम का कं यं नहींदटे। विमश्चिनीकार इस दृष्टि से एक आद्चय॑कारिणी मेधा के धनी ग्रन्थ के उदाहरण मे जहां न्ट अक्षमता दिखाई देती है वे तुरन्त अपनी ओर से कोई उदाहरण पद्य उपस्थित कर देते उन्हें साहित्य संप्रदाय का ज्ञान है, अतः वे मम्मट पर किए कटाक्षो को समद्चते ओर स्पष्ठीकरण के किए मम्मट कानाम्‌ प्रस्तुत करते है। विपश्शिनीकार को अपने व्याख्येय मूलग्रन्थ के प्रति आदरवृद्धि हे [ अतिशयोक्ति २२४-५ | वे उसे प्रतिपक्ष आक्रमर्णो से बचाते ओर अपने तकौ से प्रतिपक्ष का उत्तर देने मे पूरे संरम्भके साथ जुट्ते टं। विम्चिनी का चिन्तन ही वह्‌ मूल दै जिसे अप्पयदीक्षित को चित्रमीमांसा ओर कुवल्यानन्द लिखने कीप्रेरणा ओर उ्योवि दोनों. मिटी तथा पण्डितराज जगन्नाथ को अपना अति प्रौढ, रसगंगाधर ये दोनों महान्‌ विद्टान्‌ सवस्व, विमर्शिनी ओर रत्नाकर को पदे-पदे उदरुधृत करते चके द| साहित्यशास्र बडा भाग्यशाली शासन दै जिसे इतने बडे विद्रानो ने अपनी चतुरस विता के निमंक चतुष्पथ पर चहूंओोर दृष्ट ललाकर अवधानपूरव॑क बडे परिश्रम से सचा उद्धट, वामन, आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, कन्तक, महिमभट्र भोज, मम्मट, रुध्यक दोभाकर, जयरथ, अप्पयदीक्षित, पण्डितराज जगन्नाथ- सभी शास्त्र के अप्रतिम विद्वान्‌ ये विदव के अन्य किसी वाट्मय मे काव्यशास् को कदाचित्‌ ही इतने बडे विद्वानों का इतनी बडी संख्या में इतने लम्बे समय तक्र योगदान प्राप्त हुजा होगा ) विमश्चिनी रेसी प्रासादिक रचना हे कि अकेटी यही अभ्यस्त हो जाए तो पाठक चतुर पाण्डित्य का धनी बन सकता हे इसमे मआएु गम्भीर विवेचन यहाँ उद्धरण कौ अपेक्षा नहीं रखते जहां कही पुस्तक खोटी जाएगी यह्‌ विशेषता प्रकट हो जाएगी अलंकारविमश्शिनी मे जयरथ ने अलंकारभाष्य [ ११८, १५३ | ओर अलंकारसार, | २६१, ७३७ ] नामक णेस दो ग्रन्थों कोभी उद्धृत किया है जिनमें अलंकारो का ओर भी विशद विवेचन धा, किन्तु जो इस समय प्राप्त नहीं है इनके अतिरिक्त कुछ एेसी कारिकां भी उद्धृत की दै ।¶० र| जो ध्वनिविरोधी तथ्य प्रस्तुत करती दह ये जिन ग्रन्थो की है वे अवद्य ही अतीव महत्व के ग्रन्थ रहे दुर्भाग्यदैकि हमारे पूर्वजो ने, विशेषतः ध्वनिवादी आचार्य ओर उनके अनुयायियों ने अपने विरोध को पनपने नहींदिया। जो उदारतावादी 7 उन्दरँ मर्यादावादी चिन्तको नै उत्पथगामी माना ओर अपने श्रद्धेय के विरुद आदर देना उचित नहीं समस्चा अस्य सीका-- जयरथ ने अन्यैः" [ १० ६०३ ] कहकर किसी बदरणीय या मन्व किन्हीं सम्मान्य विद्रानों की ओर भी संकेत किया दहे अवश्य ही जयरथ के समय तक वे सवस्व पर अनेक कार्यंहो चुक्रे होगे |

(. २१ )

हमार! संस्करण

हमारा यह संस्करण मुख्यतः निणयसागरोय संस्करण पर भात है! हमने इसमे मूर सवंस्व | सूत्र तथा वृत्ति ] तथा उसकी टीका विमशिनी दोनो का हिन्दी अनुवाद भीक्रियाहै। मूल का हिन्दी अनुबाद ड० रामचन्द्र दिवेदी भी कर चूके ये, किन्तु विमशिनी का अनुवाद अभी तक नही हृंजाधा। टीका का अनुवाद मुल के अनुवाद के बिना आधारहीन प्रतीत होता अतः हमने मूक का भी हिन्दी अनुवाद करना आवश्यक समज्ञा यह्‌ भी सरल कायं था अनेक स्थलों मे संदिग्बता थी 1 हमने वहां पं० रामचन्द्र द्विवेदी का अनुवाद देखा उससे कहीं हमें सहायता मिली,

कहीं उनके संदेह दूर हृए

अनुवाद के पहले विषय के अनुसार मूलपाठे का निर्धारण आवश्यक था हमने यथासाध्य वह्‌ किया दहै ओर पाठक यहु जानकर प्रसत्त होगे कि उक्त पाचों संस्करणों मे जो संशोधन द्ूट गये थे उन्हे हमने च्टने नहीं दिया है उदाहुरणाथं चौथे सूत्रको लीजिए इसे निर्णयसागरीय, त्रिवेन्द्रमीय ओौर वाराणसेय संस्करणों में वृत्तिरूप मे छापा गयाथा। १९६५ कै दोनों नए संस्करणोंमें भी बह वृत्तिल्पमें ही छपा रहं गया हमने उसे सूत्र रूपमे ही छपवाया है, जब कि संजीविनी ने भी इसे सूत्र .ही साना ग्रन्थसंगति भी उसके विना संभव थी। तथा सूरो मे शब्दपौनरुक्तय के प्रथम मेद की चर्चा है। यदि उक्त सूत्रकोसूत्रनमानाजाएु तो श्रथम' का अथं नहीं लगाया जा सकेगा इसी प्रकार पर्यायालंकार के लिए निणंयसागर तथा मोतीलालबनारसी- दास दोनोंके संस्करणोंमे दो-दो सूत्र छपे 1 वस्तुतः उनमे से द्वितीय सूत्र, सूत्र नहीं, वृत्ति दै हमने उसे वृत्तिरूप मेही छपवाया हे। उसे डं राघवन्‌ ने भी वृत्तिही मानाहै, किन्तु चतुथं सूत्रको भी वृत्ति मान ङ्न से उनकी सूत्र संख्या दही रहगर्ईटै। द्विवेदी के संस्करण में सत्र संख्या ८७ ही है,जो सही हे, किन्तु वह संख्या पर्यय के लिए दो सूत्र मानने से आई है अपने संस्करण मे हमने ट्स ठीक कर दिया है। निणंयसागरीय संस्करणमे व्याघात के द्वितीय सूत्र के अगे व्याघातः सूत्रम हीचषा हु है। वस्तुतः वह वृत्ति है ओर उसके आगे अनुवृत्तिसूचक “इत्येव' अन्य संस्करणों प्राप्त है। हमने उसे वृत्तिहीमानाहे। सारालकार के सूत्र में सार के स्थान पर उदार पाठ निणंयसागरीय संस्करण मे छपा हुआ दै। पाठान्तरमे वहांखार हीपाठथा। अन्य संस्करणों के ही समान हमने भी इसे सारदहीमानादै। यत्ति में भी पर्याप्त संशोधन करना पड़ा हे। निम्नलिखित तालिका से संशोधन

का आभास मिल सकेग।--

पष्ठ निणेयसागर संस्करण प्रस्तुत संस्करण पृष्ठ द्विविधमपि | त्रिविधमपि

प्राधान्यं काव्यस्य प्राधान्यं [काव्यस्य] २१

पृष्ठ निणेयसागर संस्करण १३ स्वरूपेण विदितत्वात्‌ ११५ क्िद्धितया १९ शब्दस्याप्रतीता° इहेति शब्दप्रस्तावे २४ श्लब्दपीनस्क्त्यं--इत्यादि वृत्ति इति ट्ैविध्यमेव स्वरव्यन्जनसमुदायपौन सत्यं

२८: त्रूमः-इत्यवेहि अत्राउजपत्रनयने नयने निमील्येव्यादो ब्रमः-इत्यवे-इत्यादौ ७१

४२ आतुरस्य ६० यदत्र वस्तुतस्तद्रूपतायाः ६१ पुथुरुरसि

७५ इत्यादावुदाहू तस्य ८० लोक्यमानास्ता 2८ अत्र चातिश्या ९१ ०विवत्तित्वादु° ९४ वस्तुतः शाब्दस्य १०६ भावोऽलोभनत्वम्‌

„, तदन्यनिवृत्ती १०९ ततरच भावात्‌ त्रिधा

नायकनायिकाख्यधमंविशिषयोः ११० केशपाशालिवृन्देव

१११ लिव किल

११६ व्यापारविषयतो

११७ नायकत्वं स्वरूपेण

१३४ कि मामाल्प

१४८ सातिदायात्‌ कोपजनकत्वादिः १७६ श्रीहुष प्रस्थापने

२२३ अभिमानेन सा योक्तिर्ञान

प्रस्तुत संस्करण पृष्ठ स्वरूपेण विचार्यत्वा २७ लिगतया 4 राठ्दस्य प्रतीतो ४४ इहशब्दः प्रस्थाने ४४ 'राब्दपौनस्वत्यं सूत्र ६० इति विध्यमेव ६० आतरस्य १२३६ यत्र वस्तुत० १५८ गुरवंचसि पृशथरुरसि १५९ इत्यत्रोदहूते १९७ लोप्यमानानज्ञा २०६ अतरचा ९९ निव वितत्वादु २४३ स्तुशब्दस्य २५१५ भावः शोभन ३०६ चान्यनिवृत्तौ २०६ तच्च २१५९ भवत्‌ त्रिधा ३१५ नायकताख्यधसंविशिषयोः ३१५ केशपाशालिवृन्देन ३१७ विचिकल ३१७

व्यापारवि षयीक्रतो २२८ नायकः स्वस्वरूपेण

किमां नाल्प 2; सातिशयो मरणशङ्कोप० ४३० श्रीहूर्षाप्रस्थाने ५१८

अभिमाने चसा योज्या ६७४

प्रायः यही स्थिति विमशिनीकी रहीदहै। उसमे भी पर्याप्त संशोधन करना

पड़ा इसके भो कुछ स्थल-- प० पृष्ठ निणंयसागर नीचेमे विमर्षिणीकारः

प्रस्तुत संस्करण पष्ठ

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पं० पृष्ठ नीचेसे१

द. १४

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२१

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निणंयसागर तात्पयमुच्छत इति अस्या- भिप्रायः-तथा

इत्युपचारवक्रतादीनां

त्रिविधस्तथापि तेन ०० मुख्यत्वेन

कार्याथने उपमितार्थादिवादि तथात्वानुपपत्तेः वारण-रणरणिका० तत्साहश्यत्व उपमानत्वेनोपात्ता कल्पितेनेव स्मतुदशायामनीतत्वाकत°

युक्तम्‌

अपद्ूवे

भ्रान्तिसद्धाव

सारर्यनि मित्त स्वातन्त्येण विभावस्य नापहतेहि

चन्द्रादेवृं्यभावो नयनुद लक्ष्मीसीन्दर्या स्फुटत्वे तत्कान्ता ° विशेषात्तत्सामान्यतर्कोऽपि

पक्षान्तर-सं स्पशं

प्रस्तुत संस्करण पृष्ठ १तात्पयमूच्यत इत्यस्या-भिप्रायः

तथा इत्युपचारवक्रता आदि-

पदेन क्रिया-वक्रता-

दीनां २३ त्रिविधस्तथापि [तेन ००] मुख्यत्वेन ३२ कायाथेन १५२ उपमितार्थादिवाचि. ५६ तथात्वोपपत्तेः 9 वारण-रण-रणरणिका ५८ सहरत्व 2९ उपमानत्वेन नोपा ९२ कल्पितेन तेनेव १०० स्मत्रदरायमतीतत्वात्‌

कतं ` ११० | युक्तत्वम्‌ ११६ अनपद्ुवे ११८ श्रान्तिमिच्छब्द १५९ साहरयनिमित्तकत्वमेव १५३ आखण्ञ्येन १६१ विभागस्य अपहतेहि १७१ चन्द्रादेवृच्यभावाद्‌ १७१५ ननु यद १७८ लक्ष्मीसीदर्या १७९ स्फुटं त्वेतत्कान्ता १७९ ०विशेषात्‌सं रायप्रकार-

स्तक १८४ पक्षान्तरासंस्पशं ११८४

( २४ )

# 1 ~ मटक

नीचेसे पं० पृष्ठ निणंयसागर संस्करण प्रस्तुत संस्करण पृष्ठ # संशयो ह्य ति्यितोभया ° संरायो ह्यनियतोभया १३ ६९ निमित्तसामर्थ्यात्‌ निमित्तं तत्सा ° १८६ 0, विषयप्रतीतेः विषयिप्रतीतेः -8 विषये प्रतीति विषयिप्रती° )) १२ ७० विषय दार्घ्येन विषय दार्घ्येन # नीचेसे ८६ लडहत्वादीनामित्यादि- लडहत्वा दीनामिति शब्दाद्िवत्तनोच्छाया एव आदिशब्दाद्‌ वत्तनच्छाया ॥५। २२७ ०नाथंमिति एतत्प्र° ०नाधंमित्येततप्र° , 4 प्रस्तुतस्य विनान्येन प्रस्तुतस्य तु नान्येन २४४ ९५ विरोषाभिदित््या पाठान्तर-विह्ेषानभिधित्स्या विशेषाभिधित्सया २५६ ९4 पाठान्तरवक्तृप्रतिवक्त्रोः वक्तृ प्रतिपत्त्रोः २५७ वक्तृप्रतिपत्योः ष. तस्यापीति तस्यापीति | सामान्य- | धमंस्यापीत्यथः | २६४ नीचेसे रल प्रतिपाद्येन, प्रतिपाद्य तेन प्रातिपयेन २७१ ( पाठान्तर ) ४-५ १०४ कार्यकारणयोः प्रति नियमस्य कायकारणयोः प्रति- विपयंयस्तुल्यकालत्वादिनोक्तेः नियमस्य क्रमस्य ( अथ कायंकारणवत्प्रति- विपयंयस्तुल्यकाल- नियमस्य क्रमस्य विपयंयस्तु- त्वादिनोक्तः २९९ ल्यकाटत्वादिनोक्तः , तत्रेति निर्धारणे अस्यामनु० तत्रेति निर्धारणे | कायकारणप्रतिनियम- विपयंयरूपेति | अस्यामनु २९९ १२ ,;, विशेषणपरिहारेण विशेषपरिहारेण ३०२ नीचेसे ११२ समासोक्तावुपमायां समासोक्तायामूपमायां ३२० १२६९ उत्थापनमिति उत्थानमिति ३६१ , , दुबंखत्वादा ( भावान्नान्य }) दुवंटत्वादा- वाध्यत्व° वाध्यत्व9 ३६१ ततु सर्वंजनविरुद्ध° तत्‌ स्ववचनविषशद० ३६२

( २९ )

पं० पष्ठ निणंयसागर संस्करण प्रस्तुत संस्करण पृष्ट नीचेसे १२७ वाधोत्पत्तावपि नाधोत्पत्तिः, अ।पतु ३६७ नीचेसे , पडचादुविरोधधीः परचादवि रोधधीः १२९ असम्बद्धत्वा° सम्बद्धत्वा० ३७२ नीचेसे , नायिकाडशशिनोः नायिकानिशयोः १३१ साहश्यपयवसायापह्भुव साहद्यापयंवसाय्यपल्ुव नीचेसे , व्याजोक्तौ चत्वारः प्रकारा व्याजोक्तौ चोत्तरः विद्यन्ते प्रकारो विद्यते ३७४ नीचेसे १३४ अप्रस्तुतात्‌ कारणात्‌ प्रस्तुतस्य अप्रस्तुतात्‌ कार्यातु कायस्य प्रस्तुतस्य कारणस्य ३८५ १३५ कायं प्रस्तुते कारणस्या९ कारणे प्रस्तुते कायस्य ३८६ १-२ १३७ सारूप्येण साधर्म्योदाह्‌- साधर्म्येण सारूप्यो- रणानां दाहूरण।नां , वाक्येनेति निरिचनुमः वाक्येन [ अतिदेश | इति निरिचनुमः ३८९ नीचेसे १४० संपद्धरण संपद्वरण ४०९१ ८5 १४९ निषेधस्येव भाषनात्‌ निषेधस्यावभासनात्‌ ४३५ १७६ तत्र रूपाय विशेषविवक्षा तत्र पुनरुपायविशेष ५१९ , प्रस्थापन प्रस्थान ५९९ नीचेसे ,, विभावादीनां विभावनादीनां ५२१५ १७७ कारणमारानां कारणानां ५२५ १८१ आधिक्यमुक्तम्‌ आधिक्यमिति वधमानमुक्तम्‌ ६९ ,, तस्मादस्मिश्च वधमाने तस्माद्‌-अस्मिस्च सारोपान्तर्भावमेति पुनरिदमन्त- वधमाने सारोऽन्नभाव- भूतं सारे परिमितविषये महाविषय मेति पूनरिदमन्त- मित्यायक्तमेवोक्तम्‌ भृतं सारे परिमितविषये महाविषयमित्या- ययुक्तमेवौक्तम्‌ ५३१ १८२ हक्त्वाभासेव क्‌ स्वाभासेव ५.४० नीचेसे १८२ तच्छन्दस्यापि तच्छाब्दस्यापि १४० नौचेसे १८३ वैचित्यावहत्वाच्छन्दस्यापि वे चित्यावहत्वाच्छा- | ब्दस्यापि ५४१

१८६४ त्रिरूपस्य साध्यस्य नरिरूपस्य साधनस्य ५५२

प० पृषु १८६ पि १९१ नीचेसे १९१ द. ६९ २-३ १९३ १९५ 1 9) २००५ २०४ २०६ २९ २९०८ २११ *¶. (३ नीचे से ३-१ २१४ नीचेसे २१९ नीचेये „+, ९. ~ 40 तीचेसे नोीचेसे २२९१ क, ^ -4

( २६ )

निणंयसागर संस्करण प्रस्तुत संस्करण पृ समथतया समथ्यतया ५५३ मृतेर्दारात्मजा० मतेर्दारात्मजा० ५५८ सुचितं तस्येव समुचितम्‌ तस्यैव ५६७ रब्दोपात्तदधति(?) शब्दोपात्तमेतदूभर्वति ५७२ तदिति नियमस्य तदिति विनिमयस्य ५७२ रकतासमत्वयोविम्बप्रति° मतत्वासमत्वयोबिम्बप्रति० ,, कविप्रतिभानिवंत्तितत्वा- कवि प्रतिभानिवेत्तितत्वा- भावाज्ञोको० ल्लोको 9 ५७९ नियमविधिः नियमविधिः

पुनरज्ञातज्ञा ° पुनरन्नातनज्ञा ° ५१ तेन नियमे ब्रीह्०० यित्वमेव तेन नियमे त्रीही००

दरनादे° यित्वमेव न, दलनादे वि विकल्पोऽपि भवति विकल्पोऽपि भवति ५९४ तत्कथं नववयःप्रभू° तत्कथं नववयःप्रभु० ६०३ निरासमानराकरणं निरायासमाननिराकरणं ६०९ प्रतीपाख्यमलकारद्रयं पुन. प्रतोपाख्यमलकारदयम्‌,

पुनः | ९१८

घटपटवदूभेदो घटप्वद्‌ भेदेन ६२८ यत्‌ सूमनोगुणत्वे यत्‌ समानगुणत्वे अननुदाह्रणीय ०, अननुदा- अननुहर०, अननुहुर०,

हरणा ०, अतिरिक्तत्व° अतिरिक्त ६३८ लोकात्म चोलात्म ६५३ तस्य हि यथायोजनमा्रं लक्षणम्‌ तस्य हि अन्यथायोजं० ६५३ वाक्याभिधेयमानेऽथ वक्येऽभिधीयमानोऽर्थो ६५८ प्रस्थानविरेषतया प्रस्थाननिषेधकतया ६५९ मल्याथमूपादनमिति भेदान्तरमप्य- मुख्यार्थापादनमिति भेदा- वसानवाच्यम्‌ न्तरमप्यस्या वाच्यम्‌ ,, इह हि केचिदर्थाः कविवचसि इह हि वाच्यवाचकयोः ६७२

सुस्पष्ठमधिरूढाः वाच्यवाचकयोः

१. यहां मूल में समुचितं तस्येव" एेसा ही छपा रह्‌ गया है २. मुल में अतिरिक्त हीचछपगयाहै। ३. मुरु में यथायोजनमात्रं ही छप गया है

नीचेसे

नीचेसे

नीचेसे नीचे से नीचे से नीचेसे

नीचेसे

नीचे से

नीचे से

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२५

निणंयसागर संस्करणं भाविना

आदरदच

योगविदभूत °

प्रत्यक्षतयेव तदभावभासनं

परमाटैतज्ञान

जानामीति समानाधि सौषेषु नीतं

स्वप्ने मोदित कविसमपितधमत्वं

द्धभूतस्य

तत्र नायमङ्कारः

रत्यात्मभावः

गणीभावात्‌

पुष्णन्मुरारेः

रतेरभूत °

शङ्ासूयाधृतिस्मृत्यौत्सुक्य- दैन्यौत्सुक्यानां

प्रकृतत्वाच्चारु°

सामग्रादेः

बोधन्यायेन मानस्बोधन्यायेन

जिनाहंसमरयाँस्तथा व्यक्तमेवं विधीयते इवेक्ष्यते

तस्मादेषां विषयत्वं

पूवं हा राच्चारुत्वाभावाच्च

संसृष्टिसंकथने चकिते

रसताम्‌

निमित्तानि मित्तभावेन

अङ्धत्वे पुनरेषां संकरादी- नामङ्धा°

प्रस्तुत संस्करण भावना आदराच्च

यो गिवद्भूत °

६७५

प्रत्यक्षतयेव [ प्रतीतिस्तथापि |

तदभाव |सं| भावनं परमाद्रेतिन्ञान जानामीत्यसामा° सौधेषु गीतं स्वप्नान्तोदित कविसमपितधर्माणां अद्किभूतस्य तदत्र नायमलरुकारः रत्यात्मा भावः गुणीभावाभावात्‌ ९ऽणतु पुरारेः रतेरद्धभूत शद्ध सूयाधृतिस्मृति- देन्योत्सुक्यानां प्रकृताच्चार्‌० सामग्रयादेः बोधन्यायेन [ मानसबो- न्यायेन | जिनान्‌ हेममर्याँस्तथा व्यक्तमेवं विधोऽपि ते इवेक्षिते तस्मादेषामविषयत्वे ूरवंहानाच्चारुत्वा- भावाच्च संसृषटिसंकरयुगे दलिते रमताम्‌ निमित्तनिमित्तिभावेन अद्धत्वे पुनरेषां संकरधीर्ना°

६७१५. ८७१ ६.७६ ६५७८ ६८२ ६८९ ६९३ ८९१५. ७०२.

७२० ७९०

3१...

२४६

नीचेसे

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1)

२७

4,

चः

निणंययार संस्करण यमकानुप्रास्योनिमित्तनि- मित्तिभावः

शब्दव दुपकार्योपका रकत्व- भावात्‌

इयमेव हि संयुष्टद्रंयो- दरादादिमाडिवाक्यवचनयोः योरपि समृद्धत्वात्‌

चात्रायमाट०

संकरो नापि

राक्तियोगात्‌

अत्र चयथा दावाप्ति(?)प्रदश्न

समासां

संकरे रूपकोपक्रमेणोपमानिर्वाह दृष्ट इति साम्यलाघवेन

उपमाया बाधकत्वं प्रतिगम्भी

हेतुत्वेनेव गता

तस्या अनुत्थानात्‌

हतुः

वदने शब्दाथवत्यलङ्कारवाक्य

०भयालङ्कारत्वे

णिता

ष्ठिः इटेषाणामेवो० तत्कायंमेव

प्रस्तुत संस्करण पृष्ठ यमकरानुप्रा्योनं

निमित्त ° ७२७ राव्दवदुपकार्यापिकारक- त्वाभावात्‌ ७९७

इयमेव हि संमृष्ियंद्दयोः ,, दशदाडिमादिवाक्यवदनयो ,, योरपि संबद्धत्वात्‌

22 चात्रोभयमन्य संकरोऽन्यापि

दादिभङद्धात्‌ ५) अच्रचन यथा ७२३४ तावद्‌ व्याप्तिप्रदशंन० „+, समासानां ७३८ रांकरे ७४१

रूपको ०० वाहुः दुष्ट इति साम्यस्य लछाघ० ७४९१ उपमाया बाधकत्वम्‌

अतिगण ७४१ हेतृत्वेनेवागता ७४३ तस्यानुत्थानात्‌ ७४३ ९्त. ११ वचने ५9 शब्दाथवच्यंलद्कारा

वाक्य ७४४ ०भयालङ्कुारत्वं ७५२ वणिक = °!षएिरिटेषाणामेव तत्करायंत्वमेव

20

इस ताक्कासे स्पष्टहैकरि निणंयसागरीय संस्करण में भावात्मक वक्तव्य को अभावात्मक, अभावात्मक को भावात्मक, भावपूणं निर्देश को द्रव्यात्पक निर्दे कितनी ही बार छापा गया है न्याय के स्थान पर (कालः ओर भभरणशंकोपजनकत्वः के स्थान पर कोपजनकत्व' का पाठ विपर्यय दुस्समाधेय विपर्यय है पाठान्तर भी एेसी जगह

1 > ~~~ -~- "न

` ~ 1 ^ रररे

( २६ )

नहीं मिलते (लतासमत्व' से भतत्वासमत्व' कौ कल्पना खरल नहीं विराम, विरामाभाव, अनुच्छेद, प्रघटुकपरिवत्तन ओर एेसे ही लेखधम भी कहीं-कहीं भ्रामक स्थिति मे मिले ओर उनको विषयसंगति के आधार पर ठीक किया गया संशोधन में हमने कल्पना को सबके बादमे स्थान दिया है, पहले रत्नाकर ओर रसगंगाधर कै उद्धरणं को जो उद्धरण विमरिनी ने रत्नाकर से लिए हैँ उन्हे रत्नाकर से मिलाकर ठीक किया, यद्यपि कहीं-कहीं स्वयं रत्नाकर मेँ भी इस तुलना से संशोधन हुआ, ओर विमशिनीके जो उद्धरण पण्डितराजने रसगंगाधरमे दे रखें उन्हं रसगंगाधर से मिलाकर मू का संशोधन भी पहले उद्धरणों के ही आधार पर किया हि! १०९घु० का नायकताख्यधमं पाठ रसगेगाधरसे ही लिया गयाहे। ये सव निर्देश विम्ल.नामक टिप्पणी मे पाठान्तर-शीषक देकर कर॒ द्यि गये हं यद्यपि कहीं 'पाठान्तर'-शीर्ष॑क दुट भी गया है 1 विमश्चिनी की प्राकृत गाथाओं की संस्कृतच्छाया अपने संशोधन के साथ रत्नाकर सेली गहै यद्यपिएकदो स्थल विना छायाके छोडदिए गएरहै। वे समश्च मे नहीं आए विमश्शिनी के अनुवाद मे पूवपक्ष को समने हेतु रत्नाकर के संबद्ध सभी उरण हमने आगे या पी प्रस्तत कर दिए हैँ ओर पूनासे छपे संस्करणकेसंदभभी दे दिए है येसंदभं भी कव्निाईसे तैयार किए जा सके क्योकि कुछ उदरणरेसेदहैजो निस अल्कारमें दिए गए हैँ उसमें होकर रत्नाकर में किसी अन्य अरुकारके प्रकरणमें रहे है इनमें भी कुछ कारिका गद्याद्मक रूप मे छपी है, अतः उन्ह खोजना कठिन रहा है विमशशिनी मे प्रत्यक्षाद्‌ विरलकरांगुरिप्रतीति' इत्यादि | ५४० पृ०] एेसे भी कुछ स्थल हैँ जिनके मूर संदभं खोजे नही जा स्के. ओर इसीलिए जिनके अथंज्ञान मे संदेह रह गया है दिण्डिकारागः [ प° ५३], बाहकेलि [ १८४ प° |, वाह्याली [ १८४ पृ° ] भीरेसे ही शब्द है वाह्याली का प्रयोग राजतरंगिणी में बाहरी बरामदे के लिए हुभा है प्रस्तुत प्रसंग मे इसका यह अथं नहीं जमता था मतः हमने घुडसवारी का मैदान अर्थं किया। इसका एक प्रयोग घुडसवारी के लिएभी काव्यादशं के पूना संस्करण्‌ [ पु० १८ की | टिप्पणी में मिल गया राजगंज | रेन पृ० | भीरएेाही शब्द है | परतेक अलंकार के अन्तम हमने भामह से लेकर विश्वेश्वर तक चरी परम्परा उद्धूत करदीहै ओौरंप्रव्येक अलंकार का इतिहास दे व्याह दण्डी को यत्रतत्र ही मपनाया गया कश्मीरी अलंकार परम्परा उद्धूट की परम्परा है ओर उद्भट भामहसेही प्रभावित दैँ। उन्होने भामह के काव्यालकार पर टीकाभी ज्खी थीं जिसका उल्टेव जयरथ ने असशृत्‌ किया है उस कारण भामह को ही हमने प्राधान्य दिया है यद्यपि हमे यहु निश्चयहो गयाहै किं भामह दण्डीके बाद के रँ तथापि

( ३० )

हो सकता है हमने भी संस्कारवशात्‌ कहीं भामह को पूवंवरत्ती किख दिया हो भोज के सरस्वतीकण्ठाभरण को भी हमने अधिक महत्त्व नहीं दिया है, क्योकि उसका प्रभाव भी कडमीरी परम्परा पर कम टे यद्यपि जयरथ ने भोजदेव का भी [ पृष्ठ ४८४३, ७२० | उल्टेव कर दियारहै। इस प्रकार दण्डी से विहवैदवर तक की आवश्यक ओर एतिहासिक सामग्री प्रत्येक अलंकार के अन्त में इस ग्रन्थ में सुभ है। आक्षेप, काव्य लिग ओर संसृष्टि संकर के इतिहास पर गवेषक विद्वान्‌ ध्यान दे सकते हं इतिहाष के अन्त में श्रीविद्याचक्रवर्ती की निष्छृष्ठाथं कारिकां भी अनुवादकेषाथदेदीहैं।

4

अल्ङ्कारों का क्रमिक विकास स्पष्ट समक्षम सफरे इसलिए हम दण्डीसे

सवंस्व तक के अल्द्धुारों के इतिव्ृत्त पर दष्ट गठे-- अङ्काय का इतिघरत्त

(अलका र'-शब्द का पूवपद अलम्‌" ऋक्संहितामे अरम्‌'के रूपमे मिलता हैष अरम्‌ (ऋ-धातु से निष्पन्न शब्द है। का अथं दहै गति गति"-शब्द बोध, मुक्ति ओर गमनन्यापारका भी बोधक चब्दहै। अथं यहु कि न्नान, इच्छा ओर क्रिया इन तीन चक्तियों से बने विद्व की दो तिहाई तक व्याप्त है गति शब्द की दाक्ति। वेद- विज्ञान गति'-तच्व को प्राण" ओर "अर्थि" कहता? तथा उसे “इन्द्र से अभिन्न मानता हैः ऋक्संहिता के ऋषि वसिष्ठ इन्द्रसे ही पचते हैँ काते अस्त्यरङ्कृतिः सूक्तैः” हे इन्द्र, सूक्तं मे एेसी कौन सी अलंकृति, कौन सी प्राणवत्ता, कौन षी आपूत्ति, कौन सी उपलन्धि रहती है जो उनसे तुम्दँ प्राप्त होतीहै। अवद्यही इस वाक्य में सुक्तात्मक उक्ति के अन्तगंत रहने वाले अतिरय-तत्तव की जिज्ञासा प्रकट होरहीहै। मानों ऋषि यानी कवि, अलंकायं से उसके उक्तिलभ्य अलंकार के विषय में प्रडन कर रहा हैं इस प्रकार

7 7 नि मि नी नी मी भीम

१. द्रष्टव्य 27101018] 10६6 ०) {€ फठात्‌ = शाद्ा2

17. @. (~. (11081 710 (11610168 ०9 [लावा $ (1161570 10 88151118: ६4. 27. 7. २. €. फाला, एततएषाः ताश. २-३.द्र० ( १) वेदिकविज्ञान ओर भारतीय संस्कृति: म० म°

प० गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी ( ) आत्मविज्ञानोपनिषद्‌ आदि : १० मोतीलाल शास्र

( ) सहखाक्षरा वाक्‌ : वासुदेवशरण अग्रवाल

( ) विज्ञानविदयुत्‌ : म० म० पं° मधुश्रुदनओक्षा। =

( ५) वेदिकवाक्यकोष : श्रीभगवत शास्री

४. ऋ० ७।२९।३।

( ३१ )

तऋकसंहिता मे अथात्‌ मानव -इतिहास के प्रथम ग्रन्थ या आदिकाव्य मे हम परवर्ती अक्कारके लिए अरङृति" शब्द पातेर, किन्तु यहाँ यह शाब्द उपमा आदि के किए प्रयुक्त नहीं वतालाया जाता दूखरी ओर

यास्क के निकर्क्तमे हम उपमा शब्द ओर उसकी वही व्याख्या पाते हँजो हमे परवर्ता आलकारिकों में मिल्तीहै। गाग्येका मत उद्धूत करते हुए यास्क लिखते ह-- उपमा अतत्‌ तत्सहक्म्‌"› यहीं उपमाओं को न्याख्या करते हए वे लिखते है--

"तदासां कमं उयायसा वा गुणेन प्रख्याततमेन वा कनीयांसं वा प्रख्यातं वा उपमिमीते अथापि कनीयसा उयायांसम्‌

दु्गाचायं इसकी व्याख्या करते ओर लिखते है-

` यायसा उल्कृष्टेन गुणेन यो यस्मिन्‌ द्रव्ये उल्छृष्टो गुणस्तेन, कनीयांसम्‌ अनुकृष्ट गुणम्‌ उपमीयते, तद्यथा सिंहो माणवकः इति सिहे शौ्थसु्छृष्टम्‌, माणवकमेतेन उपमिमीते सिह इव माणवको विक्रान्त इति प्रस्याततमेन वा अप्रख्यातसुपमीयते प्रल्यातश्चन्दमा, अभ्रस्यातो माणवकःतं तेनो पमिमीते “चन्द्र इव कान्तो माणवकः इति अथापि क्वचित्‌, कनीयसा गुणेन ज्यायांसमपि सन्तसुपमिमीते ।' अर्थात्‌-'अनुक्छृष् की उक्ष के साथ तुलना ही उपमादहै'

यास्क एसी उपमाओं के १२ स्थलः प्रस्तुत करते ओर उनमें से कृ स्थलों को

कर्मोपमा,° भूतोपमा,"* रूपोपमा~ सिद्धोपमा,€ टृप्तोपमा,७ अर्थोपमा< भी कहते हें किन्तु इन्दं अलंकार नहीं कहते, यद्यपि इनमे भूतोपमा, रूपोपमा, सिद्धोपमा ओर टुप्तोपमा जिसका दूसरा नाम अर्थोपमा है एसी उपमां है जिन अलंकार कहा जा सकता हे

पाणिनि जी उपमा, साहश्य, सामान्य, उपमान, सहश, प्रतिरूप, उपमित शब्दों का 1 2 9.9

१. ( १) पांगरा ऽवा एण्नलऽ 8४. 27. 9. २. 726 2426. 3. (२ ) निरुक्त : नै षष्टुककाण्ड पाद-३ भारम्भ, मोरसंस्करण भाग-२ प° २८३ २. निरुक्त प्रथम भाग पृष्ठ ३३४ मोरसंस्करण. २-७. निरुक्त भाग-२ प्र° २९१-२०८ मोरसंस्कररण. ८. उपमा ( १) तुल्याथैरतुलोपमाभ्यां [ २।३।७२ ], ( ) चिदित्युपमाथं प्रयुज्यमाने | ८।२।१० | ओप्य ( १) जीविकोपनिषदावौपम्ये :[ १।४।७९ |, (२) ऊरत्तरपदा- दौपम्ये | ४।१।६९ | ( ) सं्ञौपम्ययोरच [ ६।२।११३ |

सादश्य ( १) जन्ययं विभक्ति° [२।१।६] ( ) यथाऽसादृश्ये [ २।१।७ | ( ) सहशचप्रतिरूपयोच सादृश्ये [ ६।२।११ ]

( ३२ )

असरत्‌ प्रयोग करते तथा ुरुषन्याघ्र' मादि एसे स्थलों पर दृष्टि रखते हैँ जिनमें आई उपमा स्पष्ठरूपसे अलंकार है, तथापि वे इन्दं उपमालंकार नहीं कहते, यद्यपि उन अपते रासन में वैसा कह्ने का कोई अवसर भी नहीं था पतञ्जलि “उपमान शब्द का निवंचन करते ओर कटते दँ मानं हि नाम अनिर्ततक्तानाथम्‌ , उप आदीयते अनिर््ञातमथं क्तास्यामीति, तत्समीपे यज्नाव्यन्ताय मिमीतं तदू उपमानम्‌ अर्थात्‌--उप यानी पाच में अर्थातु अज्ञात वस्तु के, ठे जाने वाला अथं उपमान किन्तु वे इसे अलंकारत्व से अस्पृष्ट रखते भौर इसके स्पष्टीकरण के लिए उदाहरण भावय गो जैसा इस लोकवाक्य का देते हैँ जिघमें उ्मातोटै किन्तु चमत्कार नही, अतः जो अखकार नहींदहै। किन्तु पतन्जलि के समय में ही "अरंकारत्व' ओर उपमा! आदि दोनों समानान्तर गंगा यमुना को मिला दिया नाता है यह कायं भरतमुनि करते हे वे उपमा, रूपक, | दीपक अर यमक को अकार मानते ओर छक्षण नामक तत्व के रूपमे अन्य ३६ गुणो | कारी निहूपण्‌ करते हँ जिनसे अलंकारो की दिशा में चिन्तन को व्िचयुदुगति प्राप्त हो | जाती है ओर दण्डी तक के अनेक मनीषी दशाम लगभग सात सौ वर्षा तक निरन्तर चिन्तन करते हैँ इस महान्‌ अन्तराल के पश्चात्‌ हम दण्डी तक परहुचते ओर उनमें अकारो की संख्या ३७ पाते हँ ये निम्नलिखित है--

[

सामान्य-( ) उपमानानि सामान्यवचनैः [ २।१।५५ ] | ( ) उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे [ २।१।५६ | | ( २३ ) नामन्त्रिते समानाधिकरणे सामान्यवचनम्‌ | ८।१।७३ |

उपमित-उपमितं व्याघ्रादिभिः० [ २।१।५६ |

उपथ्मान-( १) उपमानानि सा० |२।१।५५| (२) उपमानादाचारे | [३।१।१० ] ( ) कक्तयुपमाने [ ३।२।७९ | ( ) उपमाने कमणि [ ३।४।४५ ], (५) उपमानादप्राणिषु [ ५।४।९७ | ( ) उपमानाच्च | ५;४।१३७ |, ( ७) संज्ञायासुपमानम्‌ [ ६।१।२०४ |, ( ) तत्पुरुषे तुत्याथकतृतीयासप्तम्युपमाना० | [ ६।२।२ ], ( ) गोबिडारसिहसेन्धवेषूुपमाने [ ६।२।७२ ], ( १० ) उपमानं शब्दार्थ- | प्रकृतावेव [ ६।२।८० | ( ११ ) चीरमुपमानम्‌ [ ६।२।१२७ ], ( १२) सूपमानात्‌ | क्तः [ ६।२।१४५ | ( १३ ) निष्ठोपमानादन्यतरस्याम्‌ [ ६।२।१६९ |

१. [97. 9. +. 26. ब्रिाऽला$ रा 9]. 2061165.

२. “उपमः रूपकं चेव दीपकं यमकं तथा

अखंकारास्तु विज्ञिेयाश्चत्वारो नाटकाश्रयाः ॥--भरतनाव्वञाख १७।४३

¢ कि

१दृण्डी | ६६ ०-६८० ई० |

१. स्वभावोक्ति २. उपमा ३. रूपक ४. दीपक ५. आवृत्ति ६. आक्षेप ७. अर्थान्तरन्यास ८. व्यतिरेक ९. विभावना १०. समासोक्ति ११. अतिशयोक्ति १२. उत्प्रेक्षा १३. ठैतु १४. सूक्ष्म १५. ठ्शा १६. करम १७, प्रेयः १८ रसवद्‌ १९. ऊजंस्वि २०. पर्यायोक्ति २१. समाहित २२. उदात्त २३. अपहुति २४. रटेष २५. विशेषोक्ति २६. तुल्ययोगिता २७. विरोध २८. अप्रस्तुतप्रशंसा २९. व्याजस्तुति २०. निदशेना ३१. सहोक्तिं ३२. परिवृत्ति ३३. आशौः ३४. संसृष्टि ३५. भाविक ३६. यमक तथा ३७. चित्र

दण्डीने दक्षिणभारतमें जो अलंकारदशन प्रस्तुत क्रिया वहु उत्तर भारत के भामह को बहत ही शोधघ्रसुल्भहोगया। भ्लेही वह दण्डीके अपने म्रन्थकेद्रारा सुभ हुआ हौ अथवा साक्षात्‌ उसो माध्यम से जिससेये त्व दण्डी तक पहुचे हों स्वयं दण्डीके ग्रन्थसे ही भामह को अलंकार प्रेरणा का पक्ष अधिक स्वस्थ प्रतीत होता दै। एेसा क्गतः हैकि भामह किसी पक्ष को पूवं पक्त बना रहै है अौर उसे उसी की मूल पदावली मे उदुधृत कर रहे हैँ यह्‌ पदावली दण्डी से अक्षरः मिलती है ेसी स्थिति में दण्डी को पूवेवर्तीहोनेकाश्चेय देना तकंविरुद्ध है२।

१. ( ) यहां आचार्यो के समय का आधार हैँ डं० काणे (२) म०म० काणे आदि कहते है करि दण्डी के पूवं भद्विकाव्यमे अलंकारो का विवेचन हुंजा है वस्तुतः उसमे अलङ्कारो के प्रयोगमाच्र है अलङ्कारो के नामं नहीं नामों को कल्पना जयमंगलाकारनेकीहै, जो बहुत अंश मे अशुद्ध है "वार्ताः को भामह के अनुसार अलङ्कार बतलाना उसका प्रमाण है देखिए यहीं अआगे--

२. एसे अनेक स्थ डों० ३०, म० म० काणे, श्रीपोदार जी आदि ने उद्धृत किए हँ इनमें प्रसिद्ध है हेतु सूक्ष्म आदि अलंकारो से सम्बद्ध स्थल दण्डी कहते हँ- तुर्व सूष्ष्मडेशौ वाचामुकत्तमभरुषणम्‌" ओर इनका निरूपण ६७ कारिकां मे करते है वहं वे--“गतोऽस्तमकों भातीन्दुर्यान्ति वासाय पक्तिणः।

इतीदमपि साध्वेव कारावस्थानिवेदने ॥*-- यह उदाहरण देते है

भामह कहते दै--हितुश्च सूचमो छेशोऽथ नाटंकारतया मतः

ससुदायाभिधानस्य वक्रोक्त्यनभिधानतः॥

गतोऽस्तमकों भातीन्दुर्यान्ति वासाय पक्तिणः

इत्येवमादि कि कान्य वार्तामितां प्रचक्षते ॥' २८६-८७ जो इन कारिकाओंको भाषाकी दृष्टि से पठेगा वह्‌ समक्न जाएगा कि अव्य ही दण्डीकी कारिका पहले कीटहै। दण्डीनामल्ते है तीन अलङ्कारो का किन्तु उनके किए प्रयोग करते है भूषणम्‌" इस प्रकार एकवचन का चाहिए था भूषणानिः। भामह इसका सुधार | करते ओर मतः" मे एकवचन ही रखते हुए यह्‌ बतलति हँ कि यदि भुषणम्‌ ही लिखना हे तो सूक्ष्मलेशौ न॒ लिखकर सुक्ष्म ठेशोऽथ' इस प्रकार अलग अलग छिखना

३अ० भू |

( ,

भामह [ ७००-७२५ ई० | भामह ने अपने काव्यालद्धारमें दण्डी के कुछ अलद्भारोको साना, कुछ को नहीं ओर कुछ अल्ङ्कारोको अपनो ओरसे नवीन अलङ्कारोंके ख्पमें प्रस्तुत किया इनका विवरण--

( ) अमान्य अद्ङ्ार--आवृत्ति, हेतु, सूक्ष्म, ठेश तथा चित्र

( २) मान्य अटद्ार- स्वभावोक्ति, उपमा, रूपक्र, दीपक, आक्षेप, अर्थान्तर- न्यास, व्यतिरेक, विभावना, समासोक्ति, अतिशयोक्ति, उत्प्रेक्षा, क्रम (यथासंख्य नाम से) प्रेय, रसवत्‌, ऊजंस्वि, पर्यायोक्त, समाहित, उदात्त, अपह्लुति, इटेष, विशेषोक्ति, तुल्ययोगिता, विरोध, प्रस्तुतप्रशंसा, व्याजस्तुति, निदशना, खहोक्ति, परिवृत्ति, आीः, संसृष्टि, भाविक

- तथा यमक ।' (३ ) स्वकट्पित-( १) अनुप्रास (२) उपमारूपकं (३) उत्प्रक्षावयव ( ) उपमेयोपमा (५) सन्देह (६ ) अनन्वय इस प्रकार भामह तक कुरु अकारो की संख्या ४३ हो जाती है उनमेसे भामह दण्डीके ३२ तथा अपने इसप्रकार कठ २३८ अलकार स्वीकार करते दैँ। हेतु,

चाहिए यदि भामह स्वयं इसे छिखते तो हितुः सृक्ष्मस्च टेशरच'-एेसा क्िखते

€हेतुरचः- लिखना भी दण्डी की ही उक्ति को उद्धृत करना है यर्हा-

यह्‌ कहना कि दोनों ने किसी एक अन्यस्रोतसेये अंश अपनाए ह-- संस्कृतभाषा की अभिव्यक्ति से अनथिन्ञता प्रकट करना है आनन्दवधन ओर महिमभदट्रु कौ नोँकक्चोक पर उनका ध्यान जाना चाहिए इतने पर भी डं० ३, पोहार, डँ° रामचन्द्र ह्िविदी आदि भामह को ही पूर्ववर्ती मानते है। म०म०काणेने हमारे इस भाषा सम्बन्धी तक प्रतो ध्यान नहीं दिया है, परन्तु माना दण्डी को ही पूवंवर्ती है [ द° प्राण 3. ए०लठ5 थ. 4. ६876, ए. 124, 1951. |

दण्डी का अलङ्कारविवेचन भी बतलाताहै किवे उस समयके आचाय दै जव अलङ्कारो के विवेचन में अधिक सूष्ष्मता नहीं थी भामह इसके विरुद अधिक सूक्ष्मता के साथ अलङ्कारो का निरूपण करते दिखाई देते हें क्या सूक्ष्मता स्थूलता को जन्म देती हं जो दण्डी को परवर्ती माना जाता है? अवश्यही भामहदण्डीके ऋणी हैभलेहीवे दण्डीकानामन ले मलद्कारविमशिनी में क्या रत्नाकर का नाम विमशिनीकार ने एक बार भी लिया? तो क्या यह्‌ कह दिया जाए कि विम्चिनी रत्नाकर से पहले की है ओर रत्नाकर ने ही विमशशिनीसे प्रेरणा पार है?

१. ( * ) 9. 1. 06. प्राभनङ़रजा ऽक्ाशता६ ००४०8, ए. 49-50

( २) ९.४. ६916. 1951. ?. 124

47 3)

( २५ )

सुक्ष्म ओर कातो भामह ने खण्डन भी किया है उनके संदेह ओर उपमेयोपमा

दण्डी कौ संशयोपमा तथा अन्योन्योपमा की ही पीठिका पर आधुत है। दण्डीने इन्है

उपमासे पृथक्‌ नहीं माना था। भामह ने इनमें पृथक्‌ अलंकारत्व देखा उत्परेक्षावयव .

उत्प्रेक्षा तथा उपमारूपक रूपक के चिन्तन का ही आंशिक परिवत्तन है, जो पृथगरकारत्व

के लिए अपयय्प्ति है ओर इसीलिए जिसे परवर्ती आचार्यो ते मान्यता नहीं दी उद्धर | ७५०-८०० ई० | उद्वट ने अपने कान्याकारसंग्रहमे दण्डी की अपेक्षा भामह को अधिक महत्त्व दिया यद्यपि उन्होने स्वतन्त्र चिन्तन से काम लिया उन्होने दण्डी ओौर भामह दोनो के

\छ अलकारोंको अलंकार मानते हुए अपनी ओर से भी कुछ अलंकारो की कल्पना

कौ उनके अनुसार अलंकारो का विवरण-

( ) अमान्य (क ) दण्डी के--आवृत्ति, हेतु, सुक्ष्म, टेश, आक्ली, यमक तथा चित्र

(ख ) भामह के-उपमारूपक तथा उत्प्रेक्षावयव

(२) मान्य (क) दण्डी के--उपमा, रूपक, दीपक, आक्षेप, अर्थान्तरन्यास, व्यतिरेक, विभावना, समासोक्ति, अतिशयोक्ति, यथासंख्य, उप्क्षा, स्वभावोक्ति, प्रेय, रसवत्‌, ऊज॑स्वि, पययोक्त, समा- हित, उदात्त, रिलष्र, अपहुति, विशेषोक्ति, विरोध, तुल्ययोगिता, अ्रसतुत्रशसा, व्याजस्तुति, निदशेना [ विदर्ना नाम से |, सहोक्ति, परिवृत्ति, संसृष्टि, तथा भाविक

( ) भामह्‌ के-अनुप्रास, उपमेयोपमा, सन्देह तथा अनन्वय

(३ ) स्वकरट्पित ( ) पुनरुक्तवदाभास ( २) छेकानुप्रास (३) लाटानुप्रास (४) प्रतिवस्तुपमा { ५) काव्यर्गि (६) दृष्टान्त तथा ( ) संकर इन स्वकल्पित अलंकारो में से उद्धट की अत्यन्त मौलिकता केवल पुनशक्तवदाभास मेटे। अनुप्रासो मे लाटानुप्रास भामह ने अनुप्रास के अन्ताग॑त मान लिया था, उद्धट ने उसे केवल स्वतन्त्र अलंकार के रूपमे गिन दियाहै। छेकानुप्रास उनकी भामह के प्राम्यानुप्रास कौ कल्पना पर एक विरोधी कल्पना है याम्य के विरु सेक का अथं विदग्ध कियाजाताहै। प्रतिवस्तूपमा को दण्डी उपमा के अन्तगतं भिना चुके थे काव्यल्गिभीहैतु केदो भेदो में से एक का स्वतन्त्रीकरण है, किन्तु यह्‌ अनुमान

अधिक समीप है दृष्टान्त प्रतिवस्तूपमा की छाया पर एक स्वतन्त्र कल्पना है ओर

संकर संमृष्टिकी छया पर तीनों अनुप्रासो को एक अनुप्रास के तीनभेदन मानकर

तीन स्वतन्त्र अलंकार मानता हुआ उद्धट को इसलिए माना जाता है कि उन्होने रत्येकं अलंकार के भेद उस अलंकार के लक्षणके बाद दिए ह, वर्ग के आरम्भ मे सबके नाम को तालिका मे नहीं अनुप्रास के भेद नाम-ताछ्किामे ही दे दिये है ।.

इस प्रकार दण्डो से लेकर उद्धट के समय तक अलङ्कारो की संख्या ५० हो नाती

( ३६ ) है 19 इनमें वे दण्डीके ३७ अरंकारोंमेंसे केवल ३०, भामह के अलङ्कारो स्वकल्पित ६्मेंसे केवल अपना कर केवल ३४ अरुंकार प्राचीन आचार्यो से अपनाते हँ तथा अलंकारो की कल्पना अपनी ओर से करते हैँ फलतः वे कुल ४१ अलंकार मानते है वस्तुतः तीनों अनुप्रासो को एक अलङ्कार मान लेने पर उद्धटको मान्य अलङ्कारो की संख्या केवल ३९ रहती टै वामन | ८०० ई० | उद्धट के समकाटीन चायं वामन ने.भी अपनी "कान्यलद्धुरसूत्रवृत्ति' मे भामह को अधिक महत्व दिया उनके अनुसार अलङ्कारो का विवरण-- ( ) अमान्य ( ) दण्डी के-- स्वभावोक्ति, आवृत्ति, हेतु, सृक्ष्प, लेश, रसवत्‌, प्रेय, अजस्वि, पर्ययोक्ति, उदात्त, भाविक, आशीः, चित्र (ख ) भामह के-उपमार्पक तथा उत्प्रेक्षावयव (२) मान्य (क) दण्डी के--उपमा, समासोक्ति, अप्रस्तुतप्रशंसा, अपहति, रूपक, इटेष, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, विरोध, विभावना, परिवृत्ति, क्रम, दीपक, निदशना, अर्थान्तरम्यास, व्यतिरेक, विशेषोक्ति, व्याजस्तुति, तुल्ययोगिता, आक्षेप, सहोक्ति, समाहित, संघृष्ट तथा यमक्र। ( ) भामह के- सन्देह, अनन्वय, अनुप्रास तथा उपमेयोपमा (३ ) स्वकट्पित ( ) वक्रोक्ति ( २) व्याजोक्ति (३) प्रतिवस्तुपमा इस प्रकार वामन तक अल््कारोंकी संख्या ५२ दहो जाती हैः इनमे से वामन स्वयं अल्ङ्कुारोंकी कल्पना करते ह! वे अलंकार भामहके तथा २४ अलङ्कार दण्डी के अपनाते ओर इस प्रकार कुल मिलाकर ३१ अलच्कार स्वीकार करते हैँ अथं यह हुआ करि दण्डीसे वामन तक २१ अलद्धार विवादास्पद थे। यदि उद्धट की स्वकल्पित वक्रोक्ति ओर व्याजोक्ति को नवीन सानकर इन विवादास्पद अलङ्कारो मे अभी गिन तो उनकी संख्या १९ वचती

सद्र [ ८२५-८७५ ई० | उद्धट ओौर वामन के पश्चातु अलङ्कारचिन्तन में अधिक स्वस्थता ओौर अधिक वेज्ञानिकता आई चिन्तकों ने अल््धायें का वर्गकरणं सजातीयता तथा विजातीयता 1 2 ५.

१. डा० राममूति त्रिपाठी ने "चित्रः को गणनादछोडदी दहै अतः वे दण्डी से उदुभट तक अल्द्धारों की संख्या ४९ बतलाते है द्रष्टव्य डंशत्रिपाठी की काव्यालङ्कार सारसंग्रह्‌ की भूमिका प° २८-२९

२. प्रतिवस्तूपमा की कल्पना उद्धटने की है, अतः वामन तक कुल अलंकारो कौ सख्या ५२ हौ होती हे, ५३ नहीं यद्यपि डं० रामचन्द्र द्विवेदी ने ५५ संख्या लिललदी देखिए-- भलद्कुारमीमांसा पृ० १५५

(हि या-द == नयी --- =-= ~

( ३७ )

के आधार पर ठीक उसी प्रकार करना आरम्भ किया जिस प्रकार वैशेषिक सूत्रों में पदार्थो का वर्गाकिरण महर्षि कणादने कियाथा। यहु वर्गीकरण खबसे पहले स्द्रट के काव्यालङ्कार" मे मिलतादहै।

रुद्रट ने अलङ्कारो को पहले तो “शाब्द' ओर अ्थं'के दो खण्डों मे विभाजिते किया, फिर अर्थाल्द्भारो को ( १) वास्तव (२) आओौपम्य (३) अतिशय तथा (४ ) उष नामक चार वर्गोमें।

इन दोनों खण्डों ओर वर्गोमे श््रटने ६२ अल्ङ्धारोंका निरूपण किया इनमे से खपरट ने पुववर्ती आचार्यो के केवल २७ अलङ्कार ही लिए, शेष ३५ अलङ्कारो की कल्पना स्वतन्त्र अल्द्धुारके रूपमे उन्होने स्वयंकीहै। इनमें से अलङ्कारो को एक हीनामसे दो-दो बार गिनाया अतः कुछ विद्वानों ने उनके द्वारा निरूपित अलङ्कारो की संख्या सत्तावन सानी है इनका विवरण इस प्रकार है--

( ) अमान्य ( ) दण्डी के--आवृत्ति, आद्यीः, अतिशयोक्ति, तुल्ययोगिता, रसवत्‌, प्रेय, ऊजंस्वि, भाविक, पर्यायोक्त, समाहित, विशेषोक्ति, हेतु, संसृष्टि

( ) भामह के--उपमेयोपमा, अनन्वय, उपमारूक, उत्प्र्षावयव

( ) उद्धट के पुनरुक्तवदाभास, येकानूप्रास, लाटानुप्रास, प्रति- वस्तूपमा, काव्यक्ग, संकरः | पृथगलङ्कार के रूप में ]

(घ ) वामन को--वक्रोक्तिर, व्याजोक्ति

(२) मान्य (क) दण्डी के--स्वभावोक्ति[ जाति नामसे |, उपमा, रूपक, दीपक, आक्षेप, अर्थान्तरन्यास, व्यतिरेक, विभावना, समासोक्ति, उत्प्रेक्षा, सुक्ष्म, केश, क्रम [ यथासंख्य. नाम से ], उदात्त [ अवसर नाम से | भपहुति, रलेष, विरोध, अग्रस्तुतप्र्ंसा [ अन्योक्ति नाम से |, व्याजस्तुति, निदशना, सहोक्ति, परिवृत्ति, यमक, चित्र

( ) भामह के-- अनुप्रास, सन्देह | संशय नाम से | (ग ) उद्धट के--टष्टान्त, | वामन से कुछ नहीं |

-_-___---

१. भतिशयोक्ति नाम से सद्रटने कोई स्वतन्त्र अलङ्कार नहीं माना उसके प्रायः वे सभीभेदजोदण्डीने माने थे रुद्रटः ने अतिशय-वगं के अलङ्कारो मे गिन किए है

२. शुद्रटने संकर पर विचार किया दहै, किन्तु उनके प्रतिपादनसे यह स्पष्ट नहीं हैकिवे उसे पृथक्‌ अलङ्कार मानते है

३. सुद्रट ने वक्रोक्ति नामक एक अलङ्कार मानादै, किन्तु वह्‌ स्वरूपतः वामन को वक्रोक्ति से भिन्न दहै।

( ३८

(३ ) स्वकदिपत १-२. समुच्चय, २. भाव, ४. पर्याय, ५. विषम, ६. अनुमान,

७. परिकर, =. परिसंख्या, ९. टतु [नवीन १०. कारणमाला, ११. अन्योन्य, १२-१३. उत्तर, १४. सार, १५. मीलित, १६. एकावली, १७. मत, १८. प्रतीप, १९. उभयन्या्च, २०. श्रान्तिमान्‌, २९१. प्रत्यनीक, २२-२३. पठे, २४. साम्य, २५. स्मरण, २६. विदोष, २७. तद्गुण, २८. पिहित, २९. असंगति, ३०. व्याघात, ३१. अहेतु, ३२. अधिक, ३३. वक्रोक्ति २४. सहोक्ति, ३५. दटेष [ तीनों नवीन |

इस प्रकार रुद्रट ने अलङ्कारो की संल्या ६२ मानीदहैः।

इन सव अलारं का वर्गीकरण स्द्रट ते इस प्रकारसे किया दै-

| कं | दाब्द्‌ाटह्कार १. वक्रोक्ति, २. अनुप्रा्, २३. यमक, ४. रडेष, ५. चित्र [ ] अर्थाललकार १. वास्तववगं १. सहोक्ति, २. समुच्चय, ३. जाति [ स्वभावोक्ति | +, यथासंख्य, ५. भाव, ६. पर्याय, ७. विषम, ८. अनुमान, ९. दीपक, १०. परिकर, १९१. परिवृत्ति, १२. परिसंख्या, १३. हेतु, १४. कारणमाला, १५. व्यतिरेक, १६. अन्योन्य, १७. उत्तर, १८. सार, १९. सूक्ष्म, २०. टेश, २१. अवसर, २२. मीलित, २३. एकावली २. ओपम्यवग १. उपमा, २. उत्प्रेक्षा, ३. रूपक, ४. अपहति, ५. संशय, | ६. समासोक्ति, ७. मत, ८. उत्तर, . ९. अन्योक्ति, १०. प्रतीप, ११. अर्थान्तरन्यास, १२. उभयन्यास, १३. श्रान्तिमान्‌, १४. आक्षेप, १५ प्रत्यनीक, १६. दृष्टान्त, १७. पूर्व, १८. सहोक्ति, १९ समुच्चय, २० साम्य, २१ स्मरण। २. अतिशयदगं 40 पूव, २. विशेष, ३. उत्प्रेक्षा, ४. विभावना, ५. तद्गुणः ९. अधिक, ७. विरोध, ८. विषम, ९. असंगति, १०. पिहित, ११. व्याघात, १२. अहेतु ४. रटेषवगं उडेष

(काना

१. पोदारजीने शद्रटके अलंकारो की संख्या ५५ बतलाईहै। वे अहेतु तथा वक्रोक्ति की गणना करना भूक गए है इन्होनि रदरट मे उदात्त का भी अभाव मानाहै, वस्तुतः श्द्रटने इसे 'जवसर' नामसे अपना लियाहै। पोहारजी ने भवस्र की गणना कर रीहै। द्रष्टव्य स्व० कर्हैयाकल जी पोहार का 'संस्कृतसाहित्य का इतहाय' पर ९३. |

कृण

( ३६ )

उक्त विवरणं से स्पष्ठहै किशुद्रट ने सहोक्ति, समुच्चय, पुव, इलेष तथा उत्तर इन्‌ पाच की गणना दो-दो बारकीदहै। उद्धटमें अनुप्रासभेदों को स्वतंत्र अल्द्धार माना गया है, अतः स्द्रट के अनुखार अलंकारो की संख्या ६२ ही मानी जानी चाहिए

उक्त विदलेषण से यह भी स्पष्ट है कि अलङ्कारो कौ संख्या दण्डी से रुद्रट तक ८७ ( सत्तासी ) तक पर्ुच जाती हे

रुदरट का महत्व हमे तब विदित होता है जब हम भोजके सरस्वतीकण्ठाभरण ओर मम्मट कै कान्यप्रकाञ्च पर ध्यान देते

भोज [ १०००-१०५० ई० | भोज ने अपने सरस्वतीकण्ठाभरण मे अल्कारों का विभाजन शब्दालङ्कार, अर्था, लङ्कार तथा उभयाल्कारके रूप मे किया उन्होने प्रत्येक वगं के २४, २४ अरु्ार माने फलतः उनके गलङ्धारों को संख्या ७२ हो जाती है विवरण्‌--

(१) अमान्य (क) दण्डो कै--आवृत्ति, प्रेय, रखवत्‌, ऊजंस्वि, पर्यायोक्त, उदात्त, व्याजस्तुति, आशीः,

(ख) भामह के--उपमारूपक, उत्प्क्षावयव, उपमेयोपमा (उपमा मे, अनन्वय ( उपमामेदही),

(ग) उद्धट के-- पुनरुक्तवदाभास, छेकानुप्रास, काटानुप्रास, प्रतिवस्तूपमा ( उपमा में ), दृष्टान्त ( उपमा मे ), संकर ( संभृष्टि में )

(घ) वामन के-- वक्रोक्ति, व्याजोक्ति,

(ड) रुदरट के--उभयन्यास, प्रतीप (साम्य मे), प्रत्यनीक, पूव, [दोनो] पिहित, मत, विषम, व्याघात, विशेष, सार, अधिक, असंगति, एकावली, कारणमाला, हेतु, तदहुण, परिसंख्या, सहोक्ति, ( १), उत्तर ( १), समुच्चय (१)

(र) मान्य (क) दण्डी के--यमक, इलेष, चित्र, जाति, विभावना, हेतु (काग्य- लिग सहित), सूष्ष्म, विरोध, परिवृत्ति, निदशना, व्यतिरेक (भेद नाम से); समाहित, उपमा, रूपक, अपहुति, समासोक्ति, उत्प्रक्ता, अप्रस्तुतप्रशंसा, तुल्ययोगिता, लेश, खहोर्वित, आक्षेप, अर्थान्तर- न्यास, विशेषोक्ति, दीपक, करम, अतिशयोक्ति, भाविक, संसृष्टि,

(ख) भामह के--अनुप्रास, सन्देह (संशय नाम से),

(ग) उद्धट का--काव्यल्गि [ हेतु मे|

(घ) रद्रट के --अहेतु, उत्तर (१), अन्योन्य, भ्रान्ति, मीलित, भाव, स्मृति [ स्मरण ], शब्ददलेष, अनुमान, साम्य, समुच्चय, परिकर, पर्याय, वक्रोक्ति | वाकोवाक्य मे |

(२) स्वकर्पित १. जाति ( शब्दालङ्कार }, २. गति, ३. रीति, ४. वृत्ति,

(

५. छाया, ६. मुद्रा, ७. उक्ति, ८. युक्ति, ९. भणिति, १०. गृम्फना ११. शय्या, १२. पटिति, १३. वाकोवाक्य, १४ प्रहेलिका, १५. गूढ, १६ प्रदनोत्तर, १७. अध्येय, १८. श्रव्य, ९१. त्रह्य, २०. अभिनीति, २९१. संभव, २२. वितकं, ¬ २. प्रत्यक्ष, २४. आगम २५. उपमान, २६. अर्थापत्ति, २७. अभाव, २८. समाधि इन अलङ्कारो का वर्गीकरण शब्द, अथं तथा शब्दार्थयुगम दोनों के तीन वर्गोमें भोजराज ने इस प्रकार किया है--

(१) छाब्द्वगं जाति, गति, रीति, वृत्ति, छाया, मुद्रा, उक्ति, युक्ति, भणिति, गुम्फना, शय्या, पटिति, यमक, उटेष, अनुप्रा्, चित्र, वाकोवाक्य,

| ्रहेलिका, गढ, प्ररनोत्तर, अध्येय, श्चव्य, प्रक्ष्य, अभिनीति

(२) अथंवगं जाति, विभावना, ठत, अहेतु, सूक्ष्म, उत्तर, विरोध, संभव अन्योन्य, परिवृत्ति, निदशंना, भेद ( व्यतिरेक ), समाहित, भ्रान्ति वितकं, मीलित, स्मृति, भाव, प्रत्यक्ष, अनुमान, भागम, उपमान, अर्थापत्ति, अभाव

(३) उभयवगं उपमा, रूपक, साम्य, संशय, अपहुति, समाधि, समासोक्ति उत्प्रेक्षा, अप्रस्तुतप्रशंसा, तुल्ययोगिता, केश, सहोक्ति, समुच्चय आक्षेप, अर्थान्तरन्यास, विशेषोक्ति, परिकर, दीपक, करम पर्याय अतिशयोक्ति, इडेव, भाविक, संसृष्टि

इनमे जाति ओर इ्टेष दो-दो बार आए है इनमेसेव्छेषतो दो रूपों मे रद्रट भी माना था, जाति का अर्थालङ्कारगत हप स्वभावोक्तिसे अभिन्न दै। इसप्रकार केवल चब्दजाति की कल्पना भोज की अभिनव कल्पना ठहर्ती हे

इस प्रकार भोजराज तक्र बलङ्कासें की संख्या ११५ हो जाती है अर्थात्‌ ८७ प्राचीन तथा २८ भोज के स्वोपन्ञ नवीन इनमें से भोज ने दण्डी के पश्चात्‌ रद्रट से ही सबसे अधिक ापूत्तिकीहै। शुद्रटके कान्याकंकारसे भोजने १६ उदाहरणपच भी" लिए हैं।

1

१. (१) सरस्वतीकण्ठाभरण उदाहुरण्‌ २।८; काव्यारंकार उदाहरण ४१९, (२) स. क. उ. ३।६६, का. ७।५५, (३) स. क. उ. ३।१५२, का. ७।५७, (

४) स. क. उ. ३।१५९१, का. ७।६०) (५) स. कं उ. ३।९३, . का. ७।८७,

(६) स. क, ३।५७, का ७।९७, (७) स. क. उ. ४।२०४, का. ७।१५०

(८) स. क.उ. ४९, का. ८।६, (९) स. क. उ. ४१, का. ८।१८. (१०) स. क. उ. ४।४, का. ८।२०, (११) स. क. उ. ४1१७, का. ८।२०, (१२) स. क. उ. ४।१८, का. ८।३१, (१३) क. उ. ५५३०, का. ८।९०) (१४) स. क. उ. ४।५८, का. ८'७८, (१५) स. क. उ. ४।६३, का. ८।१००' (१६) स. क. उ. १।५९, का. ११।१३.

( ४१ )

यद्यपि भोजराज का अलंकारविवेचन अपने आप मे एक विशार विषय है तथापि उनकी स्थापनाणं अपनी मीलिकतामे इतनी स्पष्ट कि विचार केवल उनके दारा अमान्य अलंकारो के अन्तर्भाव या सर्वथा प्रत्याख्यान के अनुसंधान में करना होता हे हमने यर्हां जो विवरण द्या है उससे इस अनुसंधान मं प्यपप्त सहायता मिक सकती है

मभ्मट | १०५०-११०० ई० |

मम्मट ने पूववरत्ती सभी आचार्यो से मधुकरी टो ओर काव्यप्रकाश मे उन सबका समन्वय करना चाहा यद्यपि यह भी सत्यहैकि मम्मट अलद्कारचिन्तन में उतनी व्यवस्था नही का सके है जितनी व्यवस्था वे रस, ध्वनि ओर दोषों के चिन्तन मेँ काते दिखाई देते है अलंकारं मे वे लडखडाते दिखाई देते है, विशेषत अलंकारो मे। इसका कारण उनका वार्धंक्य या अस्वास्थ्य हो सक्ता है यह तो प्रसिद्ध रहैकिवे "परिकरालंकारः" के आगे अर्थाकुकासो का विवेचन नहीं कर पाए थे। अवरिष्ट अंशको पूति किसी अलक, अल्टया अल्लट ने की है

मम्मटने अलंकारो को भोजकीही नाद्व शब्द, अथं ओर दोनों के तीन वगो मे विभक्त किया विवरण-

१. अमान्य ( ) दण्डी के--आवृत्ति, आशीः, प्रेय, ऊज॑स्वि, रसवत्‌, हेतु, लेश, ( ) भामह के--उपमारूपक [ भोज द्वारा खण्डित | उतपरक्षावयव [ भोज द्वारा खण्डित |

( ) उद्धट के चकानुप्रास, काटानुप्रास [ पृथक्‌ अलंकार के रूपमे |

( ) वामन-- वक्रोक्ति

( ) रुद्रट के--भाव, हेतु, मत, उभयन्यास | भोज दारा खण्डित |, पूरं [ दोनों भेद अतिशयोक्ति मे |, साम्य, अहेतु, सहोक्ति ( ) समुच्चय ( १) | दीपकमें |

( ) भोज के--जाति [ शाब्दगत ], गति, रीति, वृत्ति, छाया, सुद्र, उक्त, युक्ति, भणिति, गुम्फना, शाग्या, पटिति, वाकोवाक्य, प्रहेलिका, गढ, प्रदनोत्तर, अध्येय, श्रव्य, प्रक्ष्य, अभिनीति, संभव, वितकं, प्रत्यक्ष, आगम, उपमान, अर्थापत्ति, अभाव, समाधिः

१. इस पर सागरिका ९।२ मे देखिए हूमारा-'मम्मटाभिमतं लक्षणायाः षडिवधत्वं हेत्वलंकारश्च' लेख, इसमे हमने बतलाया है कि हेत्वल्कार ओर काव्यल्गाटकार सें से हेत्‌ ही अलंकार दै तथा का्यलिग ही अलंकार नहीं है

२. पम्मट ने जिसे समाधि कहा है वहु भोज के अनुसार समाहित है! भोज की समाधि मम्मट के सामान्य से मिल्तीदहै।

( )

२. मान्य (क) दण्डी के--स्वभावोक्ति, उपमा, रूपक, दीपक, आक्षेप, अर्थान्तर- न्यास, व्यतिरेक, विभावना, समासोक्ति, अतिशयोक्ति, उत्प्रेक्षा, सूक्ष्म, यथासंख्य, पर्यायोक्त, समाहित [ समाधि नाम से |, उदात्त, अपहुति, इटेष, विशेषोक्ति, तुल्ययोगिता, विरोध, अप्रस्तुतप्रशंसा, व्याजस्तुति, निदशना, सहोक्तिं परित्रत्ति, भाविक, संसृष्टि, यमक, चित्र

(ख ) भामह के-अनुप्रास [ किन्तु उद्‌भटके ढंग पर |, अनन्वय, उपमेयोपमा, सन्देह

( ) उदुभट के--[ येकरानूप्रास किन्तु अप्रेथक्‌ | पुनरुक्तवदाभास, प्रति- वस्तूपमा, काव्यलिग, दृष्ान्त, संकर

( ) वामन को--व्याजोक्ति।

( डः } रद्रट के-- वक्रोक्ति, दटेष [ शब्दगत |, समुच्चय, पर्याय, विषय, अनुमान, परिकर, परिसंख्या, कारणमाला, अन्योन्य, उत्तर [दोनों |, सार, मीलित, एकावली, प्रतीप, भ्रान्तिमान्‌, प्रत्यनीक, स्मरण, विशेष, तद्गुण, पिहित [ सामान्य नाम से |, असंगति, व्याघात, अधिक

(च ) भाज का-मारादीपक [ दीपक से अलग कर |

३. स्वकटिपत १. विनोक्ति (२) सम (३) अतद्गुण"

प्रकार मम्मट तक अक्करारो कौ संख्या ११८ हो जाती है अर्थात्‌ ११५ भोज तक के तथा स्वयं मम्मटके इनमे से मम्मटने केवर ६८ अलंकारो को अटंकाररूप में स्वीकार किया, दोष ५० को नहीं

मार्मिक तथ्य यहहै क्रि मम्मटने भोज को सवथा अमान्य कर दिया, जबकि शुद्र

उन्होने २४ अरकार अपनाए इन २४ अक्कारोंका अनुक्रमभी प्रायः वहीहै जो सद्रव्यें पाया जाता दहै। अनेक उदाहरण भी उन्होने ज्योंके त्यों अपना किए है शब्दव्डेष तो रदरट की पूणं प्रतिचपि है।

स्पष्ठही मम्मटने दण्डी ओर रुद्रट को अधिक महर्व दिया ओर उनके अलंकारों को विपुल माच्रा में अपनाया बीचके आवचार्योसे भौ उन्होने ग्राह्य विच्छित्तियों का चयन किया किन्तु यहां यह्‌ तथ्य स्पष्टल्पसे समक्षलेना होगाकि मम्मटनेजो

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१. अतदुगुण नामस एकमभेद भोजने भी प्रस्तुत क्ियादै, किन्तु उसे उन्होने मीलित कै अन्तगंत गिना दै मौर उसका जो लक्षण दिया है वह्‌ मम्मटके अतदुगुणसे सवंथा भिन्न है

( ४३ )

अलंकार दण्डी से लिए हैँ उनके लक्षणल्पी उस जल को उन्होने अपने प्रातिभ पटसे

छान कर अपनाया है, जिसे भामह ओर उद्‌भट अपनी बुद्धिचालनी से छान चुके थे?

मम्मटने इन अलंकारोंको निम्नलिखित वर्गोमे निम्नलिखित क्रमसे विभक्त किथा--

१. शब्द्‌ाटंकारवगं वक्रोक्ति, अनुप्रास, यमक, सटेष, चित्र, पुनरुक्तवदाभास

२. अर्थालंकारवगे उपमा, अनन्वय, उपमेयोपमा, उत्प्रेक्षा, संदेह्‌, रूपक, अपहुति, उटेष, समासोक्ति, निदशना, अप्रस्तुतप्रशंसा, अतिशयोक्ति, प्रति- वस्तूपमा, दृष्टान्त, दीपक, मालादीपक, तुल्ययोगिता, व्यतिरेक, आक्षेप, विभावना, विशेषोक्ति, यथासंख्य, अर्थान्तरन्यास, विरोध, स्वभावोक्ति, व्याजस्तुति, सहोक्ति, विनोक्ति, परिवृत्ति, भाविक, कान्यलिग, पर्यायोक्त, उदात्त, समुच्चय, पर्याय, अनुमान, परिकर, व्याजोक्ति, परिसंख्या, कारणमाला, अन्योन्य, उत्तर, सक्षम, सार, असंगति, समाधि, सम, विषम, अधिक, प्रत्यनीक, मोलित, एकावली, स्मरण, ओ्रान्तिमान्‌, प्रतीप, सामान्य, विशेष, तद्गुण, अतद्गुण, व्याघात, संसृष्टि, संकर

३. उभयालकार पुनरुक्तवदाभासः

मम्मट के इस वर्गीकरणसे स्पष्टहै कि उन्होने रुद्रट के वास्तव, ओौपम्थ, अतिशय

मौर इङेष इन वर्गों ओर उनके उक्त क्रम को महत्व नहीं दिया। केवल साहदयमुरक अलंकारो को भी एक साथ नहीं गिनाया उनमें गिने जाने योग्य स्मरण ओर भान्ति मात्‌ को उल्लास समाप्त करते-करते याद करिया यदि उन्होने परिकर तक ही दशम उल्लास का निर्माण किया हो, तब भी साहर्यमूलक अलंकारोंके बादवे १८ अलंकारो का निवेचन करने का अवसर पाए हृए हैँ इतना अवसर स्मरण को स्मरण करने ओर भ्रान्तिमान्‌ के प्रति भ्रान्तिमान्‌ बनने के किए पर्याप्त था। साहश्यमुलक अकंकारों मे मम्मट ने साह्येतर-सम्बन्धमुलक विच्छित्तियों को मिधित कर दिया, इसलिए अत्ति- रयोक्ति मे कायेकारणभाव के पौर्वापयं के विपर्यय से होने वाली अतिशयोक्ति कोभी गिन जिया ओर प्रस्तुतान्यता तथा यदर्थोक्ति से होने वाटी अतिशयोक्तिकोभी। र्द्रट ने पूवनाम केदो अलंकार मानकर इस दिशा मे सावधानी बरतो थी, परन्तु मम्मटं को

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१. यद्यपि कहीं-कहीं मम्मट की बुद्धि चालनी सिद्ध हर है ओर भामह तथा उद्भट की प्रतिभार्ही पट।

९. मभ्मट ने श्द्रट ओर भोज की यह स्थापना स्वीकार की है कि अन्य अकंकार भी उभयार्कार हो सक्ते हैँ उनने इन्ह उभयाकंकारो मे यह्‌ कहकर नहीं गिनाया कि प्राचीन आचार [ भामह, उदुभेट ] ने वैखा नहीं किया है

( ४४ )

दोनों अतिशय अभिन्न ही समञ्च मे आए, गोघृत जीर वनस्पति मे उन्हं कोई फर नहीं छगा 9

ख्य्यक [ ११००-११५० ई० |

र्य्यक या रुचक को यह भौर ठेस ही अन्य कमिर्यां खटकीं। इनके परिहार के लिए उन्होने प्रस्तुत ग्रन्थके सूत्रों का अंकारसूत्रः नाम से निर्माण क्रिया इनमें उन्होने अलंकारो को उनकी सजातीयता के आधार पर यथाश्चक्य वर्गङ्कित किया पठले उन्होनि मम्मट के ही अनुसार अकंकारों को मुख्यतः शब्द ओर अर्थके दो भागोंमें वाटा, फिर उनमें से प्रत्येक भाग के अलंकासोंका वर्गीकरण किया दण्डी से मम्मट तक ११०८ अल्कारोमें से रुग्यकर ने ७५ अलंकार अपनाए ओर अलंकारोंकी कल्पना अपनी ओरसे को इनका विवरण यह्‌ है--

(१) अमान्य ( ) दण्डी के--आवृत्ति, हेत, जेष, आशीः ( ) भामह के--उत्प्रक्षावयव, उपमारूपक (म ) वामन की-वक्रोक्ति। ( ) भोज के--अर्थापत्ति जीर समाहित को छोडकर शेष २५ सो (ङः ) खद्रट के--भाव, हेतु, मत, उभन्यास, पूवं [ दोनों |, अहेतु, सहोक्ति (१), उत्तर (१) समुच्चय (१) अथंरटेष (२) मान्य (क ) दण्डी के--स्वभावोक्ति, उपमा, रूपक, दीपक, आक्षेप अर्थान्तर न्यास, व्यतिरेक, विभावना, सखमासोवित, अतिशयोकित ( १) अतिशयोक्ति (२), उत्प्रक्षा, सूक्ष्म, क्रम (यथासंख्य), रसवत्‌, प्रय, ऊजंस्वी, समाहित (समाधि), पर्यायोक्त, उदात्त, अपति, इटेष, विशेषोक्ति, तुल्ययोगिता, विरोध, अप्रस्तुतप्रशंसा, व्याजस्तुति, निद शना, सहोक्ति, परिवृत्ति, संसृष्ट, भाविक, यमक, चित्र ( ) भामह के--अनुप्रास, उपमेयोपमा, अनन्वय, संदेह ( ) उद्धट के--पुनरुक्तवदाभास, लेकानुप्रास, काटानुप्रास, प्रति- वस्तूपमा, कान्यकिग, दृष्ठान्त, संकर ( ) वामन को-- व्याजोक्ति

\ डः ) शुद्रट के- समुच्चय, पर्याय, विषम, अनुमान, परिकर, परिसंख्या, कारणमाला, अन्योन्य, उत्तर, खार, मीलित, एकावली, प्रतीप, भ्रान्तिमान्‌, प्रत्यनीक, स्मरण, विशेष, तद्गुण, पिहित [खामान्य],

असंगति, व्याघात, अधिक, वक्रोक्ति

| १. हम य्ह मम्मट के केवल उन्हीं दोषों का उल्लेख कर रहै टै जिनका परिहार

अलंकारसर्वंस्वकारने कर दिया है।

( ४५८ )

( ) भोज को-मर्थापत्ति

( ) मम्मट के--विनोक्ति, सम, अतद्गुण, मालादीपक, समाहित | भावचान्त्य ्खतात्मक |)

(३) स्वकस्पित १. परिणाम, २. उल्लेख, ३. विचित्र, ४. विकल्प, ५. भावोदय, ६. भावसन्धि, ७. भावशबलता

इस प्रकार रुय्यक तक अकारो की संख्या १२५ हो जातीरहै। इनमे से ५३ अलंकार छोडकर शेष ८२ अकंकार रुग्यकने स्वीकार किए इनमेसे रुद्रट के पूर्व॑ नामक अरुंकार को यदि अतिशयोक्ति में गिन ल, जो उचितहै, तो कुल अलंकारं की संख्या १२४ रहंगी ओर यदि र््यक की दोनों अतिशयोक्तियों को मम्मट के समान एक अलंकार मान ल्या जाए तो रु्यकके द्वारा स्वीकृत अलंकारो की संख्या ८१ रह जाएगी इनमें यदि भावोदय आदि तीन अकंकारोंको घटा दिया जाए तो रुथ्यक दारा स्‌चित अलंकारो की संख्या ७८ रहेगी |

वस्तुतः सुय्यक को भौ भावोदय आदि अकार रूप से अभीष्ट नहीं हैँ अतएव उनके लक्षण सम्यक ने नहीं दिए ओर उन धथगलंकार' कहा अर्थात्‌ इनमें अरुंकारत्व रहता अवश्य ह, किन्तु वह ओरहीदटंग का अलंकारत्व रहता है। वस्तुतः रसवत्‌, प्रेय, ऊजेस्वी ओर समाहित को भी श्य्यक अलंकार रूप से मानते प्रतीत नहीं होते हमे लगता टै कि अन्त अजन्तमेंजो ८३ ओर त्४सृत्र आए हैँ उन्हँ इस प्रकार पटना चाहिए--

[ सू ८३ | रसभावतदाभासतः्प्रशमानां निबन्धनेन रसवपरेयऊजंस्विसमाहितानि, भावोदयो भावसन्धिभांवशवलख्ता [ सू° ८४ | एते प्रथगलरुंकाराः

इसका अभिप्राय यह हुआ कि पुनरुक्तवदाभास से उदात्त तक जो अलंकार बतलाए गए वे एसे अरंकार थे जो अपने आपमें परिपूणंये। अगे जो संसृष्टि ओर संकर आने वालेहेवेपेसेन हौकर अन्यसावक्ष है, अर्थात्‌ उनका स्वरूप अपने आप सें कुछ नही है।वे जो कुछ हैँ अन्य अलंकारो कौ चिन्धियो के जोड़ से बनी कथडी है सू्रोंकाजो पाठ काशी ओर त्रिवेन्दरम्‌ के संस्करणों मे मिलता है उसमें "एते" शब्द है भी निर्णय- सागर, मोतीलाल तथा मेहरचन्द वले संस्करणों मे इसे किसी कारण छोड दिया गया है हमारी भी रृषटि इस ओर अब जाकर गई हे।

प्रकार के सूत्रपाठ से स्पष्ट होगा कि रय्यक ने रसवत्‌ से लेकर भावशबलता तक के अलकारोंको अलंकार रूपसे प्रसिद्धि के कारण गिना भर दियारहै, उन्हे वे उपमा आदि जेसे अकार मानने को तैयार नहीं वृत्तिकार की बुद्धि पर आचर्य होताहैकिवेग्रन्थारम्भ की भूमिकामें ध्वनि ओर गुणीभूतव्यंग्य को पृथक्‌ कर केवल चित्रकाव्य के लिए सूत्रों का निर्माण बतलाते हैँ ओौर अन्त मे रसवदादि को भी अलंकार मान बेठते है ये भी सब गुणीभूतव्यंग्य ही है। अवश्य ही सू्नकार से चुत्तिकार भिन्न दै

( ४६ ,

उस प्रकार वस्तुतः रुग्यक के मत ने ७५ अठंकार ही अलंकार सरूपसे मान्य 2। उनसेसेवे ७१ प्राचीन आचार्या से ठेते ओर अपनी ओर से उपस्थित कुरते हं। सूत्रकार रूप्यक ने इन अलंकारो को जिन (ण्डो) वर्गो ओर अनुच्छेदं वि भाजित

किया है उन्हं इस प्रकार स्पष्ट किया जाता टै--

कनक्क

१. शुद्ध खण्ड

वर्मं (१) दाब्दालंकारवगे या पौनरूक्त्यवगं

पौनरुक्तयविच्छित्ति (१) अथपौनरुक्त्य (२) व्यल्जनः पौनरुक्त्य (३) स्वरव्यज्जनसमुदायपी° (८) शब्दार्थोभियपीन°

(५) स्थान विज्ेषदिरष्टवणंपौीन °

वर्म ( ) अथाटंकारवगं (१) साहस्यविच्छित्ति (क) भेदाभेदतुल्यतामूकक (ख) अभेदप्राधान्यमूलक (अ) आरोपाश्रित

(आ) अध्यवसखायाध्रित (ग) गम्यौपम्यमूलक

(घ) भेदप्राध्यान्यमूलक

(२) विशेषणविच्छित्ति (क) केव विशेषणविच्छिति (ख) सविरेष्य विशोषणविच्छित्ति

(३) गम्यार्थताविच्छिति `

(४) विरोधविच्छिति (क) शुदधवि रोध (ख) कार्यकारणभावाशध्रित वि रोधमूलक

पुनरुक्तव दाभाख छेकानुप्रास, वुच्यनुप्रास यमक

लाटानुप्रास

चित्र

उपमा, अनन्वय, उपमे- योपमा, स्मरण

पक, परिणाम, सन्देह, श्रान्तिमान, उल्डेख, अपहति उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति (१) तुल्ययोगिता, दीपक, प्रति- वस्तुपमा, दृष्टान्त, निदशना व्यतिरेक, सहोकित

समासोक्ति, परिकर रेष

पर्यायोक्त, व्याजस्तुति, आक्षेप |

विरोध विभावना, अतिश्ञयोक्ति(२) असंगति, विषम, वि चिन्न, व्याघात

( ४७ )

(ग) आश्रयाश्रयित्वमू ° (घ) व्यतिहारमूलक (५) श्यु द्कुला वि च्छित्ति

(६) न्यायविच्छत्ति

(क) तकन्यायमुलक (ख) वाक्यन्यायमुलक (ग) लोकन्यायमूलक

अधिक, विशेष

अन्योन्य

कारणमाला, एकावली, मालदीपक, सार

काव्यलिग, अनुमान यथासंख्य, पर्याय, परिवृत्ति, परिसंख्या, स्रापिति, विकल्प समुच्चय, समाधि

प्रत्यनीक, प्रतीप, मीलित,

तद्गुण, अतद्गुण, उत्तर (७) गुढाथपरताविच्छित्ति

(क) शुद्ध सुक्ष्म, व्याजोक्ति, वक्रोक्ति, | स्वभावोक्ति

(ख) स्फुटाथता भाविक

(ग) उदात्तता उदात्त

(घ) चित्तवत्याधित रसवत्‌, प्रेय, ऊज॑स्वि, समा- हित, भावोदय, भावसन्धि, भावशबलता २. मिश्र खण्ड (१) संसृष्टि (क) राब्दालकार संसृष्ट (ख) अर्थालकार संसृष्ट

(ग) उभयाकुकार संसृष्टि (२) संकर.

शेष पाच में चार अलकारों को वृत्तिकार ने इनमें से कुछ अलंकारो के वैपरीत्य के आधार पर तत्‌ तत्‌ संदर्भ मे प्रस्तुत बतलाया है। ये निम्नलिखित है--

(१) विनोक्ति सहोक्ति-विपरोत (२) अप्रस्तुतप्रशंसा समासोक्ति-विपरीत (३) विशेषोक्ति विभावना-विपरीत

(४) सम विषम-विपरीत शेष बचता है अर्थान्तरन्यास इसको अप्रस्तुतप्रशंसा के सम्दभमे रखने का कारण वृत्तिकारने सामान्यविशेषभाव ओर उस पर आध्रित समथ्यंसमथंकभाव मानादहे। ट्स प्रकार सु्यक ने अर्कारोका विभाजन केवर दो खण्डो मे किया ( ) राब्द खण्ड ओर (२) अथं खण्ड उन्होने शब्दार्थोभय-खण्ड की कल्पना को उन्मेष तो

( ४८ )

दिया हे परन्तु उसे मम्मट के ही समान अंकुरमात्रता तक सीमित रखा दै, भोज के समान पल्लवित नहीं किया |

ठेखा लगता है कि--

जिन पत्रिकां पर अलंकार सूत्र लिति गयेये उनमेसे तुल्ययोगिता से लेकर निदंना तक की पत्रिका व्यतिरेक जीर सहोक्तिकी पत्रिका के पहले रख दी गई अन्यथा अभेदप्राधान्य के वाद यदभ्राधान्य को स्थान दिए विना गम्यौपम्य को स्थान दिया जाता |

उक्त वर्गीकरण मे समासोक्ति, प्रतीप, सामान्य मौर मीलित भी साहश्यमूकक अलंकार है जिन्हे गम्यौपम्य मे गिना जा सकता था, परन्तु सम [सोक्ति को परिकर ओर दटेष के साथ गिन दिया गया हे, जिनमे इटेष तो सार्य मूलक मानाजा सकता परन्तु परिकर नहीं विकल्पारंकार भी साद्य की विच्छित्ति अपने गभे मे चिपाए है ! अतिशयोक्ति के समान अप्रस्त॒तप्रशंसा को दो भागों मे विभक्तं कर उसके सदृद्यमूलक भेद को भी रग्यकराचा्ं पृथक्‌ रख सकतेध, अन्योक्ति नाससे, जेसा कि ूर्वाचार्यो ते किया धा, परन्तु उन्होने उस पर कृपा नदी की ।›

अल्लंकारतच्व

भारतीय चिन्तन नें काव्ये को अकाल्य से पृथक्‌ करने वाले जिन तच्वों का अनुखन्धान करिया, संस्कत के कान्यशास्त ते उनके नामकरणं का राताव्दियों व्यापी एक रोचक इतिहास प्रस्तुत किया यह्‌ इतिहास वैज्ञानिक भी टै)

“चित्रे निराटम्बनमेव मन्ये ग्रमेयसिद्ध प्रथमावतारम्‌ ॥'

कहने वाके अभिनवगुप्त ते साक्षात्कार कौ मानस प्रक्रिया में वस्तु के प्रथम प्रतिविम्वं को जो पार्ववरत्ती अन्य पदार्थो के प्रतिबिम्बो से अस्पृष्ट जौर स्व~मात्र सीमित किन्तु परिपूणं या समग्र मानाधाः उसका ठीक उदाहरण हमारा उपर्युक्त कान्य-चिन्तन हे हमने सवसे पहले भरतमुनि के तब्दों मे कहा "रषः काव्याथेः' 1 काव्य की मूलभूत वष्र है! इषे रनद काय पती चछ ^ _ -------- रस है। दुखरे शब्दों मे कान्य ठेसी वस्तुओं को प्रस्तुत करता है जिनमें हमारा

१. जरंकासें के वर्गीकरण पर द्रष्टव्य ग्रन्थ-पण मधुसूदनजी का साहित्य - शासनीय तत्वों का आधुनिक समाखोचनात्मक अध्ययन" प° १२५२८ डां० रामचन्द्र द्विवेदी की “अंकारमीमांसाः प° १८०-९६, श्रीकन्हैयालालपोहा रकृत 'सेस्कतसाहित्य का इतिहास' भाग २, पृ० १०३, पर पुरुषोत्तमशमां चतुर्वेदी का (अलंकारो का क्रमिक विकास' प° १०९- ११६ इन सवमें महत्व रुग्यकसूत्रों को ही दिया गया टे

( ४६ )

चित्त रमतारहै, जो हमे प्रिय हैँ ओर उनके दारा वह हमारे संवेदन कोजगादेता है, हम हमारी प्रिय वस्तुओं का मानख ओर अभौतिक संभोग करने रगते हँ कामशाखर के प्रणेता वात्स्यायन भीरसकी बात करते है, किन्तु उनका रस कान्यरसमसे भिन्न हे! उनका रस॒ रति-परिणति मे प्राप्त होने वाली वेदनामुक्ति है, जिसका अधिकां परित्यागात्पक है कान्यरस परिणति नहीं, उसके पहले की चवणा है ताम्बूर्वीटिका रसिक के मख मेँ छिपी बैठी रहती ओौर क्रिसो रस की पृष्ट करती रहती है एेसा नहीं कि उसका रस उसकी परिसमाप्त की प्रतीक्षा करता हो वस्तुप्रतिबिम्ब हमारी चेतना पर अंकित होता ओर विम्बगत असाधारण्य से मूक्त हो वह हमारे लिए एकमात्र प्रेयोविषय ही बनकर उपस्थित होता है इस प्रियोविषयीभूत प्रतिबिम्ब-घन के सुदीघं अंकन को काव्य प्रस्तुत करता ओर हमें इन प्रतिबिम्बो क) गोपिकाओं से रास करते रहने का उत्तम अवसर देता है बस, इसी रास-रस के कारण वह्‌ अकाव्य से भिन्नहै।

यह रस अपने भीतर उन भावों को भी समेटे रहता जिन्हे खोक मे रति, शोक, हास आदि कहा जाता है 1 अन्य समस्त सामग्री में इन भावोंकी सामग्री वरिष्ठ ओर शरेष्ठ होती है बाद मे रसशब्द केवर इसी सामभ्री तक सीमित हो जाता है

सौन्दयंवाद्-- वामन “रस "शब्द को छोड़ते ओर सौन्दयं*-शब्द को अपनाते है। वे कान्यको अकाव्यसे भिन्न करने वाङ तत्त्व को 'सोन्द्यंः की संज्ञा देते है अवश्य ही सौन्दयं रसकी अपेक्षा एक व्यापक संज्ञा है। सौन्दयं प्रमातुखापेक्ष होने की अपेक्षा प्रमेयसापेक्ष अधिकहै। रस इसके विपरीत प्रमातृसापेक्ष अधिक था। इस प्रकार रसवाद कै प्रमाठरेतट से काव्यचिन्तन की धारा सौन्दय तक आते-आते प्रमेय- तट की ओर अधिक ्षुक गई! फलतः कलाके स्व" की मीमांसा ने जोर पकड़ा ओर उसका ग्रहीतृपक्ष इब हो गया इस प्रकार रस ओर सौन्दयं दोनों की उपरन्धिरयाँ एकाद्खी रहीं

चाश्त्धवाद्‌-आनन्दव्धंन ने रस ओर सौन्दयं दोनों की अन्विति ओर उसके किए एकर मध्यम मागंकी खोज की। उन्होने “चारुत्व' को स्वीकार किया चारुत्वं प्रमातृपक्ष ओर प्रमेयपक्षके मध्यका बिन्दुदहै। वह जितना व्यक्तिसापेक्ष है उतना ही वस्तुसापेक्षभी। वहु मायावाददहै, भूतवाद। वह्‌ परमरशिववाद है उसमें जितना सत्य शिव है उतना ही यह संसारात्मक भैरव भी। दोनों एक ही हँ चाहे इस छोर से देखा जाए चाहे उसकछ्छोरसे। तथ्यएकहीदहै। "चारुत्व' की इस समन्वय भूमिकामें कलाके स्व'का भी महत्व रक्षित था ओर प्रमाताके संवेदन काभी। दसम रसकी रक्षाभी थी भौर सौन्दयं की भी। इसे कहा जाए तो 'सौन्दूर्य-रसः या 'स्वसंवेदन' कहा जा सकता है

आनन्दवर्धन तक आते-आते काम्यरूपी पुष्पवीथिका के विषय मेँ यह स्थिर हो गयां कि उसका सर्वस्व चारुत्वरूपी सौरभ! है अब केवल पृष्पो की गवेषणा शेष रह्‌ गई

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( ५० )

यह सी कोई नई बातन थी यह शी भरतमृनिसे ही होती रही थी परवर्ततां आचार्यो ने उसी पर कुछ नए परिवेष सें विचार किया ) अल्तङ्नर--भरतमूनि ने अनुभविता को प्रभावित करने वाञे तत्वों केखूप मे लक्षण ओर अलङ्कारो के नाम से पुकारी जाने वारी कुछ विरेषताओं की खोज की इन विशेष- ताओं मे अलङ्कारो को धिक महत्व दिया गया दण्डी ओर भामह ने इख दिशामं पर्याप्त चिन्तन किया 1 उन्होने अलच्कारों कौ अनेक विच्छित्तियोंको खोजा अलङ्कारो के ही साथ इन आचार्यो ने गुणनामक तत्तव की ओी खोज की भौर कुछ काव्यशलियो की ओरभी ध्यान आकृष्ट किया। वामनने इन ज्नेलियों को खवधिक महच्व दिया ओर इन्हे "रीति के नाम से पुकारकर काव्यात्मा स्वीकार किया) वामननेदो कायं ओर किए। एक तो गुणों को रीतिगत विशेष धर्म स्वीकार किया भीर दूसरे अलङ्कार-संज्ञा करी शत्यविकित्षा वैसे ही की जसे परवर्ती आचाय आनन्दवर्धन ने जथं'संजञाकी। आनन्दवर्धन ने काव्यगत बर्थ को वाच्य ओर प्रतीयमान नामक दो भागों मं विभक्त माना। वामनने भी अलङ्कार तत्त्व कौ सौन्दर्यं मौर उपमा आदि की विच्छित्ति के हय में प्रविभक्त बतलाया इन दोनों भागो में भी वामन ते सीन्दयं' भाग को प्रधान माना वस्तुतः इन्द दो भागन कहकर व्यङ्य भौर व्यन्जक कहना चाहिए ओर मानना चाहिए कि आनन्दवर्धन को व्यल्जना कर त्रेरणा वामनसे ही मिली वासन भी वैयाकरणयेदही। | तौन्द्थं कौ इख व्याप्ति ओर सीमा को वामन समकालीन आचायं उद्वट ने नहीं पहचाना 1 उन्होने केवल विच्छित्तिपक्च को महत्व दिया ओर काव्यालद्खारसार- संग्रह नामक ग्रन्थ में रूपक आदि के रूप ही मलङ्कार को स्वीकार किया

शवनि--आनन्दवर्धन ने इन दोनों धाराओं मे उर्धट की धारा को अतीव स्थुल ओर अक्रिचन घोषित किया। वामन की लोन्दरथ-धारा को स्वीकार करके भी उन्होनि उसके लिए उपादानके रूपमे विविध प्रकार की खामभ्री उपस्थित की व्यल्जना की विदयच्छक्तिका माधय ले उन्होने एक नवीन लोक कीही सृष्टिकर डाली, जिसमे रूपक आदि अलङ्कारोंकादही पहच्व था, गुणो का ओरन रीतिया वृत्ति का 1 उसभ महत्व केवल चारत्वनिष्पत्ति का था ञौरथा उसके लिए अपेक्षित उन सम्पूणं काम्य घटकों का जो, गुण ओर अलद्कार, रीति ओर वृत्ति भी थे ओर उनसे परे भी आनन्द- वर्धन ने गुण आदि से परे व्यंग्यनामक एक प्रतीयमान अर्थं का अन्वेषण किया ओर प्रधानता के आधार पर उसे ध्वनिसंज्ञा दे काव्यात्मा स्वीकार किया उन्होनि अरुद्कारादि को वाग्विकल्प कहा ओर उन गुणीभूतन्यंग्यनामक काव्यभेद के अन्तगंत अन्तभूत माना 1 अलंकारो को आनन्दवर्धन ने बहुत ही उपेक्षापूणं दृष्टि से देखा अभिनवगुप्त ओर मम्मट ने आनन्दवर्धन के दस पक्ष को तूल दिया भीर उद कान्यत्व निष्पत्ति के लिए वैकल्पिक महत्व का तत्तव स्वीकार किया इन आचार्यो ने अङंकार के साथ

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ही अलंकाय की भी कल्पना की ओर अलंकायंके रूपमे रस आदिको ही स्वीकार किया इनने यह भी स्वीकार क्रिया कि अकंकार कभी-कभी रसविरोधी भी बन वेठता है वक्रोक्ति--इसी बीच एक ओर समर्थं आचायं हृए- कृम्तक इनने अलंकार पक्ष को व्यापक परिवेष में देखा ओौर उसे वक्रोक्ति के अतीव विस्तृत क्षेत्र तक फैलाया इस भगिमा भें उन्होने ध्वनि, अलंकार, गणो मौर रीतियों को वैसे ही समाविष्ट साना जेसे महोदधि भिन्न तरगों को अथवा सधुमास मे पुष्पों को समाविष्ट साना जातां ठे। इस चिन्तनने काव्य की उन अनेक विधाओंको भी अपनाने का अवसर दे दिया जो अन्य चिन्तनों मे अपनाई नहीं गई थीं कथन के उस प्रत्येकं प्रकार को इसं भागने अपने परिवेष मे समेटा जिससे चमत्कार का अनुभव होता था ओर उक्तिमें विच्छित्ति आती थी वक्रोक्ति अपने आपे एक अल्कारहीहै। इस विवरणसेस्पष्टहैकि उपादानमीमांसा में भी अलंकार को अधिक आचार्यो ने महत्व दिया उसके उपर काग्यात्ममी्मासामे तो सौन्दर्यं के रूपमे अरेकार कोस्थान भिलही चुकाथा। इस प्रकार काव्यशालके चुनावी सैदान मे जीत किसीकीभी हो परन्तु इतना निदिचत है कि चिन्तन का वास्तविक *बहुमत अरुकार'- तत्त्व पर अधिक टिकाथा। अलकाररोब्दको रूढिसे बाहर निकालकर ओर केवल उपमा-रूपक आदि तक्‌ निरुद्ध मानकर यदि अपने विराट्‌ खूप मे देवा जाए तो लगेगा करि गवेषकों के अन्तमेनं मे उसके प्रति जो एक समादर छिपा हुभा है, वह तथ्याधित ओर आदरणीय है वस्तुतः जो अतिशय तत्त्व है वही अलं-तत्तव है अतिशय-शन्दआकारबृहुर्व का अभिलापक होकर भविरोषता' का अभिलापक है सामान्य को विशिष्ट बनानेवाला तत्तव ही (अतिय'-तत्तव है। जो वाङ्मय रोक-साधारण ओौर वक्तव्यमाच तक, सुचनामात्र तकं सौमित रहता है वही अतिशय के आते ही रसनीयता, आस्वाद्यत ओर स्पृहणीयता तक पहुंच जाता है रसनीयता, आस्वाचता या स्पृहुणीयता ही हँ वे "विशेष" जिनसे उक्ति में कान्यत्व का आधान होता है! इस प्रकार अतिशय तत्व या विशेष तत्व काव्यत्व के उत्प हैँ ओौरये ही है अल'-तन्तव अलंभाव या भल्त्व' ही है अलंकार हम इसे संक्षिप्त के विस्तार ओर विस्तृत के संक्षेपे देख सकते हे बीजका रातशत राखाओं वे वृक्ष के रूप में परिणत होना यदि उसका अलुंभाव दहै तो विशार वनश्रीका फोहुया चित्र मे प्रतिदिम्बनद्रारा संक्षेपीकरण्‌ भी अरंभाव है सतिशय दोनोमेहै। [ द्र° हमारा ङेख सा हित्यतत््वविमरेः | इस प्रकार के अकुभाव को अरुकार मानकर व्या हम उसे काव्य का सर्वातिराथी तत्व नहीं कहू सकते ?

जहां तक उपमा-रूपक आदि विच्छित्तिओं का सम्बन्ध है मौर सम्बन्ध है तदितर

समस्त काव्यत्वाधायक्‌ तत्वों का वे इस (अतिराय'-तरष-रूपी परिमल के किए

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विविध पुष्प माने जा सक्ते हैँ वाक्यमें अतिशयका नधान दि उपमा आदिके दारा होतादहै तो विभावादि की रससामग्रीके दवारा मी होता ही दहै। वस्तुतः रससामश्री का संयोजन भी एक उक्तिधमं टै। काव्यजास्रीय चिन्तको मे भोज आदि का मस्तिष्क इस ओर भी पहंचा। वे विभावादि योजना को “रसोक्तिः कहते, गुणयोजना को स्वभावोक्ति जर उपमा जदि की योजना को वक्रोक्ति। यानी उक्ति विशेष ही है काव्य, जीर उक्तिगत जो "विशेष है थात्‌ रस, गण ओर स्वभावपद- वाच्य तदतिरिक्त शेष सवब,वे अलंकार हीदँ, क्योकि वे ही कान्यलोभा के जनक धमं है

इस प्रकार वस्तुवादी दृष्टिकोण से या प्रमेय निष्ठ चिन्तन से स्स ओरगुणभी अलभाव के जनक तच्वही दहै ओर दूरे शब्दोमें अर्कार हीदँ भरत के बाद दण्डी ही काव्यास्रके प्रथम आचार्यं है उन्होने इसी दृष्टिकोण को अपनाया हे ओर रसोको अलंकारो मेही सच्चिविष्टकियादहै। क्या कला का कोई स्वगत धमं नहीं माना जा खकता ?

कला एक संरचनाभी तो है, माना कि वह स्वयं के अन्तिमि रूपमे विज्ञानघन ओर “अनद्ध" है। क्या अनङ्ख अङ्गना | उत्तम अद्धो वाटी नारी मुत्ति | कौ अपेक्षा नहीं रखता अन्ध का स्थूल अङ्ग यानी शरीर भलेहीन हो, स्वयं मे वह्‌ अत्यन्त नीरूप हो तथापि क्या उसका कोई मानस रूप नहीं होता यदि होत्तादै तौ क्या उसे सर्वथा अनद्ध कहा जा सकता है? क्यामन अद्ध नहींटै? आखिर सूक्ष्म शारीर भीतोदरीरहीदहै। अवद्यही जो तत्तव मनोभव दै, जो आत्मभू है वह्‌ अनङ्ख होते हए भी अद्ध दै, शरीरी है भीर दारीरसापेक्न है। उसका एक पक्ष शरीरपक्ष भी है! कला का विज्ञान विषयनिरपेक्ष नहीं विषय का अस्तित्व भी यह केवल प्रतिभास नहीं उसका बहुलां यहाँ अपने आपमे भले ही प्रतिविम्बात्मक्‌ ओर इसीलिए प्रतिभासात्मक हो, वह लोकगत विम्ब कौ अवेक्षा अवश्य ही रखता दहै देत- कला का तद्‌ दाम्पत्य ही यहाँ खवंस्व है; मौर एेक्य नही, साहित्य ही यहाँ की प्रधान विभूति है साहित्य क्या किसी एक छोर के असत्य होने पर सम्भव है निर्चित ही कला का कोई स्व" भी दहै ओर उस स्व मे रहनेवाली उसकी अद्ुश्रुत विशेषताये भी है इन समस्त विशेषतां की एक ही संज्ञा है अलंकार

खजुराहो की अप्सरोमूतियां अङ्धप्रत्यद्धो मे जो संतुक्िति मासक्ता या उभार लिए हए है, क्या वह॒ उनका कोई "अलंकार" नहीं है ? क्या वह उभार कोई प्रातिभासिकं धमं है? क्या उससे उत्थापित मानस श्यृद्खही सब कुट? इसक्एु क्या उस उभारको प्रमातृनिष्ठ रस-मात्र कहकर चिन्तक स्वयं को कृतकृत्य मान सकता है ? यदि उसे रसजनक कहा जाए तो रस कै लिए उसकी उपादेयता स्वतः सिद्ध है तब यह सोचना होगा कि यह सामग्री जहाँ नहीं रहती वहाँ रसनीयता क्यों नहीं आती ?

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यदि वहाँ रसनीयता नहीं पाती ओर इससामग्रीके रहते ही वह आती हैतो अवरस्य ही यह सामम्री रखके प्रति कोई असाधारणता है ओर यदि असाधारणता दहै तो क्यों उसे उखके आश्रय का अत्तिराय' माना जाए, उसे उसकी विशेषता स्वीकार किया जाए, ओर अन्ततः उसेक्योंन अल्भाव का जनक अरकारतत्त्व स्वीकार किया जाए

सांकेतिक, प्रतीयमान, अप्राकरणिक या अन्य अथं की विभूति, उसका इन्द्रजाल ध्वनि-शब्द से पुकार भले ही लिया जाए, किन्तु वस्तुपक्ष की दृष्टि से अवश्य ही वह्‌ भी कला की सस्व'-गत विशेषता भी है ओर इसलिए अन्वय तथा व्यतिरेक के आधार पर वह्‌ भी अतिशय ओर अकंभावकी सीमाके भीतर है। इसीलिए उसकी संज्ञा अलंकार की जासकतीटहै। आखिर अनेकाथक शब्दों के प्रयोग मे ध्वनि को शब्द शक्तिके खुटेसे बंधा च्च वत्स मानाही जाता है। क्यों? शाब्दशक्ति से उसे क्यो बांधाजा रहाहै? इसीलिएन, कि वहा शाब्द का “अतिशय मेटा नहीं जा सकता उसे स्वीकार करने हेतु चिन्तक बाध्यटहै। आखिर ध्वनि का बृहत्‌ क्रुष्माण्ड उस शब्दशक्ति की तन्वी तामे हीन अटका हुभाहै, भके ही प्रमातृचेतना की छत भी उसे सधे हुएहो। कहनान होगा कि ध्वनि का घटोत्कच कितना ही विशाल क्यो बन जाए वह है किसी हिडिम्बा का प्रसाद वह उस माता का स्तनंधय वत्स हं, उसके आंचल में संह र्गाकर चुस्की दाबता उसके उत्संग का मांगलिक अलंकार दै। निरिचत ही ध्वनिभूमिका भी कला-क्षे्र से आत्यन्तिक परथक्ता नही रखती वह उसमे अत्व का निष्पादन करती ओर इसीलिए उसका अलंकार बनती है

शओचित्य--कला जिन प्रतिनिर्म्बो को हमारी चेतना पर अंकित करती दहै, हम उन्हं अपनी रुचि ओर अपने संस्कारों के अनुरूप सजा हभ देखना चाहते है उनको इस सजावट के साथ प्रस्तुत करनेकाजो ओचित्य है वह॒ भीकलाके सस्व का, उसके "आपे" का अतिशय है अवश्य ही वहु वैसानदहोतो हमें सुचेगा नहीं ओर यहं उसका दोष होगा इस दोष की मुक्ति यदि दोषाभाव है अथवा परित्य ्त-परित्याग है तो ओचित्य नामक तत्त्व दोषाभाव से अधिक नहीं है। इसे हम उपादेयतां मं कारण मानेगेही, ओर अनुपादेयता मे इसके अभावको कारण मान इसे एक अस्तित्वसंपन्च वस्तु भी मानेंगे, मौर उस रूप में यह कला के स्वगत धर्मोमे ही गिना जाएगा तथा अलकार'-सीमा का उल्टंघन कर सकेगा

इस प्रकार रस, अलेकार, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति गौर ओचित्य के परिकषेत्रों में विभक्त काव्यचिन्तन मुर्तः एक ही धुरी पर घूमता दिखाई देता है। वह है अतिशय की धुरी, अरुंभाव की धुरी, अतएव अलकृतितत्तव की धुरो एवं, अकंकृतितत्व एक सामान्य ओर व्यापक तत्व है काव्यात्मा का! काव्य एक कला है ओौर क्योकि वह्‌ स्वायम्भवी सृष्टि टै, संकत्पयोनि, मनोभवा या प्रज्ञानघनीय सृष्टि है, प्रतिनिम्बात्मिका है अतः वहु उसकी समग्रता में वसी है, आंलिकता मे नहीं अभिप्राय

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यह्‌ करि विम्बमें लगा तिलक भलेही बाह्यहो, विम्ब से भिन्न हो, किन्तु प्रतिविम्ब मे रगा तिलक निस प्रकार प्रतिविम्बात्माकी सृष्टि, निमिति, अभिव्यक्ति, प्रतिभा या प्रज्ञप्ति के साथ ही कणं के साथ उसके कवचकुण्डल के समान निष्पन्न होता है उसी प्रकार लोकभरूमि पर वस्तु गीर वस्तु के अतिकयाधायक तच्च भलेही भिन्न हों किन्तु कृलाभुमि पर वस्तु ओर उसके अतिच्याधायक तत्त॒ वैसे नहीं होते! एेसा नहीं कि दपणमें वनमालाविभूषित श्रीकृष्ण [ परमात्मा | प्रतिबिम्बित हों तो उस प्रतिविम्बमेवे स्वयंही प्रतिबिम्बित होकर रह जा, उनकी वनमाला प्रतिविम्बित नहो ओर वह्‌ उनके प्रतिविम्ब में अलग से संयोजित की जाय } श्रीकृष्ण का श्रीविग्रह जौर उनका अकरण वनमारा, दोनों एकं सखाथ प्रतिबिम्बित होते कला मे, प्रति- विम्ब, चिच्रमें, अलंकाय ओर अरुंकृति दोनों सहजात होते हँ, कऋमोत्पन्न नहीं इस स्थिति में यह केसे कहा जा सकता है कि अलंकार अलंकायं से भिन्न ओर उसकी घटकृता से रहति रहते है।

अलंकार की बाह्यताकी भ्रान्ति शरीर कै टृष्टान्त के कारण हूर्ईहै। कटक कुण्डल आदि श्रीरसे अवश्य ही भिन्न रहते ओर आहायं हुआ करते है शरीरम वे अवद्य ही उपरी वस्तु, ल्रीर स्वयं नही, उसकी आत्मा भी नहीं किन्तु यह्‌ साट्टय एक विकलांग साहद्य है सोचना यह होगाकि भटेही सामान्य शरीरके घटके हों अकार, क्िन्तुक्या सुन्दर शरीर कैभी वे घटक नही होते ? सौन्दयं अपने उपादानों के बिनाक्या शरीरमें सकेगा? यदि नहीं तो उसके उपादानोंको उसकी निष्पत्ति के पूवं दारीरमें मानदहीचेना होगा कान्य केवल शरीर नही, सुन्दर शरीर है। केवर शब्दाथंयुगम कान्य नहीं, अपितु रमणीय शब्दार्थं काव्य है, सुन्दर रब्दाथं काव्य है। निदिचत ही शब्दाथं की आत्मा यदि सौन्दयं के बिना काव्यत्वशुम्य है ओर सौन्दयं कैवल शरीर से निष्पन्न नही, तो उसके उपादान काव्यत्वं कौ निष्पत्ति के पह्ङे से शब्दाथं के रोम-रोम में संनिविष्ट हैँ यौवन के साथ शरीर, किसी के सौभाग्य का पात्र वनताहि। एेसा नही कि सौभाग्य पहठे आकर बेठ जाए, यौवन बाद में माए क्रया सिन्दूरदान बादमें होता ओर वधर कोहवर में पहले ही प्च जाती हे? जरंकार गीर अटंका्ंके बीचलोक मेँ भटेही संयोगसम्बन्ध हो, कलाभूमिका पर्‌ तो उनके बीच एकही संबन्ध संभव होगा--समवाय। इस प्रकार कला ओर काव्य का अलंकार, एक आन्तर, अबाह्य ओर आत्मीभरूत धमं है धर्मी से उस्षका अभेद है उसमे भेद ही एक प्रातिभासिक तथ्य है ठीक ही कहा गया है साल्कारस्य काव्यता, पूनः काव्यस्याकंकारयोगः' [ कुन्तक १।६ ||

उक्त आधार पर अरुकार अपने उपमा आदिकेरूपमेंभी काव्य की आत्मादहै, कान्य है, काव्यनिष्ठ अन्यूनानतिरिक्त धमं है, इसीलिए जौर काव्यनिष्ठ अलकायता का अवच्छेदक भी है यानी काव्यत्वरूप ही है

क्कः (4 0 0 9 न्न ~+ ~ +. बि 1 (य

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हम अदोक का अथं कर ङे केवल वृक्ष ओौर फिर कहँ कि उसकी आत्मा सौरभ है तो कह ही सकते हैँ, किन्तु यहहमारा दोष होगा वस्तुतः अगोक एेसे एक समग्र व्यक्तित्व कौ संज्ञा है जिसका एक घटक सौरभ भी है सौरभ उस व्यक्तित्व की विभषा है, उसका अकार दै, यद्यपि अशक कासारा व्यक्तित्व उसी के किए उपादेय है। हमने काव्यात्मक अशोक को सीरभसे पृथक्‌ कर देखा केसे ? हम मनुष्य का अथं सद्योजात वच्चा करलं ओरकरँंकि वहतो अरुंकारमाव्रहै, अलंकायं है सुवासिनी ओर सौभाग्यवती माँ का उत्संग जिसमे वह्‌ समाया रहता है तो ेसा कहू हौ सकते हैँ किन्तु क्या सद्योजात शिशु मनुष्य नहीं होता शो का अथं गोचित्र कृर हुम उघके यथार्थं को समञ्ति हए शगोमाता' के दैवत विग्रह को भी गो-पद का अर्थं कट ओर कहं कि यह्‌ हमारी नई सूञ्लहै, त्रुतन स्थापनाहै तो हमारा संह कोई नहीं पकड़गा ओर एसा हम कह ही सकेगे, परन्तु इन कथन पे सुतनता की डींग कोरा दम्भ होगी प्रथम हृष्टि गोमाता पर ही जानी चाहिए थी हमने गोचि्र को गोमाताः समञ्च कैसे ज्या? यह हमारी दष्टिका दोष है; अशोक का, मनुष्य का ओर गोराब्द का 'अलकार'के विषयमे भी हमारे चिन्तन ओर व्यपदेश-विधान कौ यहो स्थिति है। हमने अलद्धुार-शब्द को उपमा आदि तक सीमित समन्षा ही क्यों? यदि समन्ला, तो यह भी समज्लना चाहिए था करि अलद्धारशब्द से अभिधेय समस्त तत्त्वों मे कदाचित्‌ उपमा आदि अधिक प्रभावी ओौर अधिक चमत्कारी हें फिर हमे अन्य तत्त्वों की ओर उन्मुख होनाथा। भीर यदि स्चिभेदके कारण हम उन्मुख हुए भी तोहमें अपने चिन्तन की स्वस्थता नही खोनी चाहिए थो, उसमे संतुलन बनाए रखना चाहिए था। इतिहास साक्षी है--"हमने वेसा नदीं किया। प्रमातृनिष्ठ चिन्तन की प्रधानता ने हमें व्यक्तिवादी बना दिया, हमने वस्तुपक्ष से अपनी आंख बहुत दुर तक फेर लीं ओर हम मसंतुलन के उपारुप्भ मे पडे आनन्दवर्धन का था यह्‌ प्रसाद इस प्रकार हमने देखा कि काव्य को आत्मा अर्थात्‌ काव्य को अकाव्य से पृथक्‌ करने वाला तत्त्व या काव्य की उपादेयता, प्राह्यता का बीज, एक ही है ओर उसका एक ही नाम है अलङ्कारः काव्यालङ्कार" नाम से जिनने ग्रन्थ लिखि उनमें भामह, उद्धट, वामन ओर ण््रटने अलङ्कारो का विवेचन अवश्य प्रचुर मात्रा में किया परन्तु उनमेंसेकिसीने अलङ्कार को काव्यकी आत्मा भी कहा हो एेसी बात नहीं है उक्त चारों आचार्यौ मे एसः कोड उल्छेख नहीं मिलता परवर्ती कन्तक ने पने ग्रन्थ की कारिकाओं को काव्यालद्धार कहा ओर उनम वक्रोक्ति को कान्यजीवातु स्वीकार किया, किन्तु यह्‌ स्वीकृति आनन्दवधन के बादकी थी ओौर इसके आधार पर अकंकार को कान्यात्मा कहने का पक्ष समथन नहीं पाता, क्योकि कुम्तक ने वक्रोक्ति को काव्यात्मा स्वीकार किया, जो एक पृथक्‌ संप्रदाय है, जिसकी कान्यास्मवाद मे अलंकार संप्रदाय से अलग गणना कौ जाती है ;

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इस प्रकार ( १) रसः काव्याथेः ( ) रीतिरात्मा काव्यस्य ( ) काव्यस्यात्मा ध्वनिः ( 1 ) वक्रोक्तिः काव्यजीवितम्‌ तथा ( ५) ओचित्यं रससिद्धस्य स्थिरं कान्यस्य जीवितम्‌

के समान कोई वाक्य अलंकार" से सम्बन्धित नहीं मिता, जिसमें अरुंकार को कान्या- तमाया कान्यजीवातु कहा गया हो। वामन रीतिवादी आचायं हं उन्होने काव्यं ग्राह्यमककारात्‌, खौन्दयंमरुंकारः' कहकर जिस “अकंकारतच्व' को कुछ महत्व दिया है उससे भी उपमा आदि की कान्यात्मता का कोई पश्च सामने नहीं आता, क्योकि यहां जिसे अलंकार कहा गया वहु उपमादि नहीं अपितु सौन्दयं है फिर वामन स्वयं ही रीतिरात्मा काव्यस्य कहकर अलंकार-पक्ष से अलग हट जाते हैँ इस प्रकार यह्‌ जो प्रसिद्धिटहै कि साहित्यशास्रके संप्रदाय हैँ ओर उनमें एक संप्रदाय अलकारः को काव्य की आत्मा मानने वाला जने इसका क्या आधार है इसका आधार कदाचित्‌ "काव्यारुकार' इस प्रकार अख्ंकार के नाम पर ग्रन्थोँका नामकरण है वस्तुतः अकार को काव्यात्मा मानने कौ प्रसिद्धि अलंकार की उस छाप पर आधितहि जो भालोचक या काव्यकलाविद्‌ के अचेतन मन पर पड़ी हुई थी ओर जिकर अनुसार अलंकार परिभोगयोग्य परिधान नही, अपितु प्रणम्य देवतरूपांकित रत्न था उदयन के अवरोध मे अज्ञातवासं कर रहीया अग्निमिच्र के अन्तःपुर मे रापसेविका क्षण व्यतीत कर रही दिन्यकन्या सागरिका ओर मालविका के समान अटंकृतितच्व का अतिश्यय भी द्रष्टा कोप्रभावित क्िएहृए था भौर वह्‌ मन ही मन सोच रहा थाकि यहु कोई असाधारण महत्वं कौ वस्तु है, जिसे काव्यात्मा भी कहा जाए तो अनुचित नहीं वस्तुस्थिति स्पष्ट होने पर अन्ततः सागरिका ओर मारविका उदयन ओर अग्निमित्र की राजरानी वन ही जाती दहं,

चिच्रकाव्य--यही कारण है कि गानन्दवधनने वाक्य के रस आदि से रहित ओर एकमात्र उक्तिवेचिव्य से युक्त स्वरूप को काव्य मानकर कान्यानुकार, काव्याभास याकान्यकी नकल यानी काव्यचित्र मानाथा ओर कहा थाक्रि वस्तुतः कोई अलंकार सा नहीं होता जो गणीभूतव्यंग्य वगम गिना जा सकै अथवा जिसे व्यग्यांश का अनुग्रह प्रप्तनहो। ये दोनों एसे वक्तव्यथेजो परस्पर विरोधीन होकर समन्वयसूत्र से सम्बद्धयथे। किन्तु परवर्ती मम्मटने ध्वनि का पाठ दुहुराते खमय इस समन्वयसूच्र को तौड दिया ओर अलङ्कार कौ प्रधानता से युक्त काव्य को चित्र नामक काव्य मान लिया तथा व्यंग्यप्रधान या व्यङ्ग्यबहुक कान्यको मलग वगं में ` गिना दिया यह्‌ क्या हुआ ? यह वस्तुतः अलद्धुार कौ प्रतिष्ठा हुई अलंकार नामप्ते पुकारे गए उपमा आदि को भी स्वतन्त्र महत्त्वं दिया गया ओर उनमें भी व्यंग्य के विना भी काव्यत्वं का उत्व स्वीकारा गया। यह अपने आपमेजो भीदहो, अकार के महत्व की अभिस्वीकृति मे एक महत्वपूरण प्रमाण है, परिपृष्ट साक्ष्य है ओर उसके दारा दिया गया सष्षय है जो अलङ्कारो को काव्यश्शरीर का अनिवाय

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( ५७

नही, वैकल्पिक धमं कहने की धृष्टता करता रहा धा। अन्तम मस्मटते

भी ध्वनिकार आनन्दवधन की अनुभूति को आदर दिया गौर कहा कि अलंकार भी बिना

रस आदि व्यंग्यांशके निर्जोव होते हैँ अभिप्राय यहु कि अलंकार का उपमा आदि

स्वरूप भी वह्नि से धुम के समान रस आदि व्यंग्यविभूति से कान्तिकं ओर अव्यभि-

चरित सम्बन्ध रखता हं यानौ इन्दे मिरी ओौर पानी की नाई पृथक्‌ करके नहीं देखा

जा सकता जो जल अत्यन्त स्वच्छ है, अधामच्छद या पारदर्जी हे, वह भी किसी

छुप, तडाग, नदौ या निज्लर के एसे सख्ोतका एकांशहै जो मिदी-मां का आँचल

पक्डे हुए हे क्या उक्ते अपाथिव मानाजा सकताहै? क्या केवल बरसाती पानी

ठी पार्थिव कणोंसे मिश्रित कहाजा सकता है? केवल बरसाती जलको मारीत

मिश्रित द्रव कहना हमारी दृष्टि की स्थूलता होगी, दोष होगा वस्तुतः उसद्रवमें

भी मिद चपी हुई है जिसे हम सर्वथा स्वच्छ कहु रहे है, अत्यन्त निर्मल समन्च रहं

है दाशनिकों का पञ्चीकरण ओर ओपनिषदो का त्रिवृत्करण्‌ तो निमंल जल के

भरूतपिण्ड की बरीकीमे भी जलेतर तत्त्वो अष्टमांश का वैज्ञानिक मिश्रण मानता

ठे अलङ्कार का निमंल जल भी व्यंग्य की मिह का सौगन्ध्य छिपाए हए है व्यंग्य को सरस मिह्री तो जक के स्थूल स्पदं की तरलता स्वथं हौ स्वीकार करती रही

ठं मम्मट का यह मानना करि अर्द्कार को कान्यसेयदि हटायाजा सकताहैतो

उसके व्यक्त रूपमे ही हटाया जा सकता है, अव्यक्त रूपमे नही, उस रूपमे वह काव्य का अविभाज्य, अयुतसिद्ध ओर समवायी धमै, इस दिलामे सटीकता की सुचना देताहै। यहीन वह्‌ विवशता ठे जिसे अलङ्कारो की संख्या उत्तरोत्तर बढती ही गई ओर पूवेवर्ती आलोचक जहा कोई अलङ्कार नहीं देखता था परवर्ती ने वहां नैक नवीन. अलङ्कारो की स्वस्थ खोज कर डाली भौर जिन स्थलों जे पूवेवत्तीं आचाय ने कोई एक अलङ्कार माना था, परवत्ता आचार्योने उन्हीं स्थलों का विकलन कर उनम अनेक अजद्कारौ की प्रच्छन्न संसृष्टि ओर अव्यक्त संकोणंता प्रमाणित की। आनन्दवधन ने अछकारों को वाग्विकल्प कहकर अनन्त बतलाते हए उनकी उपेक्षा काजो शापवाक्यबोखा था वह॒ दशरथ के किए श्रवण्‌-पिता के शापवाक्य के समान दह मन्न बन गया ओर उयेक्षाके भीतरस्े आदर की समुद्रगा स्रोतस्विनी को जन्म मिल गया अलंकार तन्तव कौ गवेषणा परिपूर्ति तक पर्हुव सकी, उत्तयेत्तर वृतौ ही गई स्वयं पण्डितराज ने ल्खातो ग्रन्थ प्रसके नाम पर--रसगंगाधर; किन्तु उसका प्रधान अंश वन गया अंकारं ही। वही अपुणेदहीरहा। वे पूणं हौ कर पाए ठीकहीहै। भला सभ्य भाषा अलंकार से रहितहोदही कैसे सकत। ?२।

प्रकार अलकार काव्य का अयुतसिद्ध, अपृथिस्यत ओर वैषा ही धमं है जैसा

पृथिवी का गन्ध, जलका रस, अग्निका रूप, वायु का स्पक्षंजओर आका का |

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दाव्द ! कान्यरूपी पञ्चभूत का तन्मात्र अलंकारही दहै जीर अलंकार हीह कान्यरूपी अन्त्य ओर महान्‌ वट वृक्ष का अणिष्ठं बीज

कहा जाता है अलंकार को शब्दों मे समन्ञाजा सकतादहै, यानी वह वाच्यहो सकता है ओर रस किसी भी स्थिति में वाच्य नहीं हो सकता, क्योकि "रस" या श्युद्धारः आदि कहने से स्सात्मक आस्वाद अनुभवमें नहीं आता। वहु तभी अनुभवमें आता है जव विभावादि सामग्री का समुचित, कलित ओर चार संनिवेश उपस्थित हो ठीक रख मवाच्य हीह, केवल व्यंग्यहै, ध्वनिदहै। परन्तु अलंकार को वाच्य केसे कहा जाता है ? क्या केवल शव" या नेसे शब्द का प्रयोग करनेसे उपमाका अटंकारत्व या चमत्कार अनुभवमें सकतादै? क्या उपमाको अल्कारभाव तक पर्ुचाने के लिए उपमान आदिकी सामग्री अपेक्षित नहीं उपमान, उपमेय ओर साधारण धमके साथ क्या !इव' आदि उपमाप्रतिपादक शब्दों का प्रयोग रहता ही दहै? तव दुप्तोपमाके भेदोंकी संख्या १९ क्यों मानी जातीदहै? क्या अभेद' या आरोपः कहने से रूपकाल्कार या भसंभावना'या संशय" कहु देनेसे उत्प्रेक्षाया सदेहाटंकार का अनुभव संभव दहै अवश्य ही अलंकार भी शब्दोंमें नहीं जकडाजा सकता फिर रस भी तो ऊपर किए विवेचन के अनुसार अलंकारहीहै। क्था जरूरी है कि अलंकारत्व केवर उपमादि विच्छित्तियों की चितकवरी बकरियोँंके गलेकी घण्टी रहे उस रसरूपी दिव्य रथ की सुवणं-क्रक्रिणी भी क्यों माना जाए ?

इस प्रकार यह्‌ सिद्ध होता है कि-अलंकार-तच्व काव्य का असाधारण तत्त्व है वही काव्य कौ वास्तविक आत्मादहै। "तस्येव मात्रामुपजीवन्ति सर्वेः उसी के किसी अंशसेवे सव तत्त्व निष्पन्न हैँ जिन्हँंरस आदि नामोंसे पुकारा जाताहै। “एकं सदु विप्रा बहुधा वदन्ति उस एक तत्वको ही अनुक्लीटयिता जन अनेक रूपों में विभक्त देखते ओर भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैँ यदि यह विद्व किसी असीम ब्रह्मन्‌, मायातीत भूमन्‌ भीर अनन्त विराट्‌ पर अंकितटैतो इख विश्व का चित्रभी, इसका प्रतिविम्ब भी किसी तत्त्वं पर यदि अंकित हो खकता है तो एकमात्र "अलंकार" तच्वपरही। षृष्टिमेजो ब्रह्मतच्व दहै काव्य में वही अटं-तच्वहै। इस अतिशयित, जनन्त, भूमा ओर विराट्‌ रसको जो अपनी-भपनी कटोरियोंमे हमने समेटा वह हमारे यानी भमिति" के भीतर ही अपनी संम्णं इयत्ता के द्रष्टा जीवोँ के अनुरूप ही है

श्यो यो यं यमवाप्नुयादवयवो हें स्प्रशच्‌ पाणिना तत्तन्मात्रकमेव तत्र सते रूपं परं मन्यते। तञ्जास्यन्धपुरे हा करिपते नीतोऽसि दुर्वेधसा को नामात्र भवेद्‌ बताखिरभवन्माहारभ्यवेदी जनः ॥'

के अनुसार अरंभाव' को अनुवीक्षकके एकांगी दृष्टिकोण ने या कहना चाहिए कि

स्थूल चिन्तन ने जिस-जिस लूपमं बाधा, निस-जिस रूपमे आंका वह्‌ अवश्य ही

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आंरिक तथ्यता छिए एथा, किन्तु उख तत्व की समग्रता ओर उसको परिपूत्ति उनमें से किसी हषटिकोण ओर किसी चिन्तनमेनथो।

बरह्म से मायामे उतरने पर वैषम्य ओौरमेदका जो प्रतिभाष होता है तदनुसार रस आदि से अलङ्कार को भिन्न केवल उपमा आदि को लेकर किया जाएगा, किन्तु अलङ्कार की महत्ता इतने पर भी घटेगी नहीं क्योकि रख यदि कहीं, रहता दहैतो दोनों केवल सामाजिक या प्रमाता में रहता है, काव्य में नहीं क्या कान्य ओर प्रमाता एकह? काम्यम यदि कुछ रह खकताहैतो उपमादि अलङ्कार ही रह सक्ताहै। गुण भी रसवाद के अनुसार रसधमं है, अतः वे भी प्रमातुगत सिद्ध होते है, कानव्यगत नहीं दोषाभाव कोई 08511४11 नहीं है रसवादी के यहाँ रीति ओर वृत्ति का कोई पृथक्‌ अस्तित्व होता नहीं। इनके अतिरिक्त किसी काव्यधमं की कल्पना रसवादियों नेकीही नहींहै। उनका काव्यलक्षणतो इतनापंगु है, विशेषतः मम्मट का, कि वह उन्हींके अनुसार वस्तुसे वस्तुकी ध्वनि वारी उक्तिमे लगुही नहीं होता, वर्योकि वहा अलङ्कार रहता, गुण यदि कहा जाए कि सम्मट के अनुसार वहु भौ अस्फुट अल्ड्कारतो रहता ही दहै, तो उस ध्वनि को अल्कारमुखक कहना होगा फिर मम्मटके द्वाराही स्वतः संभवी वस्तुसे वस्तुकी ध्वनिके किए उदाहृत अलसशिरोमणिः०' इत्यादि गाथा का व्यल्जक वाच्य अथं किस प्रकारके अलङ्कार से युक्त है ? क्या उसमे अस्फुट भी अलङ्कार है? स्फुटकीतो वात ही अल्गरहै तब केसे जाएगा इस स्थल में काव्य लक्षण, यानी मम्मट द्वारा अभिमत कान्यलक्षण हन्त

हेतदष्टि गौर रसवाद के अनुसार काव्य का सस्व" उसका अपना रूप यानी प्रमाता से पृथक्‌ उसका प्रमेयरूप अवश्य ही रसहीन, गुणहीन, ध्वनिहीन ओर एकमात्र अलंकार-युक्त 1 ओर कुं उसमे माना जाए तो केवल दोषाभाव माना जा सकताषहै, जिसे कान्यत्व को उत्थान-भूमि कहा जाना चाहिए दूध यदि शुद्ध होमा तो उसकी खीर मं इलायची की सुगन्ध तथा केसर-वणं भी खिल्गे। इन दो विशेषताओं के अतिरिक्त द्वैतवादी दृष्टि से काव्य की अपनी काया मे अन्य कोई धमं कदापि नहीं स्वीकार किया जा सकता इनमे भी दोषाभाव अभावात्मक ही है, वास्तविक केवल अलंकार ठहरता है फलतः कान्यशरीर का वास्तविक धमं ओर उसमे उपादेयता कने वाटी चारुता, सुन्दरता, रमणीयता, चमत्कारिता या असाधारणता का उत्स अलंकार ही ठ्हरता है। जहां कहीं अलंकार का उपमा आदि स्थूल रूप नहीं दिखाई देता ओर काव्यत्वं माना जाता है वहाँ ध्वनिवादी याये दतवादी आलोचक दोषाभाव कै अतिरिक्त कव्य शरीर में कोई धमं सिदढ नहीं कर सकते, फलतः वे अकाव्य से उस काव्य कौ अनुभवसिद्ध भिन्नता का कोई कारण नहीं बतला सकते, विशेषतः काव्यप्रकाश के रचयिता मम्मट।

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निष्क यह कि अदैत दृष्टि से काव्यश्रीर के भीतर रस॒ आदि भी अंकार है ओर दित दषिसे भी काव्यशरीर का एकमात्र धर्मं अलंकार ही है, निदान कान्य को अकाञ्च्‌ से पृथक्‌ करने वाला त्व एकमात्र अलंकार है, इसलिए “अलंकार कान्य की उपादेयतां का प्रथम ओर चरम निदान टे, अलंकार दी काव्य की अत्मा हे प्रमातृपक्च मे हम काव्य के परिणाम पर विचार करते ह, जिसे काव्य से सम्बन्धित वस्तुओं का विचार कहा जा सकता है, स्वयं कान्य का विचार नहीं

काव्यस्वरूप- प्रच: काव्य को अक्ताव्य से भिन्न करने वाला स्वगत धमं तो ' अलंकार' हुज यहु जो काव्य नामक धर्मी है यानी अकुकार का जो आश्रय है, माने अलंकार जिसमे रहता है, वह क्या? न्तर : कहा जाता है वह शाब्द" ओर अर्थः का जोडादहै। ठीक है, किन्तु प्ररन उपस्थित होता है कि शब्द ओौर अर्थं काव्यल्प में परिणत होते समय क्या उसी रूप में रहते हैँ जिस रूपें वे संसार मे दिखाई देते हैया उससे भिन्न किसी अन्यसरूप मे; प्रथम विकल्प स्वीकार करने पर एक बहुत हौ भीषण्‌ आपत्ति सामने सुरसा बनकर खडी दिलाई देगी वह्‌ अपत्ति होगी अर्थ॑के विषयमे! कालिदासने कुमारसंभव के प्रथम पद्य ये "हिमालय" कहा क्या यह वही हिमाल्य टे निसक्रे शिखर पर हम आज भी चदढने का अभियान कर रहै मौर जिसे बहकर गंगा आज भी भरलोक का ब्ह्मद्रव बनी हई है। हिमाख्य का वह स्थावर इष जियमे शिका, वृक्ष जौर जल के वन ओर तरल रूपों का संघात दै, जो पूरं दिशा से पञ्चिन दिशा तक उत्तर दि मे एक निचित स्थान में लेटा हुजा है, यदि कुमारसंभव काव्यकत हिमालय यही हिमाख्य हे तो उसे हम अन्यतर सर्व कैसे प्राप्त करते दै कुमारसंभव तो विद्व केहरकोनि मे पा जा रहा है। क्या उसमे अ्थरूप से गृहीत हिमालय वही दै जो किसी एक भूखण्ड ओर किसी एक दिशा का चिलोच्चय है, शिलाभित्ति है, उन्नत प्राचीर हे, सीमा प्रहरी है, दुगं है। यदि वही, तो वह्‌ यहाँ काल्ञी मे ओर इसी समय जिन अनेक स्थानों पर कुमारसंभव पदा जा रहा होगा ` उन सभी स्थानों पर कैसे पहुंच रहा है ? यदि पटच रहा है तो क्यों नहीं हम उससे दब जाते ओर क्यों नहीं वह्‌ अपने मूलस्थान पर अनुपस्थित मिलता वह्‌ अपने स्थान पर उपस्थित रहता ओर एक ही रहता किन्तु हम काव्य में उसे सर्वत्र अनेक स्थानों पर उपस्थित पाते है। क्या है यहं बातत निरिचत ही वह्‌ हिमालय कान्य का हिमालय नहींहै जौ उत्तर दिश्या में भित्ति बन कर पडा हुआ है यही प्रन क्चब्द के विषयमे उपस्थित होता है कालिदास ने लिन शब्दों का उच्चारणं किया होगा वे तो उच्चारण समाप्त होते ही समन्त हो चक्रे होगि फिर हमे उनके शतानल्दियों प्राचीन शब्द अज तक क्से उपलब्धं ? "कपि या अनुक्ररप के द्वारा

( &१ )

हम उन्हें जिलए हृए हैँ मौर वे खकेतिक रूपमे हमें प्राप्त होते जा रहै है यह्‌ उत्तर ठीक है, किन्तु प्ररन उपस्थित होता है उन शब्दों की बोधकताका। वे हमे अथंका ञान कराते हें यदिवे शब्द अपने मुलरू्पमें हीकाव्यहैँतो हमे किसी भी अन्नात भाषा का कान्य अविदित प्रतीत नहीं होना चाहिए, क्योकि शब्द तो किसीभी भाषा मे बदलते नहीं वणंमाला ओर ध्वनियां प्राकृतिक वस्तुएं हँ उनका उपयोग ओर विनियोग हम जेसा चाह कर सकते है किन्तु उतने से उनके भौतिक ओर प्राकृतिक स्वरूप को हानि नहीं होती शब्द यदि वहीहैजो लोक में प्राप्त है तो एक ही वाक्य के अनेक ओर विविध अर्थं नहीं होने चाहिए, क्योकि सुय किसी को भिन्न प्रतीत नही होता चन्द्र ओर अग्निया समस्त प्रपन्च प्रत्येक बोद्धा को एक ही स्वरूप में प्रतीत होते कोई भी व्यक्ति एेसा नहीं जो चन्द्र को अंधकार समन्चता होया अंधकारको वस्र रात सव के लिए रातह ओौर दिन सबकेक्िए दिन ही फिर एक ही वाक्य का अथं बोद्धाके भेदसे भिन्न वक्योंहो जाता है? |

ब्द ओर अथं के जोड़े" की बात भी अस्वाभाविक-सीहै। शब्द हमारे मुखाकाड या श्चोत्राकाशमे है ओर अथैयदिहै तो सैकड़ों कोस दूर फिर एेसे कितने अ्थ॑हैजो वत्तमानकालिक हैँ ? युधिष्ठिर आदि अब कहां ? कलि्पितोपमा में चन्द्र से सपं के लटकने की कल्पना में चन्द्र॒ ओर सपं के सम्बन्धकी बात तो आत्यन्तिकं रूप से असत्य है उसका तदुवाचक शाब्दो से सम्बन्ध केसे होगा ? सम्बन्ध के किए अस्तित्व तोकम्‌ से कम, अपेक्षित होता ही है! बरध्यापूत्र, शशषणुङ्ध, खपुष्प, केच्छपीपय ओर अन्धकार आदि जो त्रिकालबाधित तथ्य, क्या इनके साथ सम्बन्ध बन सकेगा ? जब विद्यमान अर्थो के साथमभी ब्द का सम्बन्धं संभव नही, तब अविद्यमान ओर कल्पित अर्थो के साथ शब्द का सम्बन्ध संभव कैसे ?

इस प्रकार शब्द, अथं अौर उनका सम्बन्ध तीनों अपने भौतिक ओर वैज्ञानिक रूप में अनुपपन्न भौर असिद्ध सिद्ध होते है क्या इसी उल्टवांसी का नाम है काव्य? यदि असंगति ही काव्यदहै, तो दोष किसे कहा जाएगा ? यदि उसी असंगति पीले शिष्ट ओर विशिष्ट सभीद्टे हृए्‌ है, समपित रहै, व्यामुग्धरहै तो उनका ओर सिरफिरे व्यक्ति का अन्तर किस बातमें है? तव असम्बद्ध प्रलाप ओर रामायण, गाङी ओर महाभारतम फरकहीक्या? क्योंवेदको ही पूजा जाए, अवेद को भी क्यों नहीं

वस्तुतः शब्द काव्य है, अथं ओौरन इन दोनों का युग्म काव्य है शाब्द के माध्यम सेहोने वाला अथंज्ञान अथज्ञान के लिए शब्द स्वरूपमात्रे कारण नही होता, उसके साथ अथं का एक बौद्ध संबन्ध अपेक्षित होता है यह सम्बन्ध संकेतात्मक होता है संकेत व्यक्तिसापेक्ष है, अतः उसमे अन्तर भी रहता है ओर भाषां बदलती रहती है शब्द भी अथंही है अपने मूल ओर प्राकृतिक रूप में मस्तिष्क किसी कोनेमे हम शब्द का संस्कार विठाए रहते है ओर किसी कोने मे तदितर वस्तुओं

( क्र ,

न्धसूत्र भी वर्ना ठेते है, व्यवहार के लिए तय हो गीर चन्द्र कह्ने से अमुक वस्तु तथा अ्थंके ज्ञानोंमे एक ज्ञान

करा। हम इन दोनों संस्कारों का एक संब कर छेते है कि सूर्यं कहने से अमुक वस्तुकाज्ञान का। अर्थात्‌ हम लब्दस्वरूप या ध्वनिसमुदाय कै ज्ञान ही गाँठर्बाँध ठेते है यह्‌ गांठ ही राक्तितत्त्व है, यही वृत्ति है, यही व्यापार रदहै, यही संकेत है ओर यही सम्बन्ध 1 अव हमारे मस्तिष्क के खम्बद्ध तन्तुओंमे से कोई एक संकरत होतादै तो दूरा भीञ्कृत हौ उक्ता हे। इम!री बोधशकटी चरं चं करती आगे बढ़ने लगती दहै बाद मे उसमें गति जाती है ओर वह्‌ शकटी हेमपर्णा हंसिनी बनकर हमे जाने किन~क्िन लोकों कीसैर कराती रहती दै। सारा खेल, सारी टीला, सारा इन्द्रजाल हमारी बुद्धिकाटं यही बुद्धि कान्य भौ बन जातीदहे। ज्य ओर अर्थं उसमे सहायक ही बनतेहैँ। येतो दो अरणिर्या हैँ जो अपने संघषं से काव्याग्नि को जमाती ओर उसे अभिव्यक्त करती इसीलिए हमने कला को संकल्प. योनि अर अनङ्ध कहा है इस भूमिका पर आरूढ चिन्तन अवश्य हौ दिशा पा चेता है! उत्तर देने की आवश्यकता नहीं रहती श्रुमारसंभव' का (हृमाल्य' अपने भौतिक खूप में जहां कातर्हाहै, वह अपने ज्ञानल्प को शब्द के गरूड पर बिठा देता है ओर वह देश तथा काल की परिधि को अतिक्रान्त कर संख्यातीत रूपमे एक लीलालोक में प्रविष्ट हो जाता ठे शीशमहल सा यह्‌ रीलाल।क, यह भावलोक, यह कल्पनालोक या बुद्धिलोक एक को अनेक मूतियोंमें अंकित ओर प्रकारित करता रहता रहै कोई असंगति उपस्थित नहीं होती क्योनरेसाहो? असंगति जिन स्थ प्रतिमानों की इयत्ताओं पर निर्भरह वे प्रतिमान अपनी स्थूकता से मुक्तं हो इयत्तातीत जो हो जाते है, मिति ओर माया की सीमा से ऊपर उठ ब्रहमीभूत जो हो जाते है ।पूर्वादधं की सीमा हट जाती है शौर पराध की निस्सीमता जात है मानो हमारे चन्द्र की सोलह्वीं कला लिव के मस्तिष्क पर जा बैठती है

अव अर्थं ही नहीं अर्थान्तर भी कान्यस्षीमा में चले अति हं ओर अथे का आयाम दीघं से दीर्घतर ओर दीर्घतर से दीर्घ॑तम बनता जाता है किन्तु “स्ख' इन अर्थो का परिणाम ही रहता है, अथं नहीं अलंकार इस कल्पनालोक ओर संवित्तिके इस परमधाम मे अथैका ही धर्म॑ रहता है अलंकार ज्ञानात्मक होता है जब कि इस संवेदनात्मकः, च्वंणाप्रसृत रसनात्मक किन्तु हमे यह सब कहते हए यह नहीं भूलना है करि रघ # यह्‌ स्थिति, उसका अलंकार के साथ अन्तर प्रमाता के अन्तमन मं बेठकर किया चिन्तन है। प्रमेय के वस्तुपक्ष की दृष्टि से स्थिति भिन्न होगी किन्तु स्थिति रस कही भिन्न होगी, अलंकार की नहीं। अलंकार दोनों भूमिकाओं मे यथावत्‌

अना रहैगा अरुकार यानी उपमारि > पमादि सौन्दर्यात्मक अकुकार कौ रि थति तो ओर

पूर्वोक्तं समस्याओं के समाधान कौ

¢ चर +

उक्त परिकल्पना से हमने यह देखा कि काव्य एक ज्ञान है ओर इसलिए वह्‌ केवर प्रमेय नही, प्रमातृगत, प्रमातृचेतना में प्रतिबिम्बित प्रमेय है यानी प्रमित दै, बुद्धहै, प्रतिपन्न है फलतः हमने वस्तु ओर व्यक्ति के दोनों पक्षों मे समन्वय ओर सापेक्षता का अनुभव किया। किन्तु यह एक वस्तुस्थिति है। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि परमेयपक्ष' कुछ हेही नहीं। कारण कि ज्ञान-जगत्‌ भी देतमुक्त नहीं रहता ओर उसमे भी दन, भ्रपन्च, अवयव, खण्ड, अदा रहते है हम उन्हीं अवयवो ओर अंशोंका स्वगत वेशि आंकते ओर तदनुरूप प्रमेयव्यवस्था करते फलतः कान्य प्रमातु- व्योम के बीच उडने वाला सुपणं होकर भी उस व्योम से अभिन्न नही, ओौर "उसके प्रत्येकं पणं, उन पर्णो के प्रत्येक लोम उनमें से प्रत्येक की चित्रता" यह्‌ जो सव है यह्‌ भी स्वयं उसकी ही विभति है व्योम की नहीं कविता तो प्रमात्ुरूप दाशरथि के महुल कीसीतारहै। वह वहाँ आरै, पैदा नहीं हुई जब चाहती है पुनः निकल जाती ओर अपनी मूल-भरूमिकामें विलीनहो जातीहै। उसे कभी रावणभी चुराङ़्ेजाताहै किन्तु वहभी उसे प्रतिष्ठित करता अशोकवाटी' मेही है ओर वरहा प्रतिष्ठित करके भी अपने दौरात्म्य से उसे तनिकमभी प्रभावित नहीं करपाता। वस्तुतः रावणको अपने यहां को अशोक-भूमिका कौ वास्तविकताका ज्ञान ही नहीं, किन्तु कदिताकी सीता उस भूमिका से अलग कहीं रह्‌ खकती ही नहीं वह तो ेसी शकटी है जो केवल चके नही, माग-भूमि भी अपने साथ किए रहती दहै ओर चलती है तो केवर उसी सां पर, नहीं तो चलती ही नहीं

अव हमे अपने चिन्तन के धरातल काध्यान रखनाहै जौर प्रमाताया प्रमेय, किसी कै भी धरातल से विचार करते समय अपने धरातल को छोडना या उससे भटकना नहीं है

इस प्रकार अलङ्काररूपी जो धमं है उसका धर्मी है ज्ञान अर्थात्‌ अलङ्कार ज्ञान मेँ रहता है वह स्वयंभी ज्ञानात्मकहै। इन दोनों ज्ञानोंका धमंध्मिभाव ज्ञान ओर अनुव्यवसाय के धमधमिभाव सा माना जा सकता है। अनुव्यवसाय में विषयभूत ज्ञान धममरूप से निविष्ठ रहता है अतः अनुव्यवसाय धर्मी होता है। इनमें सम्बन्ध विषयविषपिभावात्मक ही हो खकतादहै, यातो हो सकता है (स्वरूपात्मक' लौकिक अलङ्कारो के समान इनका अपने धर्मी से संयोग सम्बन्ध मानना कृविताके स्वप कै विषय मेँ अपना व्यामोह प्रकट करना है कान्यात्मक ज्ञान को अनलकरति कहना भी राव को विवाहयोग्य दुकह कहना है अथवा कालिदास के शब्दों सें रमरानशल को यज्ञमुप बनाना है। कान्य में अलङ्कार का अस्तित्व उतना ही अनिवार्य है जितना किसी श्रोत्रिय के कन्धे पर यज्ञोपवीत का अस्तित्व या किसी सुहागिन की र्मागमें सिन्दुर का

( ६& , |

इन विचारो के साथ हमारा अटंकारसवंस्व साहित्यजगत्‌ कौ सेवा मे प्रस्तुत ट्‌) इसके मुद्रण में अनेक दोष रह गणु कुछ स्थलोकेनिदद हमने पीले की संशोधन- तालिका में किए रहै) अन्य कुछयेदं--

पृष्ठ पक्ति अशुद्ध सुद्ध कथनानव कथनेऽनव | १४ भीम इत्यादि इ्टोक कायस्य कामस्य | १७ (महिका इत्यादि इलोक अन्तीमा अमान्ती | १७ विमरशिनीको अन्तिम पं० सचमत्कार सचमत्कारं | २० विम० की प्रथम पंक्ति १८ पृष्टकी विमदिनी कै | 'वामनेनतु-वामनेनेत्यादि साथ पठं | ५१ नतीचेसे उत्तर अन्तर ५९ नीचेसे नहीं वही ५८ विम० कवाटविश्रममू° कवाटविश्रमममु | = रण रग | ७० ११ नहीं मिक्ता द्र° २।१४७ | ७५ शीर्षक पञ्चालद्कार लाटानुप्रासः १५७ हीषक उत्टेालङ्कार भ्रान्तिमदल्कारः ३६७ शीषक समासोक्त्यल्ड्ार सलेषालङ्कार ४४ १४ मन्यते मन्वते | | ५२९ हीषक ` विशेषोक्ट्य 9 एकावल्य° | | ५३१ रीषक समालङ्धार मालादीपका० | | ५४० नीचेसे क्ण्ठागञअ कण्ठागत० | ६१५३ नीचेसे३. तस्य यथा तस्यान्यथा० चन्द्रपादपानु जन्मपादपान्‌

३०६, ३४४, ५३२ पर छपी सूत्रसं २८, २३१५० को मशः २१ ,३३,५७ माने

[य + ^ [11

1 आविद दो निजो कनकः १. [न

`: १. तुल्यश्रुतीनां भिन्नानामभिषेयेः परस्परम्‌ व्र्णानां यः पुनर्वादो यमकं तचचिगद्ते |काव्यारकार २।१७] खद्रट ने इसी लक्षण को अपने लक्षण का आधार बनाया हे

( &५ )

अपक्षाप्‌-विम्िनी तथा सव॑स्व मं प्राप्त नवीन स्थापनाओं पर भूमिका में विचार करना आवश्यक है, किन्तु हम उसे छोड रहै दै, कारण कि वह्‌ प्रायः मृल्मेदही अपने स्थान पर किया जा चुका है कुछ अवरिष्ट है जेसे- (क) वृत्तिकार का भटुनायक्‌ के विषयमे यह कहना कि वे ही व्यापार- प्राधान्यवादी है, जब कि व्यम्जनावादी भी उस क्षेत्र मे गिना जा सकता है जेसे- ( ) व्यठ्जनानामक अतिरिक्त शब्दन्यापार स्वीकार किया जाए या नहीं। लक्षणा को भी क्यों स्वीकार किया जाए केवल अभिधा से ठी पूणं बोध क्योंन मान-

लिया जाए अभिधा भो क्यो मानी जा ए, क्योकि शब्द तो मुरुतः जड है भौर व्यापार चेतन मे रहा करता है।

( ) (स्वसिद्धये पराक्षेपः आदि वाक्यो के जो प्रयोग मम्मट आदि में प्राप्त सन्दर्भ से हटकर भिन्न सन्दर्भ मे यहां मिलते हैँ उनके स्रोतों की गवेषणा आदि |

इनमे से शब्द की जडता का परिहार हम इसी भूमिका मे कर चुके है व्यज्जना- खण्डन के लिए हमने सहित्यदरशने तात्पयस्वरूपम्‌" नामक एक स्वतन्त्र ग्रन्थ छिख दिया दै स्वसिद्धये" आदि वाक्यों के सन्दर्भ रत्नाकर से खोजकर यथास्थान मुलमेंहीदे दिए हैँ व्यापार-प्राधान्यवाद कौ भहनायक तक सीमित मानना या केवल उन्हीं के सिर पर योपना भटनायक की स्थापनाओं मे व्यापारो की बहुलता पर निर्भरहै। भावकत्वं ओर भोजकत्व दो ठेस व्यापार ठँ जिनकी कल्पना शब्दव्यापार कै रूप की गद है शौर कदाचित्‌ केवल भटुनायक द्वारा ही की गई हे। अधिक विचार स्वतन््र- ख्पसे क्ियाजा सकता है।

विमशिनी के पाठ-संशोधन मे हमने पाण्डुग्रन्थों की सहायता छेनी चाही तो उसमें महूत विवाद पाया उदाहरणाथ काक्लीहिन्द्विश्वविद्यालय मेँ विमश्णिनी की दो शारदा प्रतिर्यां हैँ उनमें ओर ड० रामचन्द्रद्िवेदी दाया देखी प्रतियों में तृत्तिके श्रणम्य °? इत्यादि मंगल पद की विमशिनी “निजेतिः प्रतीक से आरम्भ होती है उसके पह को जो व्याख्या निण॑यसागरसंस्करण चछ्पी हे वह उन्हँं किसी एक प्रतिमेंही प्राप्त हुई है, किन्तु है मूल ही, क्योकि फेसा संभव नहीं कि टीकाकार मंगल्पय की -वाख्या उसके उत्तरार्धं से आरम्भ करे, वह भी तब जब ूर्वाधमे परा वाणी' ओर उसकै त्रिविध विग्रह्‌" की गढ ग्रम्थि उपस्थित हो फिर परावाणी तो कारमीरियों की सोमलता है उसीके रसम विभोर रह वे अपना चिन्तन स्थिर रखते हैँ जयरथ उसे कंसे छोड सकते है ? तत्रापि इसकी जो व्याख्या हां दी गई है उसकी गंभीरता, उसका पदावली, उसकी प्रमाणसंपत्ति का छठागत वैदुष्य की अपेक्षा रखती है, वह जयरय जेसे सर्व॑शास्त्रवेत्ता के ही अनुरूप है इसके अतिरिक्त "देवी" शब्द की एेसी ही व्याख्या जयरथ ने तन्त्रालोक भादिकीटीकामेभीकी दै फलतः एक प्रति में मिलने पर भी उत प्रामाणिक मु मानकर अपनाना उचित हे हमने अपनाल्याभीहै।

अ० भू°

.(. ६६ )

सूत्रों का पाठ विमशिनी की काशौ दिन्दूविरवविद्याल्य मे प्राप्त एक शारदा प्रतिमे भी अरुंकारसूत्रः नाम से पृथक्‌ दिया मिल्तादहै, मतः हम भी उसे यहा प्रथक्‌ दे रहे है जो चतुर्थ सूत्र वृत्ति मान लिया गया था इस प्रति मेव ह॒ भी सूत्रों मे ही पठित है, किन्तु उसमे आगे पठित सूत्रपाठ के ८३, ८४ तथा ८५ सूत्रों को एक टी सूत्र माना गया है उसमें 'एते' चाब्द नहीं है। मूटपाठ अधिकतः विमर्शिनी के अनुकल्प दही द्या दै, किन्तु जहां उचित लगा है उसके विपरीत नवीन पाठ भी अपनाया गया है यहु काय मध्यप्रदेगचासनसेवामें रहते हुए क्ियागयाद्टै। उस लासन के प्रति आभारीह। 412; ~ मन्तमें काङी के विश्वविश्रुत प्रकारनसंस्थान चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस ` तथा, चौखम्बा विद्याभवन के अधिकारी श्रीमान्‌ मोहनदास जी गृप्त तथा श्रीमान्‌ विदुलदास जी. गृप्त को धन्यव।द देता जिन्होने इस बड़े कार्यको बङद्धीकार किया भौर साहित्यसेवियो के लिए सुलभं बनाया मञ्चेदुःवहै करि इस ग्रन्थ की पूर्तिक पूवही इष महान्‌ सस्थान के कणधार श्रीमान्‌ सेठ जयक्रष्णदास जी गृप्त तथा श्रीमान्‌ सेठ श्रीकृष्णदासजी गृप्त कुछ ही दिनों के अन्तर से असमय में गोलोक सिधार गए

यदाकदा मनि संदिग्ध अंशो पर अपने परमगृर का्ञी-सुमेरुपीठाधीडवर रङ्ुराचाय नन्तश्री विभूषित ध्रीमहृदव रानन्द जी सरस्वती, उसी भूमिका के विदेहराज महामाहेशवर भाचाय.प० रामेश्वर जी ज्ञा तथा अपने पित्तृतुल्य गुरु प० रामकरुवरजी मालवीय से परामश किया है उनको प्रणापांजलि अपित करता हूं तद ^ 4 4 मै इस दिश्ामें काय करने वाले अपने पूर्वं सुरियोंके प्रति भी ऊतज्ञता अर्पित करता हः जिनसे मेरे चिन्तन को बल भिका | इय ग्रन्थ वृत्तिगत उदाहरणों तथा विपरशिनीपो की ` सूची विद्रद्र श्री सातकडि भूखोपाध्याय वद्धीयने बनाई वे एतदथ शतशः साधुवाद के पात्र हैँ किमधिकेनं। | नमः सुमेधसे तस्म सृखेवाय कोटिशः। | बोधः शोधः प्रवन्धदच सरपरधा यत्र जाग्रति

` श्रीगुसपूणिमा, | -- रेव प्रसाद दिवेदी सं° २०२८, वाराणसी 4. १/५ ०४

९.

रजानक-धीरुय्यकस्य फरतिः

अट्ह्ारदूघ्म्‌'

पहाथपीनरक्त्यं॑चब्द्परनस्वत्यं चब्दारथपोनसक्त्यं चेति त्रयः पानर्क्त्यप्रकाराः। |

तत्राथपौनलक्त्यं -गर्ढं दोषः |

आघखावमासनं पुनः पुनरुक्तवपामासम्‌ |

त्ब्दपोनसक्त्यं व्यज्जनमा्रपौ नरद स्वरव्यरजनतसमुदाय--पौन- सक्त्य |

संस्यानियमे प्रवे छेकानुप्रासः | ` अन्यथा तु वर्यनुग्रा्ः |

स्वरव्यञ्जनस्मुदायपोरृक्तयं यमकम्‌ | रब्दाथपानरक्तयं प्ररूढं दोषः |

तात्पयभद्वत्त॒ टायानुप्रासः

तदेवं पौनस्क्त्ये प््चाटंकारः |

वर्णानां सक्ता्याकतिहेतुत्वे चित्रम्‌ उपमानोपमेययोः साधम्य मेदामेद्तुल्यतरे उपमा ` एकस्यैवोपमानोपमेयत्वेऽनन्वयः |

दरयोः पर्यायेण तस्सिन्नपमेयोपमा

सदस्रायुभवाद्‌ वस्तन्तरस्पतिः स्मरणम्‌ अभेदप्राधान्ये आरोपे मारोपविषयानपहुवे रूपकम्‌ | आरोप्यमाणस्य ग्रकतोपरयोगित्वे परिणामः | `

` विषयस्य सन्दिद्यमानत्वे सन्देहः

जलङ्कारसत्रमिति वृत्तिरदितो रय्यकैकरचितः सूत्रमाव्रात्मा स्वतन्त्रो न्थः

२. ददेति पदं प्रतिसूत्रम्‌ आग्रन्धमनुवत्तेनीयम्‌

( ष्ठं )

सादस्याद्‌ वस्त्वन्तरप्रतीतिम्रान्तिमान्‌

२० एकस्यापि निमित्तवन्नादनकधा ग्रहणमुल्टखः |

२९ विषयस्यापहूुवेऽपहुतिः |

२२ अध्यवसाये व्यापारप्राधान्य उदक्षा |

रर अध्यवसितप्राधान्य लतिश्ययोक्तिः |

२४ ओपम्यस्य गम्यत्वे पदार्धगततवेन प्रस्तुतानामग्रसतुतानां वा समान- ध्मामिसम्बन्धे तुल्ययोगिता |

ष॒ ब्रस्तुतप्रस्तुतानां तु दीपकम्‌ | 8 वाक्याथगतत्वन सामान्यस्य वाक्यद्वये पृथडूनिरद्े प्रतिवस्तूपमा

२७ तस्यापि विम्वप्रतिविम्बभावतया निर्दे दण्टन्तः

२८ संभवताऽ्तमवता वा वस्तु्म्बन्धेन गम्यमानं प्रतिनिम्बकरणं निद््रना

२९ भेद्प्राधान्ये उपमानादुपमेयस्याधिक्ये पिपर्यये वा व्यतिरेकः |

२० उपमानोपसेययोरेकस्य प्रधान्यनिदगेऽपरस्य सहार्थसम्बन्े सटाक्तिः |

२४ विना किचिदन्यस्य सदस्च्वाभावो विनोक्तिः |

२२ विदेषणानां साभ्यादग्रस्तुतस्य गम्यत्वे समातोक्तिः।

रेरे वविन्नेपणततामिप्रायत्वं प्ररिकरः।

२४ विरेष्यस्यापि साम्ये द्रयोर्घापादाने स्टेषः

२५ अप्रस्तुतात्‌ प्रस्तुतस्य सामान्यवि्ेषमावे कार्यकरारणमातरे वां सारूप्ये प्रसतुतग्रतीतावप्रसतुतप्रश्र॑सा |

र¢ सामान्यविरेपकार्यकारणमावाभ्यां निर्िष्पकृतसमर्थनमर्थान्तर- न्याप्तः |

२७ गम्यस्यापि मडग्यन्तरेणामिधानं पर्यायोक्तम्‌ `

९८ स्तुतिनिन्दाभ्यां निन्दास्तुत्योर्गम्यते व्याजस्तुतिः |

र९ उक्तवक्ष्यमाणयोः प्राकरणिकयोर्ित्ेषप्रतिपच्य्ध निपेधामासं अ्षेपः |

धि 1 1.

१.२. सूत्रयीरनयोः संख्ये मूलग्न्ये क्रमेण २८,२३ इति मुद्भते संशाधयन्तु सक्रपम्‌

४५

` १, सूत्रेऽ् मूलग्रन्थे ५० इति संख्या मुद्रिता कृपया शोधयन्तु

( ६६ )

अनिष्टविभ्यामासरच

विरृदामासत्वं विरोधः|

कारणाभात्रे कायस्योत्यत्तिर्िभावना |

कारणसाममये कायानिदत्तिर्गि्ेषोक्तिः |

कार्यकारणयोः समकालते पोवापिर्थनिपर्ये चाति्चयोक्तिः | तयोस्तु भित्रदेश्रत्वेऽपक्गतिः | विरूपकाय।नथयोष्तपत्ितरिल्यसंघटना विषमम्‌ तद्विपययः समम्‌

स्वनिपरातफ़लनिप्पततय प्रयत्नो विचित्रम्‌ आात्रयाश्रयिणोरनानुरूप्यम्‌ अधिकम्‌ |

परस्परं क्रियाजननेऽन्योन्यम्‌ | अनाधारमापेयमेकमनेकगोवरमरक्य्रस्तन्तरक्षरणं विशेष; | यथा साधितस्य तथैवान्यथाक्रणं व्याघातः

सौकर्येण कार्यविरुदक्रिया |

क॑स्य पूवस्योत्तरोत्तरहेतुतवे कारणमाला |

यथाप्र् ए्रस्य विङ्ेषणतया स्थापनापोहने एकत्रटौ

वस्व पवस्योत्तरोत्तरयुणाबहते मालादीपकम्‌ 'उत्तरोत्तरम॒त्कर्षः स/रः

हेतोवक्थिपदार्थता काव्यलिङ्गम्‌ | साभ्यसाधननिदं ग्रोऽनुमानम्‌ | उरिष्टानासर्थानां करमेणानुनिर्दशरो यथासंस्यम्‌ एकमनेकस्मिकनेकमेकस्मिन्‌ क्रमेण पयायः | समन्यूनाधिकानां समाधिकन्येर्विनिमयः परिवत्तिः। एकस्यानेकगरप्तविकत्र नियमनं परिसंख्या | दण्डापूपिकयाऽथन्तिरापतनमथपि्तिः | पुल्यबटविरोधो विकल्पः |

गुणक्रिया-योगपद्यं समृचयः।

मनिनि

( ७5 ) 6७ एकस्य सिद्धिहेतुवेऽन्यस्य तक्करतं | 5८ कारणान्तरयौगात्‌ कायस्य सुकरत्वं समाधिः | ९९ ब्रतिपक्षतिरस्काराश्क्तौ तदीयस्य तिरस्कारः प्रत्नीकमू ४० उपमानस्याक्षेप उपधेयताकत्पनं का प्रतीपम्‌ | 92 ' वस्तुना वस्वन्तरनिगृहनं मीटितम्‌ | ग्रसतुतस्यान्य॑न गुणल्वाम्यादेल्यं सामान्यम्‌ | - ` : स्वगुणत्यागदत्यु््रगुणस्तीकारस्तदयुणः | ‰% सति हेतौ इयुणाननह्यरोऽतद्गुणः। ४५ उत्तरात्‌ ्रदनोक्यनमसछदलम्माव्यत्तरं चोत्तरम्‌ ७१ संलक्षितयूक््माध्रकालनं सृक्ष्नम्‌ | ५७ उदधिकवस्तुनिगहनं व्याजोक्तिः | ७८. अन्यथौकस्यं वायस्य काङुर्टेषाभ्यामन्यथा योजनं वक्रोक्तिः ७९ चूषयवसुस्मावयथधद्व्णनं स्वमावोक्तिः। ` ८० अतीतानायतय); ्त्यक्षायमाणलवं भाविकम्‌ | ८2 सश्रदिमद्‌-वस्तु-वणनयदात्तम्‌ | ८२ अङ्गभूतमहापृरुपचरितं ] ८२ रत्तमात-तदाभा्-तलन्नमानां निवन्धेन रसपत्येय-उजंस्िसमाहि- तानि। मव्रादयौ मपतसन्धिसविद्नवटता ८५ शते पथगटङ्ाराः | एषां तिटतण्डटन्यायेन सिश्रलं चंिः | ८७ क्षीरनीरन्यायेन तृ सद्र | ८८ एवमेते शरब्दाधभियाटङ्कातः संपत: सूत्रिताः ॥। छ{तिः श्रौ संजानकदश्य्यकस्य

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१. रव्त्तिपूलयरन्य सूत्रसिदः पूर्ैवततिनि सुत्रेऽन्त्क्ततया मुद्रितम्‌ , तदानीमप्रति भात्‌ काङ्गदिन्दूविश्चवियालयद्चारदापाण्डुम्रन्थे ८२-८५ सूतराण्येकसूत्रत्वे नव लिखितानि | |

शब्द्रालकार-प्रकरणारम्भ पनरुक्तव्रदाधास -. ५; > चेकानुप्रास वृत्त्यनुप्रास. > . + यमक ९; लाटानुप्रास ०६ चित्र अुधोलंकार-पकरण रम्भ १४४ उकम अनन्वय उपमेयोपमा १० स्मरण ११ रूपक १२ परिणाम १३ सन्देह १४ भ्रान्तिमान्‌ १५ उत्रेख १६ अपहृति १७ उप्प्रक्षा १८ अतिशयोक्ति ( १) १९ तुल्ययोगिता २० दीपक २१ प्रतिवस्तुपमा २९ हान्त २३ निदशना

(4 11111

२४ व्यतिरेकं

२५ सहोक्ति

२६ विनोक्ति २७ समासोक्ति

२८ परिकर

२९ इलेष २० अप्रस्तुतप्रशंसा

३१ अर्थान्तरन्यास

३२ पयायोक्त

३२ व्याजस्तुति

३४ आक्षेप

३५ विरोध

२९ विभावना

३७ विरोषोक्ति

२३५ अतिशयोक्ति (.२ )

३९ असङ्खति

४० विषम

४१ सप

४२ विचि

४२ अधिक

४४ अन्योन्य

४५ विकेष

४६ व्याघात (१) व्याघात (२)

४७ कारणमाला

४८ एकावसी

४९ माखादीपक ५० सार

५१ काव्यलिद्धु ५२ अनुमान यथासंख्य ५४ पर्याय

५५ परिवृत्ति ५६ परिसंख्या ५७ अर्थापत्ति ५८ विकल्प ५९ समुच्चय ६० समाधि ६१ प्रत्यनीक ६२ प्रतीप

६३ मीलित ६४ सामान्य ६५ तद्गुण

( ७२ )

9 २० ३३ २८ ५.४९ ५६ ३. ५.७१ ५७७ १८१ ९१ ९६ ६०८

६१२

६६ अतद्गुण ६७ उत्तर ६८ सूक्ष्म ६९ व्याजोक्ति ७० वक्रोक्ति ७१ स्वभावोक्ति ७२ भाविक ७३ उदात्त (१) उदात्त (२) ७४-७७ रसवत्‌, प्रेय, ऊर्जस्वी, समाहित ७८-८० भावोदय, भावक्षन्धि, भावशबलता ८१ संसृष्टि ८२ संकर उपसंहारसूत्र परिरिष्ट : सहदयलीला २: इलोकानुक्रमणी

ष्‌ © ६३७ ६४१ ६४७ ६५२ ६५६. ६६४ ६७१ ६८६७ ६धद्

६९२

७१४ ७१७ ७६२ ७५१ ७५७ ७६१

| | श्रीः

हि अट्ङ्ारसवंस्वम्‌

नमस्कृत्य परां बाच देवीं त्रिविधविग्रहाम्‌ गुवेटंकारघ््राणां वरस्या तात्पयंसुच्यते

सविमरं अवाद्‌

श्रद्धां मन्ये मातरं लोकमागै सा वै स्वां ओषधीः संप्रसूते। आन्वीक्षिक्यां किन्तमे भाववन्धः सा ता एता निस्तुषाः सविधत्त॥ आद्य गुर पितरमेव पुरा नतोऽहमायां लेखजननीं जननीं मयि स्वाम्‌ एक तयोस्तदनु विय्रहमद्वितीयं कादयां महेदवरयतीन्द्रकवि भ्रितोऽस्मि यन्नाम तत्त्वयुरुभिरुरुमिगरायो ज्योतिमेयि प्रतिनवं ` प्रकटीकृतं तत्‌ कल्याणकोदायुपजीव्य मया सरटीक-सवस्व-दरोधन-विधो क्रियते प्रयत्नः रुय्यकसुत्र, मङ्खः सवस्वाख्या तत्र या वृत्तिः रोधयते रत्नाकरो; विमरिनी तमपि एतत्विकक्रतमने दत्तधिया दीक्षितेन य॒द्‌ वत्मं क्वण्ण, क्षोदयते तत्‌ पण्डितराजो महारम्भः विदवेदवर इति नामा विद्वन्मान्यः पराक्रमते नव्यन्यायनदीष्णः पण्डितराजं निराक्ुवन्‌ सवामेतां विदुषां, परम्परां वौक्ष्य,वीक्ष्य दण्ड्यादीन्‌ जरतः कान्याल्करृतिकत न्‌ रेवाप्रसादनामाहम्‌ अनुवादेन सम्नद्धा व्याख्यां कुवे यथायथ विादाम्‌ रुय्यकमङ्खुकजयरथकान्याक्डकतिसुनित्रयौकृतिषु

(तीन प्रकार के हरीर से युक्त भगवती परा वाणी को प्रणाम कर युरुकरत अल्कारसूत्रं का तात्पय वृत्ति दारा बतलाया जा रहा है ॥'

श्रीजयरथक्कताटङ्ारविमद्दिनी

(न ग्र्थक्रन्निजेष्टदेवताप्रणामपुरःसरमभिधेयं तास्पयं॑चेकेनैव वाक्येन परागद्राति-नमस्छृत्येति परां वाङ्मयाधिदेव तां पराख्यां शाब्दब्रह्मणोऽपथग्भूतां शक्ति परां वाच देवीं त्रि।वधविग्रहां बहिरज्ञिराखयिषया पश्यन्तीमभ्यमावेखरीरूपेण प्रकारत्रयेणा- धिष्ितश्चरीरं नमस्कृत्य निविघ्चिकी षितम्रन्थसमाक्चये तां प्रति कायवाङमनोभिः प्रहीभरय

| | |

अल्डनरसवेस्वमम्‌

निजाल्कारसूव्राणां वृत्या तात्पययुच्यत इति मङ्गलन्वययोजना 1 तथा चाच्रोक्तरूच्णाथ- विस्तरः-

ध्येयं विमर्शङूपेव परमार्थचमर्छरेतिः सेव सारं पदार्थानां परा वागमिधीयते नादाख्या सर्वभूतेषु जीवरूपेण संस्थिता अनादिनिधना सैव सूचमा वागनपायिनी अनादिनिधनं द्य छब्द्‌तच्वं यदृक्तरम्‌ विवतंतेऽथंभावेन प्रक्रिया जगतो यतः॥ वैखरी शब्दनिप्पत्तिमध्यमा स्दतिगो चरा चो तिकार्थस्य पश्यन्ती सुचमा ब्रद्येव केवलम्‌ 1 इस्यादिल्ञाखोक्तिक्रमेण सवत्र सदोदितायाः सूच्मायाः परायाः शन्दव्रह्यगः चा्धर्वहि- रुन्मिषन्त्याः प्रथमो विवतंः पश्यन्ती नाम तथा चोक्तम्‌-

“अविभागा ठु पश्यन्ती सखवंतः संहृतक्रमा 1 स्वरूप्ञ्योतिरेवान्तःसूचमा वागनपायिनी इति अस्याथेः-अविभागा स्थानकरणप्रयलम्रकारेण वर्णानां विभागहीना अत एवं संहतक्रमा तथ्रेवान्तःस्व रूपञ्योतिः स्वयं प्रकाशा स्वस्यात्मनो रूपं ज्योतिश्च सर्वत्र हि सवंविधायिनी शाक्तिरेवेति वान्तःसू च्मबीजादङ्करमिव वदहिरन्मिषन्ती किचिढुच्टरुना पराया सध्यमायाश्चावस्थां तस्था पश्यतीति पश्यन्तीव्युंच्यते ततः परं तु- अन्तःखंकल्परूपा या क्रमरूपाञुपात्तिनी प्राणच्रत्तिमतिक्रम्य मध्यमा वाक्‌ भ्रव तंते ॥?

एतव्कथयामीति विमशंरूपा अन्तःसखंकल्पखूपा प्राणव्र्तिमतिक्रम्य श्रोन्र्राद्यवर्णा- भिन्यक्तिरहिता कमरूपाजु पातिनी मानलिकवर्णोचारणक्रमेण द्वितीयो विवतो मध्यमारूपो जायते मध्यमा किल द्वयोर्वाग्विवतंयोः पर्यन्तीवंखरीसं्तयो्मध्ये वतंनान्मध्यसे- द्युच्यते तद नन्तरं च- “स्थानेषु विन्ते वायौ छतवर्णपरि्रहा वंखरी वाद्‌ प्रथोकतृणां प्राणरत्तिनिवन्धना इति कन्ञणार्स्थानकरणम्रयलक्रमव्यञ्यमानः श्रोच्रग्राह्यटुन्टुभिवीणादि नाद परिचयो गद्ध- दाग्यक्तगकारादिविखाससस्ुचयपद्वाक्यात्मकस्ठृतीयो विवर्तो वेंखरीव्युच्यते। विशि खमाकारं सुखरूपं राति गृह्णातीति विखरः प्राणवायुसंचारवि्िष्टो वणो चारस्तेनासिव्यन्ता वैखरीति ¦ विखरे शरीरे भवा वेखरीति वा केचित्‌ सिद्धो मङ्गलार्थः तथा चाच पूर्वाधं एव पुनराच्रस्यायिधेयपदार्थांन्वययोजना-यथा परां वाचयुत्तसकाव्यरूपतया का्यासम- धवनिखंन्ताम्र्‌ अभिधाताप्पर्यलत्तणोत्तीर्णामुत्छृष्टाम्‌ दैवीम्‌ "दिद कीडावि जिगीषादतिस्त॒- तिन्यवहारमोदमदकान्तिस्वप्नगतिषु" दवि यथायथं धात्वथांनामनुस्मरणाव्‌ शक्तिमता कवीनां श्रोतृणां स्वभावास्स्वेच्छुया ससुच्छलन्तीं ऋीडन्तीस्‌ तथा दैवीं विजिगीषु खाब्द्‌ तत्सकीर्तितं चाथंश्रुपसजं नीडस्य वतंमानाम्‌ तथा देवीं चयोतसानां योतनध्वननयोः पर्यायत्वाद्‌ ध्वनिसंज्ञाम्‌ तथा दैवीं स्तस्या सर्वेः कान्यारमर्वादभिवन्याम्‌ तथा देवीं व्यवहरन्ती सर्व॑न्र प्रचरितां ठुक्ापि स्खलिताम्‌ तथा दैवीं मोदमानां श्चुततिमातरेणेव परमानन्ददायिनीसर्‌ तथा देवीं माद्न्तीं कवेः सद्द यस्य यथायथं करणावबोधाभ्यां कमप्यडंकारं जनयम्तीस्र्‌ तथा देवीं कमनीयां सवेंरभिरुषणीयाभू्‌ च्रिविध विग्रहां न्रिविधच्िप्रकारो विग्रहो व्यतिरेकेण अहो ग्यतिरेकभूलः प्रमाकरणम्रकारो यस्यास्ताम्‌ तथा दहि गङ्गायां घोषः इत्यादिवाक्येषु घोषस्य यच्छेस्य पावनत्वादिकं प्रतीयते तच नाभिधा गङ्गादिशब्दानां शौत्यार्थस्यावाचकस्वात्‌। तास्पर्यास्मा तास्पर्यलकसया दयाक्षाराधयभावावगमा्थं परस्परमन्वयमाच्र एव च्तीणस्वात्‌। रुक्तणा 1 सुख्याथंबाधा- दिदेतुत्रितयाभावात्‌ तस्माद मिधातापर्यलन्तणाग्यतिरिक्तचतु्थंकचयानि्तिसो व्यज्ञन- भ्यापार्‌ इस्यादि सोऽयमेवा्ेविष्ष्यति अथ व्यङ्गयस्य शब्दार्थोभयमूकस्वेन प्रसि-

भूमिका

द्खिविधो विग्रहो विशेषमानां सेदानां ग्रहो यस्या इति वा} एतादृशीं तां नमस्छरस्य मङ्लाचरणरूपत्वेन सनागुदिश्य तु सूचच्रत्तिभ्यां तात्पयंकथनादिङक्तणपरीच्ताविस्तारेण निर्णीय निजालूकारसूत्राणां वरच्या तात्पयंस्ुच्यत इति अस्याभिप्रायः- तथा ध्वनेमं- नागडेशमाच्रसेव करोति “इद हि ताबद्धामद- इद्यादिना तदेतत्तावदास्ताम्‌ निजेति परकीयाणां सुत्राणां तात्पयंकथनानववोधोऽपि स्यादिति भावः। तथा कश्चिदपि परेरीद्शि सूत्राणि कतानीव्यपि ध्वनितम्‌ तात्पयमिति। सं्लिक्तार्थग्रकाशनसिव्य्थः अन्यथा हि कथनमेषां वहूुनापि अन्धेन पारं यायात्‌ नज्ु-

'आदिवाक्ये प्रयोक्तव्यमसिधेय प्रयोजने प्रतिपाद यितु श्रोतृप्रवाहोस्साहसिद्धये ॥१

इति नीत्या श्रोतृम्रव्रच्यथं सवंत्रेवादिवाक्येऽभिधेयप्रयोजनाद्यभिधीयते तच्चेह नोक्तसिति कथमन्न श्रोतणां प्रवर्ति; स्यात्‌! मेवम्‌ अकारा द्यच्राभिधेयाः तेषासन्र सात्तादेवाभिधानात्‌ तद्‌ सिधायकं चेदमलकारसवस्वाख्यं म्रकरणमिव्यभिधानामिधेययोनि- यमगमभींकारेणा्थाज्ञिप्नो वाच्यवाचकभावलत्तणः संबन्धः। नद्येवविधमेतद्‌ भिधायक प्रकरणान्तरसस्ति तस्यान्विष्यमाणस्याप्युपरम्भयोग्यस्यानुपरुम्भात्‌1 अत एवात्रान्या- रकार ग्रन्थवंरत्तण्योद्धोषणाय (तात्पयस्रुच्यतेः इव्यायक्तम्‌ अभिधेयाश्चात्रारुकाराः कान्या- कारा खोकिका इत्येतेषां काव्यो पस्कृतिद्धारेण पारस्पयंण- कान्य यशसेऽथकरते व्यवहार विदे शिवेतरक्ततये। सद्यः परनिदैतये कान्तासंमिततयो पदेशयुजे॥

दत्यायुक्तनीत्या तद्‌ विनाभावस्व भावत्वादर्था्तिप्तसवपुरुषाथंसिद्धिरूपा चतुवंगां वासिः ग्रयोजनम्‌ तयोश्च साध्यसाधनभावरत्तणः संबन्धः इति स्थितमेवादिवाक्यस्य श्रोत्‌- श्रवणश्रद्धाविभावनिवन्धनत्वस्‌

सविमदं अवाद्‌

न्थकार मगल करने कौ इच्छा से अपनी इष्टदेवीको प्रणाम करते हुए [ अन्धके | प्रतिपाद्य विषय का परामदोभी एक ही वाक्य में करते हए कहते है-नमस्करव्य०। "परा अर्थात्‌ वाक्मयमात्र की अधिष्ठात्री देवी ओर शब्दब्रह्म की उपसे अपृथक्‌ परानामक क्ति, जो बाहर उल्लसित होने की इच्छा से पदयन्ती, मध्यमा ओर वैखरी इन तीन दारी मे अधिष्ठित होती हे, उसको नमस्कार कर॒ चिकीषित यन्थ की निविन्न परिसमाभि के लिए उसके प्रति काय, वचन ओर मनसे नच्र होकर अपने [ युर रुग्यकाचायं के ] अलंकार सूरो का तात्पय इत्ति ख्ख कर [ सञ्च मद्खुके द्वारा ] वत्तखया जा रहा हे" यह हरं संगल्घ्राक्य की पदाथयोजना उक्त मंगल पथमे आए पदार्थो का लक्षणसहित विस्तृत अथं इस प्रकार है- “यह जो विमो रूप से ही वि्यमान परम अथं का चमत्कार है वही सभी पद्र्थौ कासार दहे) उसी को परा वाणी

कहा जाता हे 1

उसी ( परा वाणी ) का नाम नाद हे वही सभी भूतो मे जीव रूप से अवस्थित हं उसका आदि दै ओर अन्त वह अत्यन्त सुक्ष्म ओर अनश्वर हे 1” “आदि ओर अन्त से परे जो ब्रह्म है वह शब्दतच््व है। उसी का नाम अक्षर है 1 अथ॑तत्व इसी अक्षर तत्व का विवत्ते हे यही संसार कौ विचित्र रचना की जड है निष्पन्न शब्द ( कायाग्नि दारा प्रेरित प्राणवायु का मूर्धा से स्कराकर कण्ठदवारा शब्दरूप से निकल जाना , वैखरी वाणी है [ जो कर्णगोचर होती है ], मध्यमा ( कान से नदीं सनाई देकर

कवल ) स्ति का विषय बनती है पद्यन्ती अर्थं को चोतित करती दै ओर जो अत्यन्त सूक्ष्म पर -वाक्‌ दै वह तो केवर ब्रह्मरूप ही है 1 |

अलङ्ारसवंस्वम्‌

इत्यादि दाखवचनों के अनुसार सवत्र ओर सदा उदित ( कथित अधवा उदय को प्राप्त ) जो राव्दव्रह्म की सूक्ष्म परा वाणी नामक शक्ति उसका वाहर उन्मिषित होति समय जो प्रथम विवक्तं होता है उसे पद्यन्ती कहा जाता है। जेसा किं कहा गया ह~ “पदयन्ती अविभागा = विभागरदित होती दे, उसमे क्रम विल्कुल नहीं रहता वह ( पयन्ती ) आत्मजञ्याति रूपही हे अन्तःसुक्ष्मा ओर अनपायिनी ( अविनद्वर ) हे 1'' ~ इसका अथं दे- अविभागा = अधात्‌ ( कण्ठ ताल आदि ) स्थान तथा इन्द्रियो के ( आभ्यन्तर ओर वाद्य ) प्रयत्नोसे व्णोमेंजोस्द जाता है उससे रहित, ओर इसीरकिए क्रमरदित, अन्तज्योंतिःस्वरूप अर्धात्‌ स्वय॑प्रकादा, स्वरूप = अपना अर्थात्‌ आत्मा का जो रूप वही ज्योति अथवा सवत्र सवं विधायिनी दाक्ति, जिसका अन्तराल अत्यन्त सूक्ष्म रहता है ठेस वीज से अंकुर के समान बाहर उन्मिषित दोती अधात्‌ कु कुछ व्यक्तता की ओर उन्मुख होती तथा एक ओर परा ओर दूसरी ओर मध्यमा की स्थिति का तटस्थरूप से दर्घ॑न करती इई जो वाणी है वदी पद्यन्ती कही जाती हे 1 इस पयन्ती के वाद्‌ ( आती है मध्यमा, उसक। ङक्षण है ) “जो वाणी अन्तःसंकल्प रूप हे, जिसमे क्रम ओर रूप ( अर्थात्‌ वर्णं भेद्‌ रहते है किन्त जो प्राणवृत्ति से परे रहतीदंउसे मध्यमा वाणी कदा जाता है 1” इसका अथं है--“म यह वर्ह" ेसा जो मानस-विचार तत्स्वरूप ओर इसीलिए अन्तः- संकल्पस्वरूप, प्राणवृक्ति से परे अर्थात्‌ कानों से खनाई पड़ने वाले वर्णो की अभिव्यक्ति सो रदित, क्रमरूपानुपातिनी = मानसिक जो वर्णोच्चारण उसके अनुसार विवत्तित होने वाटी वाणी मध्यमां कटी जाती है यह हआ राब्द वह्यका द्वितीय विवत्तं। इसका नाम मध्यमा इसकिए हे किं यह्‌, वाणी केजो दोष दो विवर्तं वैखरी ओर पदयन्ती हे इनके वीच रहती हे -इसके पर्चात्‌-- “स्थानों में वायु के वितरत होने पर वर्णरूप से व्यक्त वाणी वैखरी वाणी होती दै यह उच्चार यिता के प्राणव्यापार पर निर्भर रहती दै -इस लक्षण कै अनुसार स्थान ओर उद्यो वे प्रयत्न द्वारा क्रमपूर्वक व्यक्त होने वाटी वाणी वैखरी वाणी होती है। यह कानों से सुनने योग्य दुन्दुभि, वीणा आदि के नाद कै समान दोती इसमे गद्गदादि कम्पन रहते हे ओर गकारादि वर्णो के द्वारा वनने वाले वण, पद तथा वाक्य भी। यह वाग्ब्रह्मका तीसरा विवतं होता हे। इस वाणी के किए प्रयुक्त होने वाले धवे खरी” शब्द कौ निरुक्ति कु विद्वानों के अनुसार इस प्रकार है--'वि = विचिष्ट, = मुखरूप आका को = ग्रहण करने वाला हृमा--धविखर' अर्थात्‌ दारीर, उसमे उत्पन्न होने वारी हृर्ईद--वेखरी' यह हआ मंगल पद्य का स्तुतिपरक अथं दसी मगल्पद्य के पूर्वाध के पदों कौ आवृत्ति करने पर॒ वह तथ्यभौ व्यक्त होता है जो प्रस्तुत ग्रन्थ मे प्रतिपाद्य है यथा-परावाणी = उत्तम॒काव्य की आत्मा ध्वनि जो अभिधा, लक्षणा मौर तात्पर्यं वृत्ति से परे रहती है देवी = </ दिव्‌ धातुका अथं हे क्रीडा, विजयेच्छा, युति, स्तुति, व्यवहार, मोद, मदः कान्तिः स्वप्न तथा गत्ति देवी शब्द मँ इन सभी अर्था की योजना यथासंभव की जा सकती हं। क्रोडा अथेमे देवी = राक्तिमान्‌ कवियो तथां ओ्रोताओं मे स्वमाव से स्वैच्छया ससुच्छकित होती हृद जात्‌ करडा करती हुई, विजिगीषा अथ मे देवी = विजयेच्छा रखती हुई अर्थात्‌ शाब्द ओर उससे प्रकट अथको गौण बनाकर अवस्थित खति अथं मे देवी = चोतित अर्थात्‌ ध्वनित होती हृद, चयोतन जर ध्वनन दोनो के पयायवाचक हाने से चोतमान का अथं हुआ ध्वनिसंज्ञक स्ति अथं मे देवी = स्तुत्य, ( ध्वनि रूपतत ) काव्यात्मा होने कै कारण सभी सहृदयं दवारा अभिवन्दित न्यवहार अथ मे देवी = सभी क्षेत्र मे वाका, कहीं भौ स्खित होने वारी मोद अथ॑ मं देवी = सुनने मात्रसे परम आनन्द देने वाटी मद अर्थं मं देवी = कवि ओर सद्दय म॑ करम से निर्माण ओर अनुद्ीलन द्वारा एकं विचित्र अहंकार पैदा करने वाढी, कान्ति अथं मेँ देवी = सभी व्यक्तियों दवारा अभिलषणीय

भूमिका

कान्ति = इच्छा) त्रिविधविय्महा = चिविध अथात्‌ तीन प्रकार काहे विग्रह अर्थात्‌ व्यतिरेकी ग्रह यानी व्यतिरेकद्वारा प्रमात्मकं ज्ञान करते का प्रकार जिसमे; जसे “गंगा पर घोष है" इत्यादि वाक्यों में घोषम जो रओेत्यपावनत्वादि धमो काज्ञान होता है उसमे अभिधा कारण नहीं होती क्योकि रात्य आदि अथोमं गगादाब्द कम वाचकता ( सकेतयमह ) नहीं रहती, तात्पयराक्ति दही क्योकि तात्पयद्क्ति गगा आर घोप आदि मं आधाराधेयभाव आदि संबन्धमा्रका ज्ञान कराकर नष्ट हो जाती हे, लक्षणा ही, क्य।कि लक्षणा कै हेतु मुख्यथेवाध आदि यों नहीं रहते फलतः अमिधा, तात्पर्य ओर लक्षणा से भिन्न चतुथं कक्षामे निहित व्यजनान्यापार से रोत्यपावनत्वादि करा ज्ञान हो पाता दे। [ इससे स्वयं विमरिनीकार ही आगे विचार करेगे ]। दूसरे प्रकार से ( त्रिविधविय्रहा ) चब्दमूलक, अथमूल्क ओर उभयमूलक, अतः तीन प्रकारका विग्रह अर्थात्‌ वरि = विशेषणा मेदो का यह~ज्ञान जिसमे ेसी उस उत्तम काग्यरूपा परा ( दाक्ति ) को नमस्कार रने का अथ मंगलाचरण के साध्यम से सूत्रात्मकल्गसे कु निदश्च करनाःनकि सूतद्रारा तात्पये कथन अर ब्रत्ति द्वारा लक्षणपरोक्षा आदि के विस्तार के साथ अपने अक्कारसूत्रका त।त्पय॑ वृत्ति द्वार! वतलाने का अभिप्राये कि यहं ध्वनि कातो केवर थोड़ा सा नामकथन मात्र रहेगा, अधात्‌ “इद हि तावद्‌ भामह इत्यादि द्वारा [ इस पर अधिक विचार नदीं होगा ] डस विषय की चचां इतने मे ही समाप्त हो जावेगी

निज = निज इसरिए कहा कि किसौ को यह ज्ञान नदो किं किसी अन्य के बनाए सूर्नोका तात्पयं बतलाया जा रहा हे इससे यह भौ ध्वनित हआ किं अन्य आचार्यो ने रेसे सूत्र नहीं वनाए हे तात्पयंम्‌ = तात्पयै=संक्षिप्न अथे का अका्चन अन्यथा यदि इन अलकार सूरो का तात्पर्यं विस्तार पूवक स्पष्ट किया जाए तो बहुत वड़ा यन्थ रचकर भी उसका पार पाना संमवन होगा राका होती है कि-“आदि वाक्य का प्रयोग अभिधेय ओर प्रयोजन का प्रतिपादन करने कै लिए किया जाना चाहिए जिससे श्रोताओ मं उत्साह बना रहे--इस नियम के अनुसार ओता की प्रवृत्ति के लिए सभी अन्धो मे प्रथम वाक्य मे अभिघेय तथा प्रयोजन आदिका प्रतिपादन किया जता हे यदह वह नहीं बतलाया गया फलतः इसकी ओर श्रोताओं [या पाठकों ] की प्रवृत्ति नसे होगी [ उत्तर ] णेसा नहीं है यदहो अभिधेय है अल्कार, क्योकि यहाँ उन्हीं का साक्षात्‌ न।मोव्छेख है उनका अभिधायक हे मन्धनाम--'अलंकारसवंस्वः अभिधान ओर असिपेय क्रा वाच्यवाचकभाव संबन्ध रहता ही हे, अतः उसका ज्ञान अपने आपहो जाता है। दन [ अलंकारो ] का अभिधायक इस प्रकारका कोई ओर न्थ नहींहै क्योकि वह मिक्ता नहींहे। यदि [णेसा कोड यन्थ] होता तो खोजने पर मिर्तादही। इसीलिए अन्य अर्कार गन्धो से इसके अन्तर की घोषणा करने के किए कहा--'ताःपयंम्रुच्यतेः अभिघेय हैँ यहोँ अलंकार अर्थात्‌ काव्य के अल्कार कि रोक अल्कार इस प्रकार अल्कार रोमा बदाते हें काव्य की ओर-"काव्य य्प्राप्त करातादहै, धन दिलातादे, व्यवहार काज्ञान कराता है, अर्मगल का दामन करता दे, तत्काल परा शान्ति देता हं तथा कान्तासम्मित [ माधुर्य-मूमिका दवारा ] उपदेद्य भी देता हे ।› [ काव्यप्रकाश के ] इस वचन के अर्थ शब्द से गृह्यत [ ध्म, अथं काम ओर मोक्ष, इन ] चारौ पुरुषार्थो की जौ प्राचि तद्रूपी प्रयोजन सिद्ध करते है, क्योकि अल्कार काव्य से पृथक्‌ नदीं होते इन दोनो [ पुरुषां रूपी प्रयोजन तथा अलंकार ] का संबन्ध है साध्यसाधनमभवात्मक [ अलंकार साधन है जोर पुरुषां साध्य ] इस प्रकार आदि वाक्य मं श्रोता श्रवण कै प्रति श्रद्धा उत्पन्न करने की क्षमता सिद्ध ही है।

अदङ्कारखवस्वम्‌ विमरिनी

ननु यदीहारुंकारा अभिधेयास्त्िं तदरुकयोंऽप्य-मिघेयः। “अलंकारा अरंकायापेच्ठाः' इति नीत्या एववा को नाम यद्पस्कारकव्वेनतरस्वरूपमसिधीयत इत्याशङ्कय तदवत- रणिकामेव वक्तघयुपक्रमते--इदेत्यादिना दोंका होती कि यदि इस न्थ में अलका का प्रतिपादन करना दे तो उनसे जो तक्र अच्छ्रत होते दें उन अकूकार्या का भी प्रतिपादन होना चाहिए अथं यह्‌ कि (अलंकार अल्कायसापेश्च दात दे--इस नियम के अनुसार प्रदन इस तच्च के विषय में है जिसका उपर्कार करने वि तत्व कं रूप मं अरुकार का निरूपण किया जा रदा है इसे उत्तर मे कहते दै- [ सवेस्व ] इह दहि तावद्‌ भामदोद्धटयप्रभ्तयश्िरतनाटंकारकासः अरतीयमानमथ वाच्योपस्कारकतयाटकारपश्चनिष्िक्तं मन्यन्ते तथाहि- पययोक्ताघ्रस्तत- प्रदंसाखमासोक्त्याश्चेपव्याजस्तुच्यु पमेयोपमानन्वयादौ वस्तुमाचं गम्यमानं वाच्योपस्कारकत्वेन “स्वसिद्धये पराश्धेपः पराथ स्वसखमपंणप्‌ इति यथायोगं द्विविधया भङ्गया प्रतिपादितं तैः | रुद्रटेनापि भावालंकायो द्विधोक्तः रूपकदीपकापहति तस्ययीभिताद्‌ा- बुपमायलकासे वाच्योपस्कारकत्वेनोक्तः उत्प्रे तु स्वयमेव पतीयमाना कथिता रखवत्परेयः्रथृती तव रसभावादिवौच्यर्येमादेठस्वेनोक्तः। तदित्थै चिविघमपि प्रतीयमानमदंकार्तया ख्यापितमेच इस ( अल्कारश्ाख ) में ( ध्वनिवादी आचार्यो से ) प्राचीन आचाय मायह आर उद्धट आदि के जो आरम्भिक सिद्धान्त है ` उनमें ( ध्वनिवादी द्वारा प्रधानरूप से स्थापित ) प्रतीयमान अधेको ` वाच्य अथं का सोभाधायक अतएव अप्रधान ) अल्कार स्वरूप माना गया है इन आचार्यो कै अनुसार पर्यायोक्त, अप्रस्तुतप्रदोंसा, समासोक्ति) आक्षेप, व्याजस्तुति, उपभयोपम। -ओर्‌ अनन्वय आदि अल्कारो में वस्त की व्यंजना या अनुमान से) प्रतीति होती हे किन्तु वह वाच्यार्थं द्रोभाधायक होती है इस नथ्य को उन्दने दो प्रकार से स्पष्ट किया (१) “अपनी सिद्धि वै लिप ( वाच्याथ द्वारा ) दूसरे अथं का याक्षेपः, (२) “दूसरे कं प्रति ( व।च्याथं दारा ) अपना समपंणःः ने भी वस्तुध्वनि को वाच्य की शोमा बद़ाने वाखा जतलाने वाखा) मावनामक अल्कार मानां दै ओर उसके दो मेद वतकाए हैँ इस वग के आचार्यो ने ) रूपक अपहुति, तस्ययोगिता आदि में उपमादि अलंकारो को वाच्यार्थं का उपस्कारक कदा दै ( उद्धट ने तो ) उप्प्रक्षा ( के एकमेद्‌ ) को प्रतीयमान हौ कहा हे ( भामह ओर उद्धटने ) रसवत्‌ ओर प्रय॒ आदि अल्कार।म रस ञर भाव आदिक वाच्याथं का योभाेतु वतलाया है इस प्रकार वस्तु, अल्कार ओर रसय) तीनोंदही प्रकार कै प्रतीय- मान अथं को इन आचार्यों ने अल्कारस्वरूप ही वत्तटाया विम्िनी म्रष्तिना दण्ड्यादयः। तावच्छब्दो विग्रतिपच्यभावद्योत्तकः चिरंतनेत्यादि ध्वनि- कारमतमेभिर्न दृष्टमिति मावः प्रतीयमानमिति वाच्यव्यतिरिक्तवेन स्वसंवेद नसिद्धमपी- त्यर्थः अर्थमिति विश्रानितस्थानतया परमो पादेयतारत्तणम्‌ वाच्योपस्कारकतयेत्ति वाच्यो-

(~

पस्कारकत्वं द्यरंकाराणामात्मभूतम्‌ अल्कारपक्षनिक्षिप्तमिति समग्राख्कारान्तश्रतं

~ 6 वाका

भूमिका

पुनस्तद्वथतिरिक्तमिस्यथः मन्यन्त इति तथात्वेन मन्यन्ते पुनस्तथा संमवतीव्यर्थः\ नद्यसिमननमात्रेणेव भावानामन्यथामावो सचतीति मावः एतदेव दश्ंय ति-तथादत्या- दिना! तवेस्तुमाच्रं गम्यमानं वाच्योपस्कारकस्वेन प्रतिपादितमिति संबन्धः वस्तुमात्रं पुनरलंकारा रसश्च स्वसिद्धय इति "न्ताः प्रचिज्न्तिः इत्यादौ ऊुन्तेरात्मनः अवेख- सिद्धयथ स्वसंयोगिनः पुरूषा ॐ्तिप्यन्ते तेवि ना तेषां प्रवेशासिद्धेः गङ्गायां घोषः इत्यादौ ज्ाशब्द्‌ः परत्र तटे घोषाधिकरणतासिद्धये स्वारमानस्प॑यति। स्वयं तस्य घोषा- धिकरणत्वासंमवात्‌ यथायोगमिति 1 कचिद्धि वाच्योऽर्थः स्व सिद्धये परं प्रतीयमानमथ- माक्तिपति चिच स्वयमनुपपदमानः सन्प्रतीयमान एवार्थे स्वं समपंयति तेन यच्च यादक्तत्र तादगेव योज्य मिव्यर्थः। म्र्ठति राब्दसे दण्डी आदि की ओर संकेत है। तावत्‌ = आरम्भिक--शब्द द्वारा उन सिद्धान्ता मे विप्रतिपत्ति दोना संकेतित किया गया चिरंतन = प्राचीन कहकर यह बतलाया गया कि इन आचायां ने ध्वनिकार का मत नहींदेखा दह प्रतीयमान = वाच्यसे सिन्नरूपसे सवको अनुभव मे आने वाला अथ =उसीमे तात्पयंकी विश्रान्ति रहती हे अतः वही परमो पदेय होता दे। वाच्योपस्कारक =वाच्यकी सोभा वड्ाने वाला होना ही अकारो की अट्कारता हे अरूकारपत्त निज्तिक्च = पूरे कँ पूरे को अलंकार के अन्तयंत मानना, उससे भिन्न नदीं मन्यन्ते = ठेसी उनकी मान्यता है, परन्तु टेसा होता नह्ये है अथे यह चि किसीकी धारणामात्र से किसी वस्तु का बदर जाना संमव नां वस्तुमान्र = केवर वस्तु, अल्कार ओर रस नदीं स्वसिद्धये = अपनी सिद्धि के किटि “भाक भीतर जा रहे है ऊन्ताः प्रविरदान्ति ) इत्यादि वाक्या सं भार आदि शब्द्‌ मीतर जाने रूपी क्रिया मेँ (जड होने के कारण असंभव) अपना कठैत्व सिद्ध करने के छि स्वयं का धारण करने वाके ( चेतन ) पुरुषं का आक्षेप कर छेते दे क्योकि उन ( पुरुषा ) के विना उन (मालं ) का भीतर जाना संभव नदीं ( यह इं अपनी सिद्धि के किए अपना अथे विना छोड दूसरे अर्थौ का ग्रहण ) शंगा जी पर घोषः इत्यादि उदाहरणों में ( स्थिति भिन्न हे, यह ) गंगा का अथं हे विष्ट जलप्रवाहः, वह घोष का आश्रय॒ नहीं वन सकता, अतः उस--( आश्रयता ) कौ सिद्धिकेरिएि गगा दाब्दं प्रवाहरूपी अथं को सर्व॑धां छोड़ देता दै ओर तटरूपं अथं अपना लेता है क्योकि वहुधोषका आश्रय वन सकता है। यही उसका स्वसमप॑ंण कहटाता हे यथायोगम्‌ अर्थात्‌ वाच्च अथै कदी तो दूसरे प्रतीयमान अथं का आक्षेप अपनी सिद्धि के क्एिकरता हे ओर कीं अपने आप असिद्ध रहने के कारण अपने आपका प्रतीयमान अथं को समप॑ण कर देता हे अतः वाक्य अथे कौ जहां जेसी स्थिति हो वह वैसी ही स्थिति समञ्च लेनी चाहिए विमरिनी तच्र पर्यायोक्तं यथा- अधा्तीन्नो लङ्कामयमयसुदन्वन्तसतरद्िस्यं सौमित्रेरयञ्ुपनिनायोषधिवनात्‌ इति स्मारं स्मारं सद्‌ रेवरूमोचित्रङिखितं हनूमन्तं दन्ते दश ति पितो राकखगणः ॥° अच्र राक्तसगणच्त्तान्तो . वाच्यः सन्‌ स्वसिद्धये परं कारणरूपमरिपखायनाया्तिपति ) तत्पराय नायन्तरेण राक्तसघ्रत्तान्तस्यासंगतेः अप्रस्तुतअ्ंसा यथा- श्राणा येन समर्पितास्तव बरायेन स्वञ्ुस्थापितः स्कन्धे यस्य चिरं स्थितोऽचि विदे यस्ते सप्यांसपि।

तस्यास्य स्मितमात्रकेण जनयन्प्राणापहारच्छियां श्रातः प्रत्युपकारिणां धुरि परं बेतारुलीखायसे ॥° .

< अलङ्ारसखवंस्वम्‌

अच्र वेताख्चरितमगप्रस्तुतं प्रकरणादिवदरोन स्वयसनुपपयमानं सत्‌ मस्तुते कृतध्न्रत्तान्ते स्वं समपंयति समासोक्छियंथा- दन्तन्ततानि करजेश्च विपारितानि मरोद्धिन्नसान्द्रएख्के भवतः शारीरे दत्तानि रक्तमनसा शग राजवध्वा जातस्ष्रहै म्यं निभिरमप्यव रो क्ितानि ॥? अच्र वोधिसखसे नायकव्यवहारो संभवतीति स्वसिद्धयथ नायकत्वमाक्तिपति आक्तेयो यथा- कि भणिमो जण्णद्ध कित्ति अध किंवा इमेण सणिएण। मण्णिहिसि तहवि अहवा अगामि कि जाण मनिसि अत्र वद्यमाणविषयो भणननिषेधो वाच्यः सन्‌ ववतुमेवो पक्रान्तस्य निषेधानुपपत्तेः स्वयमविश्रास्यन्‌ स्वात्मसमपंणेन स्वा प्रति सरिष्यामि अथवा च्रिये यद्वा इता याव- दहसिति विधित्रयमर्थान्तरमाक्तिपति यच्वत्रान्येः श्वाच्योऽथः स्वसिद्धयेऽर्थान्तरमात्ति- पति? इव्युक्तं तद युक्तमेव तथात्वे हि निवेध एव पयंवसितः स्यान्न निषेधाभास इस्या- स्तेपाककार एव स्यात्‌ “आ्युखावभासमानो दहि निषेधः आाक्तेपरुच्षणम्‌ 1 विधि- निषेधयोविरोधास्साभ्यसाधन भावो युक्तः व्याजस्तुतियथा- (द हिणं पदुणो पुणो पटू त्तणं कि चिरंतन पहूण गुणदोसा दोसगुणा एहि का णहु तेहि ॥' अत्र चिर्तनानां निन्दा वाच्या सतती स्वयमनुपपद्यमाना स्तृतावात्मानमपंयति। तद्रतव्वेन वस्तद्िताया निन्दाया असंभवात्‌ एवमदययतनानासपि स्त॒तिनिन्दायामा- व्मानमर्पयति। तस्था अपि विपरीततया तद्दतव्वेनासंभवात्‌ यद्पुनरत्रान्येः स्वसिद्धये पराक्तेपो उ्याख्यात्‌स्तदुपेचयमेव यतोऽत्र चिरंतनानां स्युस्याक्तेपेग निषिद्धा निन्देव प्रतीयेत, अयतनानां निन्दाक्तेपेण निविद्धा स्तुतिरेवेति वाक्याथविग्रखोप एव पयव सितः स्यादिति नंतदयक्छम्‌ कि छत्तषणायासपि स्वसिद्धये परत्तेपो युक्तः तथात्वे हि छच्तषणायाः स्वरूपहानिः स्यात्‌। वाच्यलक्ञणस्येव स्वस्य सिद्धत्वान्मुख्या्थं बाधाभावात्‌ चंकद्‌ा एकस्य वाधः सिद्धिश्चेति वक्तं युक्तम्‌ विप्रतिषिद्धं ह्येतत्‌ वाच्यस्येव यद्त्रसि- द्धिस्तदभिषेव स्यान्न रक्षणा तस्या हि भुख्याथवाध एव जीवितम्‌ न्ताः प्रविज्चन्तिः इत्यादौ ऊन्तानां स्वयं प्रवे्टमसंभवान्मुख्यार्धवाध एवेति परस्य ऊुन्तवद्र पस्य ख्चयस्यै- वाथंस्य प्राधान्यम्‌ अतश्च छक्षणायां बाधितः सन्सुख्योऽथः प्रत्र च्य एव स्वं समर्प- तीस्येव युक्तम्‌ ननु ययेवं त्पर्यायोक्तादौ वाच्यलिध्यथ परस्य रच्यस्याक्तेपः प्रतीयत इति तत्र कि प्रतिपत्तव्यम्‌ इदं प्रतिपत्तन्यसमर--अनच्र हि लक्षणाया एव॒ नाव. काडाः तत्र हि कथमहं स्यासिति वाच्यं सत्‌ काय तद्‌विनाभावात्परं कारणमाक्तिपती- स्याक्तेपेणेव सिद्धेस्तस्या अनुपयोगः। "गौरयुबन्ध्यः' इत्यत्र यथा कथं मे श्रुतिचोदितम- चुवन्धन स्यादिति जत्या व्य व्द्यवि नाभावाद्वयक्तिराज्ञिप्यते न॒ ङच्यते तथवाच्रापि कार्यकारणयोर्घंयम्‌ एवं समासोक्तावपि नायकच्यवदारस्तद वि नाभाविस्वादेव नायक- स्वमाक्तिपतीत्यत्रापि लन्तणामूख्त्वं नाशङ्कनीयम्‌ मन्थता पुनरेतचिरंतनमतानुबादपर- तयोक्तम्‌ अस्माभिस्तु प्रसङ्गद्रस्तु पयांखो चितमिव्यर बहुना पयायाक्त्यल्कार्‌ जसे [ कोड्‌ कवि अपने आश्रयदाता का स्वुतिम कह रहाहे कि “हे देव ] इसने हमारी ल्काकोजला डाला, इसने समुद्रकोभी पार कर ख्या, इसने ओपधिके वनमेंसे विद्चल्या नामक ओषधि लक्ष्मण के किए टा पहचाई--ण्सा स्मरण कर करके कुपित हर राक्षस खग आपके राजओं कौ वलमी ( चन्द्रशाला ) मँ चित्रङिखित हनूमान्‌ को दतां से डंसने र्गते है 1

6 |

हि कक 9 = वा + ०9 रा >

भूमिका २,

यह अभिधावृत्ति से तो कथित हे राक्षसो का व्यवहार, पर वह व्यंजना से प्रतीत “राजा के राद्खओं का मागना आदि” अथं के विना समव नहीं हे, अतः वह ( वाच्य राक्षस वृत्तान्त ) उस ( प्रतीय- मान खद्धपलायन आदि ) का आक्षेप करल्ेतादहे। उस प्रतीयमान ) का आक्षेप इसर्िए संभव भी दे किं वह उस ( वाच्य )का कारण हे ( अथात्‌ स्तूयमान राजा के शद्धुराजाओं के भवनों में राक्षसो क, रहना जर चित्ररिखत हनूमान्‌ जी कोद।तांसे डंसना तब संभव दैजव वे राजा भवन छोड़ कर भाग गए ह्‌। ) विना राजाओं के भागे राक्षसो का चिचित हनुमान्‌ को उंसना आदि व्यापार संभव नहं

अप्रस्तुत प्रसा ज॑ से--““हे भाई वेता [ जगाया हुआ शाव ] केवल तुम्हीं प्रत्युपकारी व्यक्तियों वरिष्ठ हो, क्योकि तुमने उस व्यक्तिको भी केवल मुसकुरादट भर मे निष्प्राण कर दिया जिसने अपने उदोग से तुम्हारे भीतर बलात्‌ प्राण डले, [ सृत पड़े ] तुम्हे [ जगाकार ] खडा किया, जिसके कन्थे पर भी ठुम काफी समय तक चदे रहे ओर कैव इतना ही, जिसने तम्दारी पूजा मी कौ ।'' यह वेताल का चरित [ किसी भी व्यक्तिद्वारा वेतारु को रेसा उपालन्भ देना] अपने आपमें अनुपपन्न हे, फलतः वह॒ किसी कृतघ्न कै वृत्तान्त के रूप में पय॑वसित हो जाता है ओर प्रतीतदहोतादहे कि वक्ता का लक्ष्य कोड कृतघ्न व्यक्ति है।

[ अप्रस्तुत प्रदोसा मे अभिधा दारा अप्रस्तुत ओर प्रस्तुत व्यजना दारा प्रतिपादित होता है। यदह कृतव्न प्रस्तुत या वण्ये है किन्तु शब्दों दारा वर्णन किया जा रहा है तत्सदृश वेताल का अतः यद्‌ साटरद्यमूल्क अमप्रस्तुतप्रदोसा है

वेतार्‌ को उपालम्भ देना इसलिए अव्यवहार्य है किं वेताल उपालम्भकतां को भी चट कर सकता हे ] |

“रक्तचित्त ( सिही = खून कौ इच्छा, नायिका = अनुरागयुक्त . चित्त से) सिहिनी ने दे बोधिसत्व ) पयांप्तमात्रा ओर सघनता के साथ उभरे पुलक से युक्त आपके शसीर मे जो दन्तक्षत आर नखक्षत किए हे उन्हं निःस्पृह सुनिय। ने भी सस्पृह होकर देखा ।› इस पच मे दो व्यवहार प्रतीत हो रहे हं एकं नायिका द्वारा अनुरक्तचित्त से नायक के साच्िकभाव रोमांचादि से युक्त रारीर मं दन्तनखक्षत कौ प्रणयरीला ओर दूसरा-रक्तपनेच्छु सिद्यद्वारा वोधिसच् के वेदना से रोमांचित दारीर पर दोत तथा नखों से धाव करना इनमे से जो नायिका नायकं व्यवहार है वह ( वीतराग ) बोधिसत्व मे संभव नदीं अतः उसका आक्षेप करना पडता हे

[ समासोक्ति के विषय मं सामान्य मत यह है कि उसमे वाच्यार्थं के अनुपपन्न हए विना व्यंग्यार्थं की प्रतीति होती हे। यहां यह नवीन तथ्य स्वीकार किया जा रहा है कि “वाच्यां की अनुपपत्ति कै कारण व्यग्याथे कौ प्रतीति हो रहौ हे!" जो वोधिसक् है उसमे रत्ति के साच्िक अनुभाव रोमांच अदि सचसुच संभव नहीं अतः उसमे नायकत्व का आक्षेप विवदा होकर करना है ]

आक्षेप जेे-“किं मणामो मण्यते कियदिवाथ किं वानेन भणितेन 1

भणिष्यते तथाप्यथवा भणासि किंवा भणितोऽसि

क्या कहा भी कितना जाय ? कहने से भीलाम क्या? तवी कहा तो जाएगा हो तव भी अन्ततः कर्हूगी क्या, ओर [ तुमसे] कुछ कहा नहो गया है क्या १। यद्य उपस वक्तव्य के कथन का निषेध अभिधादारा बतलाया जा रहादै जो अभी कहा जाने वाला, कट। गया नह्‌। परन्तु यह एक असभव वात हे किं जिसका अस्तित्व ही नहीं उसका अभाव वतलाया जाए अतः यह्‌ निषेध संभव नहीं होता, फरतः वह॒ अपने आपको-तुम्हारे चिणि मर जाऊ्गी, मर रही हू अथवा यह्‌ मरी-इन तीन प्रकार के विध्यर्थो कै रूपमे ढाङ्कर इन अर्थौ

१० अच्छङ्ारखवंस्वम्‌

का आक्षेप करता है अन्य [ आचाये | का यह कहना अमान्य हे कि यहाँ [ निषेधरूपी ] वाच्य अथं अपनी सिद्धि के किटि दूसरे अथं का आक्षेप करता दैः, क्योकि रेसा मानने पर वाच्याधरूप निवेध ही प्रधान रहता ड, उसका आमास नदीं फर्तः आक्षेप अलरुकारता को ही प्राप्त नहीं होता, क्योकि आक्षिपाक्कारका क्षण दै-आरम्भम मात्र में भासित होने वाला निधेध ( सवं० ) ।› विधि ओर निषेध परस्पर विरोधी होते हैँ अतः यह समव नदीं है किं इनं परस्पर

साध्यसाधनभाव हो

| विम्दिनीकार का यह मत यँ अमान्य है कि विधिनिषेध मेँ साध्यसाधनभाव नदीं दोता श्रम वासक.” आदि उदाहरणा मँ विधि से निषेध ओर “गतासि पुनस्तस्याधमस्यान्तिके'ः

आदि उदाहरणा में निषेधसे विधिका ज्ञान साहित्यं वहत॒ चाचत हदं जहो साध्यसाधनभाव लाप्वन्चापकमवरूप होता हे वहाँ पिधिनिषेध का परस्पर विरोध उसका विरोधी नदीं दोता ] याजस्वुति जंसे--“अध्रुना प्रभवः प्रभवः प्रयुत्वं किं चिरतनगप्रभूणाम्‌ गुणदोषा दोषयुणा एभिः क्रेता खटः क्रृतास्तेः °" “आजकेजो प्रमुहे वे ही वस्तुतः प्रभु कहने योग्य हेः प्राचीन प्रयुजां में प्रभुत्व कादेका। युणाको दोप ओर दोर्पोको युणये ( नवीन प्रभु) ही जो वना रके है, प्राचीन नहीं। यदा प्राचीनो कौ निन्दा अभिधा से कथित है चिन्तु वह अपने आपमे अनुपपन्नदहै ओर सतुत्निं के रूप में वदरू जाती है क्योकि प्राचीनां मे यणो को दोष ओर दोपांको गुणन करने की ` जो वात कदी गहं उसे उनकी निन्दा निन्दा नदीं रह पाती इसी प्रकार आधुनिक या नवीनं कौ अभिधा से कथित स्तुति निन्दा के रूपमेँ परिणत दयो जाती है च्यक युणोँको दोप ओर दोषौ कौ युण सिद्ध करने वात स्तुति के विपरीत हे। यद अमिधेयाथं का बदलना ओर अपनी सिद्धिकेङ्टि दूसरे अर्थं को अपनामर लेना जिन्दं मान्य है वे [ अल्काररत्नाकरकार आदि | उपेक्षणीय क्योकि वैसा मानने पर चिरतन। कै प्रति स्तुति से आक्षिप्त निन्दादी प्रतीत होती ओर नवीनो के मरत्ति निन्दा से आक्षिप्त स्तृत्ि दी ओर ेसा हने पर काव्यवाक्य का ताः ए्पयभूत अथ ( प्राचीन) की स्त॒ति ओर नवीनां की निन्दा ) निष्पन्न नदीं होता अतः “स्वसिद्धये रक्षुपः गत अह। जमान्य हा एक यह भीं आपत्ति हं किं यहा लक्षणा दारा स्वसिद्धिके लिटि दृसरेका आक्षेप होता हं क्योकि वेसा मानने पर लक्षणा कौ नदीं वनती क्योकि वाच्यार्थं कै वाच्या रूपं मह्‌ वने रहने से उस्रं कोडं आपत्ति नदीं उठती जिससे लक्षणा हौ ( अथात्‌ नवीनो की स्तुति अर्‌ अआचान। कौ निन्दा मं कोदं आपत्तिन होने पर उन्हें वदल्ने ओर तद्धिपरोताथं का आक्षेप करन का प्रन हा नर्हा उठ सकेगा ।) यहु मी नहीं कहा जा सकता कि वाच्य की सिद्धि होती अन्तमं आर वाध होता हं आरम्भ में जतः वाध मी असंमव नहीं फलतः लक्षणा होनाभी संभव द” क्याकिं यहु मानना परस्पर विरुद्ध हे क्योंकि यदि अन्ततोगत्वा वाच्यकी ही सिद्धिकरनी तो उसका वाध आरम्भमें उवेक्षणीय ही होगा ओर तव अभिधा दही वाच्यम मानी जाएगी ङ्गा नहा जह तक लक्षणा का सम्बन्ध है उसका वीज वाध ही है। “माङ मीतर जतत ह"? आद्‌ वक्त्वा म॑ ( अचेतन ) मले आदि का भीतर जाना संभव नहीं यतः मुख्य या अर भधेय अर्थ वातत रहता हे मौर “भालेवले युरूष--रूपी अथं रष्य ओर प्रधान रहता है इसछिण ( व्याजस्छति कौ ) लक्षणा में सख्य अथं वाधित होकर अपने से भिन्न लक्षय अथ सँ अपने आपको सखा देता हं यही मानना उचित है

दन उठता हं यदि ( व्याजस्तुति में) ेसा है तो पयांयोक्त आदिमे भी जहो वाच्याथकी

सदधि कै लिए उससे भिन्न लक्ष्य अथं का आक्षप होता इया ब्रतात होता 2 वहा क्या मानना गगा यह मानना दोगा = पर्यायोक्त मे लक्षणा का कोदं अवसर नदीं है। क्योकि वहा वाच्य ओर

[ज

| भूमिका ९९

व्यंग्य मेँ कायंकारणभाव रहता हे अतः वाच्य “भँ वैसे निष्पन्न हो" देसा सोचकर अपने कारण व्यंग्य का आक्षेप या अनुमान कर लेता दहे ओर उसी से उस वाच्य ) की निष्पत्ति हो जाती ह, फलतः ( यह पयायोक्त मं ) रक्षणा का कोई उपयोग ही नहो रहता। जैसे «वैर का अनुबन्धन किया जायः' इस ति वाक्य मे ( गोत्व जातिस्वरूप ) अर्थ का वाचकं वैर राब्द जातिरूप अपने अथं का अनुवन्धन सभव हो इसकिए उससे नित्य सम्बद्ध व्यक्तरूप ( रारीररूप ) अथं का आक्षेप कर लेता हे वैसे ही यद्य ( पर्यायोक्त के ) कायंकारणमाव रूपी संवन्ध मँ भी संभव जानना चाहिए सौ प्रकार समासोक्ति भी नायक का व्यवहार नायवं से कदापि अल्गन होने वाले नायकेत्व का आक्षेप कर ठेता है, अतः वहम भी लक्षणा से वह अथं प्रतीत होता दै" ेसी राका नदीं की जा सकता अन्धकार ने ( स्वसिद्धये पराक्षेप ) यदह वात प्राचीन के मत का अनुवाद करने के किष काह दी ओर हमने भी अवसर पाकर उसका आवदयक पर्याखोचन कर दिया, अत्तः अधिक विस्तार आवरयक नहीं अन्धकार ने प्यायोक्तादि मे वस्तुध्वनि को वाच्य का उपस्कारक वतलाकर अन्त मे “स्वसिद्ये पराक्षेपः मौर “परार्थं स्वसम्षणम्‌"ये दो सूत्र दे दिएदहैजो क्रमशः उपादान लक्षणा ओर लक्षणलक्षणा के लक्षण वतलाए गद इससे सामान्यतः यह धारणा बनती है किं मन्थकार पर्यायोक्त आदिं समी अलका मे लक्षणा मानते है परन्तु वस्तुतः वात एसी नहीं हं यन्धकार ने वे सूनर केवर प्राचीन मत प्रस्तुत करने के छिद दे दिए है उन समी अरुकासो मे रक्षणा मान्य नहीं ह्‌

| एसा जगता हे कि “स्वसिद्धये० इत्यादि वाक्य प्राचीन आरुकारिकों मे रक्षणारक्षण यो रूप मं प्रचलित नहीं थे। केवल मम्मट्ने काव्यप्रकादासे इन्द लक्षणालक्षणके स्पमें दे दियाहं। मूर ग्रन्थ ओर दीका दोनो के रचयिता मम्भट कं वाद हए हे अतः यहां लक्षणा का विवेचन प्रस्तुत करना आवद्यक धा | व्याजस्तुति से भी टीकाकार के अनुसार अन्धकार को लक्षणा मन्व नदा सूत्र अल्कारो मे लक्षणा कौ सी प्त्रिया प्रतीत होती है जतः लक्षणा का भ्रम नहीं होना चाहिए इन अलंकारो मै अन्यः शाब्द से जिस आचाय का खण्डन किया गवा है वे कदाचित्‌ अल्काररत्नाकरकार ्ोभाकारभित्र है उदघृत अल्कारौ के अगि रहे प्रकरण मे उनके मत देख जा सकते |

८1. विमरिनी उपमेयोपमा यथा-- |

रजोभिः स्यन्द नोदुतेगंजेश्च वनसंनि्ैः शुवस्तरूमिव व्योम कुर्बज्ब्योमेव अूतखम्‌ ॥' अत्र द्वयोः परस्परञ्पमानो पमेयव्वं वाच्यं सत्‌ स्वयमनुपपद्यमानसुपमानान्तरविरह-

रक्तणे परत्र वस्स्वन्तरे स्वं समपंयति अनन्वयो यथा--

भवानिव भवानेव भवेद्‌ यदि परं मघ स्वशक्तिग्यूहसंग्यूढत्रैरोक्यारम्भसंहतिः ॥' अब्रेकस्यैवोपसानोपमेयभावो वाच्यः सन्द्ितीयसबद्यचार्यभावे परत्र वस्त्वन्तरे स्वं

समपंयति 1 आदिशब्दः प्रकारे तेनानिष्टविध्याभासाक्ेपादेर्रहणम्‌ यथा--

भवत विदितं व्यर्थारपिररं प्रिय गम्यतां तनुरपि से दौषोऽस्माकं विधिस्तु पराङ्खुखः

तव अदि तथा रूढ प्रेम प्रपन्नमिमां दशां म्रकृतितरङे का नो बीडा गते इतजी विते ॥' अन्न कान्तम्रस्थानविधिवाच्यः सन्निषेद्धमेवो पक्रान्तस्य दिधानानुपपत्तेः स्वयम-

विश्रान्तः स्वसमर्पणेन निपेधमाक्तिपति एवं द्विविधया भङ्गया गम्यमानं वस्तुमान

वाच्यो पस्कारकमेवेस्युक्तस्‌ | | एवमपि प्रतीयमानस्यार्थस्य विविक्तविषयान्तरोपारभ्मादलंकारान्त्भावो सिध्य-

तीस्याशद्धयाह--रद्रटेने त्यादि द्विधेति गुणीभूतागुणीभूतवस्त विषयस्वैनेस्यथः। यदाह--

९२ अल्ङ्ारसवेस्वम्‌

'्यस्य विकारः प्रभवन्नप्रतिवद्धेन देतुना येन गमयति तदभिप्रायं तस्प्रतिवन्धं भावोऽसौ गामतरूण तरण्या नव वज्रुमञ्जरीसनाथकरस्न्‌ पश्यन्त्या भवति सुद्धनितरां मछिना सखच्छाया अभिघेयमसिदघान तदेव तदखदकागुणदौषम््‌ अर्थान्तरमवगसयति यद्राक्य सोऽपरो मावः

एकाकिनी यदबला तद्गी तथाहमस्मद्‌ गृहे ग्रह पतिः गतो विदेशम्‌

कं याचसे तदिह वाख्मियं वराकी श्वश्रसंमान्धवधिरा नु रूढ पान्थ ॥' इति

यद्वा द्विधेति पूववदेव लक्षणाद्याश्रयेण व्याख्येयसर्‌ तेनाये स्वसिद्धये पराक्तेपः, परत्र अपराथं स्वससमपणम्‌ 1 यच्चच्रान्यं भावं निवदादिभिस्परल्तितो वाच्यप्रतीयमान- स्वेन द्विविधा भावारूकारो व्याख्यातस्तदुर्सूत्रमेव सद्रटेन तथास्वेन तस्याग्रतिपाद्‌ नात्‌ तन्नापि वस्त॒मात्रस्य वाच्योपस्कारकस्वाभिधानसमये वक्तुस्ुचितस्वात्‌ तदेवं गुणीभू- ताराणीभूतस्वेन द्विप्रकारं वस्तु तावद्वाच्योपस्कारकव्वेन प्रतिपादितस्न्‌ 1

उपमेयोपमा से--“रथों से उडाई धृ ओर भैधोपम हाथिर्यो से भूतल को आकादा अर आकडा को मूतर सा वनता हुमा ( रघु दिगिजय के लिए चला)” यरद दोना (भूतल ओर कादा) कौ एक दूसरे के साथकौी गड उपमा अभिधावृत्ति से प्रतिपादित दहं किन्तु यह अपने आपे चमत्वारकारक नहीं वन पाती फलतः तीसरे किसी अन्य उपमान कै अभाव या निपेधं- रूपी अर्थं मे अपना समर्पण कर देती हं)

[ उपमेयोपमा मे चमत्कार माना जाता हे तृतीयसद् चव्यवच्छेद्‌ अथात्‌ किसी तृतीय समान वस्तु के निराकरणमें प्रस्तुत पमे भूतल अ।र्‌ आकादा की करस्पर उपमा अपने आपमं नहीं बनती रेसी वात नदीं है केवर परस्परोपमा में कोद चमत्कार नहीं है, चमत्कार तृतीयसदृदाव्य- वच्छेद्‌ मेँ है अतः हमने अनुपपद्यमान का अथं ““अचमत्कारकः" किया हे |

अनन्वय जसे = हे भगवन्‌ ) अपनी दाक्तिके व्यृहसे तीनों रोक) का निमांण ओर संहार का चक्र चलाने वाले आप यदि किसी के समान हो सकते डं तो केवर आपके ही समान 1 यँ एक ही पदार्थं का उपमेय ओर उपमान हौना वाच्य दे किन्तु वह पय॑वसितदौतादै किसी दूसरे समान पदाथ के अमावमें।

[ अनन्वय मेँ चमत्कार का कारण किसी द्वितीय अन्य पदाथ के अभावकी प्रतीति उपमानोपमेयभावरूपी अन्वय ८( संवन्ध ) का ( उपमान ओर उपमेय दोन एक ही पदाथ वेः रहने से ) निष्यन्न होना ( अनन्वय) इत प्रतीति को जन्म देता है। यदहो भौ वाच्यार्थं कै व्युग्या्थं द्वितीयसदु व्यवच्छेद ) मे पर्यवसित होने का अथं चमत्कार के लिए उसका जक्षेप करना |

आदि दाबव्द्‌ का अथं है प्रक्र उसे अनिष्ट विध्याभासरात्मकः [ ह्वितीय ] आक्षेप आदि लिए जा सकते हे यथा--ध्टो जाय तो हो जाय विदितः दे परिय, व्यथं कौ वकवास छोडो ओर जाओ, इसमे आपका जरा मी दोप नहीं, विधातातो हमारा हीन पराहमुखदहं। यदि तुम्हारा प्ररूढ प्रस इसदद्याको प्राप्तो गयादै तो अच्छादे, यदि हमारेये स्वभाव से चच ( अस्थिर ) दुष्ट प्राण निकट मी जाएतो काज क्या 1

यहो अनचाही “प्रियगमन"-रूपरी वस्त॒ का विधान “जामो” इस प्रकार किया गयादहै जौ चस्त॒तः आभासात्मक ही हे, पारमायथिक नदो; अतः वहु निषेध्य का विधान संमवन होनेके कारण.

भ्रूमिका १२

अपने आपे उखडा हज सा ल्गतादहे, ओर इसकिए अपना पर्य॑वसान निषेध मे कर उसका आक्षेप कराता हे इस प्रकार दोनो हयी प्रकार से गम्यमान वस्तु वाच्य कै प्रति उपरकारकं दही होती ठे रेसा कदा

"देस मानने पर प्रतीयमान अथं के लिए अल्कारवाले स्थलों से भिन्न स्वतन्त्र स्थर भी मिल जाते है, अतः उसका अलंकार मे अन्तर्भाव सिड नहीं होता-- रेसी राका कर उत्तर देते दै- रुद्रटेन इत्यादि

द्विधा = दो प्रकारका, एक वह जिसमें वस्तु अप्रधान [ गुणीभूत ] रहती है ओर दूसरा वह जिसमें वह्‌ प्रधान रहती हे जेसा कि [ रुद्रट नै काव्यालकार ५।३८ में -] कहा दै - “किसी व्यक्ति में कोड विकार [ भाव या चित्तवृत्तिरूप कायं ] किसी रेस कारण से उत्पन्न हो जिसके साथ उस [ कार्य ] का [ कायंकारणमावरूप ] संबन्ध निश्चित हो [ अतः जो कारण, काये के साथ अप्रतिवड्‌ या अनैकान्तिक हो ], फिर वह विकार एक ओर उससे युक्त व्यक्ति का कोई अभिप्राय व्यक्त करे ओर दूसरी ओर अपने कारण के साथ अपना [ कायेकारणभाव | संबन्ध निश्चित करदे तो एक प्रकार का भावालकार होता है उदाहरणाथ--“तरुणी जब अामतरुण [ गोव के सवसे सन्दर ओर अपने प्रेमी युवक ] को मोल्सिरीकी ताजी मंजरी हाथमे लिए देखतीदहै तो उसकी उसकी मुखकान्ति अत्यन्त मलिन हो जाती हे ।'

[ दूसरा भावारुंकार ] कोई वाक्य अपने राब्दों का अभिधेयाथं वतरने कै पश्चात्‌ अभिधेय से भिन्न प्रकारका दूसरा अथे [ अथात्‌ अभिधेय यदि पिधिरूपदहो तो निषेधादिरूप | व्यक्त करता है तो वह भी भावाल्कार माना जाता हे। उदाहरणाथै-[कोडं प्रोषितपतिका द्वारा- गत निवासार्थी तरुण पथिक से कह रही] सरमे मै अकेखी ओौर अवलाहूु। इस धरका जो स्वामीहै व्ह परदेश गयादहै। यह जो मेस सासदहै उसे भीन ओंखो से सद्चता ओर कानां से सुनाता इसलिए हे पान्थ तुम वास कौ याचना कर दही क्यो रहेहो। तम सचमुच मौके ओर नासमञ्च हो ।'

अथवा ( रुद्रट ने भावालंकार दो प्रकार का माना है-इस वाक्यमे) दो प्रकारका अथं उपादानलक्षणा ओर लक्षणलक्षणा नामक स्वसिद्धये° इस प्रकार ) पूवेचचित दो रक्षणाओं के आधार पर दो प्रकार का किया जाना चाहिए इससे प्रथम उदाहरण मे स्वसिद्धिके खिएि पराक्षेप उपादान लक्षणा ) मानना होगा ओर दूसरे उदादरण मे (पराथं स्वसमपैण ( रक्षणलक्षणा ) 1

कुछ लोगो ने भावाल्कार मे भावद्यब्द का अर्थं निववेदादि कियादहै ओर दो दों में एक वाच्य को निवदादि संचारी भावों से उपलक्षित मानादहे ओर दूसरेमे प्रतीयमान को। किन्त व्याख्या मूकविरुद्ध दै, क्याकि स्वयं रुद्रट ने भावाककार का प्रतिपादन इस प्रकार से नहीं किया रुद्रट यदि ठेसा प्रतिपादन करना भी चाहते तो उन्हे इसे वरहो प्रतिपादित करना चाहिए था जहां उरन्होनि केवल वस्तु का वाच्य के प्रति उपस्कारकत्व प्रतिपादित किया था। इसङ्िए वस्तुतः भावाल्कारमें देविध्य का मानदण्ड व्यङ्ग्य की गुणीभूतता तथ प्रधानता ही मानौ जानी चाहिए इन दोनों भेदौ मे अप्रधान ओर प्रधान दो प्रकार की वस्तु व्यभ्य होकर भी वाच्य का सौन्दयं वधन करती हई वतलाई गईं है `

विमर्छ-यहों भावारूकार के प्रथम उदाहरण मे नायिका मे मुखमालिन्यरूपी चिकार उत्पन्न हआ उसका कारण है मोलसिरी कौ मंजरी को देखना उस देखने के साथ उस माछिन्य का कोई निश्चित कायकारणभावरूपी सम्बन्ध नहींहै, क्योकिउस मंजरीको देखने से सदा हयी मुख- मािन्य नदीं होता यह सुखमाछिन्य नायिका का भाव व्यक्त कर देता है। यह बतला देता है कि निशित ही नायिका ने तरुण को मोलसिरी के वगीचे में मिर्ने बुलाया था किन्तु अन्य कायै में

२३ अटङ्ारसवेस्वम्‌

खग जने ते यह स्वय वहां नदीं पर्टुच सकी किन्तु मोलिसिरी की नवीन मजरो हाधनं लख्कर्‌ आनेसे तरुण के विषय में उसे यद विदित दहो गया किं वह्‌ माल्सिरीके वगाचेजाकर आरा हे फलतः नायिका को यह सोचकर दुःख हआ कि “में यख से वचित रह गडः: एेसा भाव मन मं आते दी जो मुखमालिन्यं हआ उसका ओर मंजरीददोन का कायकारणभाव मी निश्चित गया क्योकि यद्धि वह॒ सजरीनदहदोती तो कदाचित्‌ नायिका का तर्णके सोलसिरी उपवन जानं का निश्चय होता यहां वाच्य अय व्यग्याधे कौ अपेक्षा अधिक चमत्कारी अतः काव्यप्रकार- कार ने इसे युणीभूत वाङ्मय या मध्यमकाव्य का उदाहरण मानादे

द्वितीय पद्य मं वास की याचना क्यों करते होः इस प्रकार के प्रदनकाकु से वतलाया जा रहा हे किं “याचना नहीं करनी चाहिए? परन्तु पूरे वक्तव्य मे स्थिति ठेसी वतठद्जा रहीदहेकि पान्थ को वासर करने कै ङिए याचना मी अन(वदयक दै, उेतो सिथितिं समञ्चकर विना पृषे ठहर

जाना चाहिए यह वाच्य ओर व्यंग्य का भिन्न प्रकार कादहौना। इसीलिए यह भावाल्कार

टे, क्योकि व्यग्याथं नायिका के हृदय का माव दहे यौ निषेधरूपी वाच्यार्थंसे जो विधानरूपी व्यग्यार्थं निकलता वही अधिक चमत्कवारकारी हो तो इस कान्य को उन्तम काव्य माना जा सकता हे ! विमददिनीकारने माना भीदै। हमं यर्दा व्यग्या्थगत वेचिच्य की अवेक्षा उक्तिवेचित्य मं अधिक चमत्कार प्रतीत होता हे अतः वस्तुतः वह्‌ उदाहरणम गुणीभूत व्यंग्यका ही उदाहरण दोना चाहिए पिमर्रनौकारका मन्तव्य केवल इतना ही हे कि प्रथम उदाहरण गुणीभूतव्यंम्य कै उदाहरण के रूपमे कान्यप्रकाद्र आदिमं प्रसिद्ध दहं द्वितीय उदाहरण का उससे अन्तर करने वे लिए उप्ते ध्वनिकाव्य का उदाहरण मानना चाहिए यदि “एकाकिनी” यहु उदाहरण ध्वनिकाव्य नमी निददहो तो कोदं दूसरा उदाहरण अपना लेना चाददिए। स्वधा विमरिनीकार का कृहना है अल्कार सवेस्वकार के मत में रद्रट गुणीमूतव्यंग्य ओर ध्वनि दोनो को भावाल्कार रूप मानते हें ।. विमद्धिनी

इद्‌ानीमलंकारस्यापि प्रतीयमानस्य वाच्यो पस्कारकस्वं ग्रतिपादयति--रूपकेत्यादिना तत्र पक यथा- सीमश्रङुरिपन्नगीष्ठणसणिः कायस्य चण्डं चिता- छुण्डं ऊण्डलिवेन्दनाख्वट्यपत्रञ्रंहि रक्तोतपटस्‌ घ्राणस्फारिकमल्लिकापरिचिते मालायश्ाटानिरे | दग्रा दीपशिखा हिवस्य नयनं कार्छानवं पातु नः ॥' अत्र नयनादीनां मणिग्रष्ठतीनां चोपमा वाच्योपस्कारायावगम्यते। तां विना सादश्या- ग्र्तिपत्तः [ अमी प्रतीयमान वस्तु कौ वाच्यौपस्कारकता वततलादं ] अव प्रतीयमान अल्कार कीमीं वाच्योपस्कारकता वतलाते हए कदते हँ -- “रूपक इसमे रूपक का उदाहरण नेसे -“ भगवान्‌ शिव का तृतीय आग्नेयनेव्रहम सवकी रक्षा करे जो श्रु्टिरूपी भयंकर नागिन की फणमणि है, काम का प्रचण्ड चिताकरुण्ड दे, चन्द्ररूपी [ कमर ] नाठनिमित गोल वख्य मेँ गिरा हुमा ङाख्कमङ पुष्प देः [ या | नासिकारूपी दीयट से युक्त लाटरूपी गन नँ चमकती दीपरिखा है ययौ नेत्रादि ओर मणि आदि की उपमा ्यजनासे प्रतीत होती दै ओौर उससे वाच्य (रूपक) का उपस्कार होता हृजा विदित होता हे वर्योवि ( रूपक साद्रद्यमूल्क अल्कार है ओर ) साष्ट का ज्ञान उस ( उपमा ,) के बिना संभव नदीं. ~: 44;

भूमिका १५ विमश्च- यहाँ उपमा तो व्यक्त होती हे विन्तु वह उवमामाव्र है। अल्कार नहीं वह अलकार तव होती जव उसमे चमत्कार होता। चमत्कार यदौ रूपकमेंदही है अतः वही यौ अलक हें विम द्िनौकार यह जौ उपमाक्कार को वाच्योपस्कारक बतलाना चाहते है उसके पीछे नाह्यणश्चमण- न्याय छपरा मानना चा।ईट ब्राह्मग जव तक शिखासूत्रादि से युक्त बाद्यण था जव तक वह शिखा- सूत्रादि विहीन श्रमण (जन या बोद्ध भिक्षु) नहो धा ओर जव िखासूत्रादि को तोडताड़कर वह श्रमण वन गया तव वह्‌ ब्राह्मण नहा रहता, इतने पर भी क्योकि वह पहले ब्राह्मण था इसरिए धमण वने अन्य अब्राह्मण व्यक्तिय। से उसका अन्तर वतरने के लिए उसे (व्राह्यणश्नरमणः कह दिया जाता हे टाक इसी प्रकार उपमा रूपक आदि जव व्यग्य होतेह तव अलंकार नदीं रहते क्योकि उनसे किसी अन्य को ोभा नदीं वदती फलर्तः वे अलकां हौ जाते हैः ओर जव अलंकार रहते तव व्यग्य नहीं रहते, तथापि वाच्यावस्था मं उपमादि अल्कार रहते हे तत्सट्दा कोड उपमादि व्यग्य हो जाती हं तो व्यंग्योपमादि कोभी अल्कार रहने पर भी अ्टकारभूत वाच्योपमादि कौ नई उपमाल्कारादि कह दिया जाता हे रुद्रट ने उससे वाच्य का उपस्कार मानां विमरिनीं दीपकं यथा- पाउअवंध पटिङं वधेउ हअ ऊुजनङकसुमाईइ पोडमहिरं रसिउं विररचिअ के वि जाणन्ति॥

अत्र प्राक्कतवन्धपाटादेरपसमा वाच्यो पस्कारायावगस्यते म्रक्रतस्य मोडमहिलारमणादे

सादश्यो पादानायवोभयोरूपनिवन्धनात्‌ जपहति्यथा- अवाप्तः प्रागलभ्यं परिणतरूचः शेरूतनये करटको नेवायं विलसति शशाङ्कस्य वपुषि अमुष्येयं मन्ये विगख्दश्छतस्यन्द शिशिरे रतिश्रान्ता रेते रजनिरमणी गाढञ्ुरसिः अन्न कलङ्कस्य रजनिसादश्यग्रतीतेरपमा वबाच्योपस्कारायावगम्यतं एव तुर्य- योगिता यथा-

देगुणितादुपधानमुजाच्छिरः पुरुकितादुरसः स्तनमणग्डङस््‌ अधरमधंसमर्पिंतमाननाद्‌ व्यघटयन्त कथंचन योषितः अच्र॒ अजादीनां सादश्यावगमादुपमा वाच्योपस्कारायावगस्यते तुस्ययो गिता- दाविव्यादिशाब्दान्निदशंनादेमहणमसर। उपमादीव्यादिश्ञब्दादुपसेयोपमादी नाम्‌ तत्त यथा-- ग्रवातनीरोत्पखनिविंशेषमधीर विप्रक्तितमायताच्या तया गहीतं चु खगाङ्गनाभ्यस्ततो गहीतं चु खगाङ्गनासिः अच्र वाच्याया निदशनाया उपस्कारस्वेनोपमेयोपसा गम्यते तासन्तरेणासंभवद्वस्तु- संबन्धस्वेन वाच्यस्याविश्रान्तेः अतश्चान्नालंकारो गम्यमानः स्थितो वस्तुमात्रम्‌ तेन पूवन्न यदादिग्रहणं सखफरयिदुमन्यरेतदु दातं तदयुक्तमेव तत्र॒ वस्तुमाच्चस्य

वाच्यो पर्कारकस्वेन प्रतिपिपाद्‌ यि षितव्वात्‌। वाच्यो पर्कारकत्वेनोरप्र्ता कथितेति समन्वयः। सा तु-

9

महिलासहस्सभरिए तुय हिअए सुहअ सा असमायन्ती दिअहं अणण्णञम्मा अङ्गं तणुं पि तणुएइ ॥* इति

तदित्थमरंकारोऽपि प्रतीयमानो वाच्यशोभाेतसवेनोक्तः दीपक यथा =

म्राक्रतवन्धं पठतु बदघुं तथां कुब्जकुसुमानि मोढमदहिखां रन्तुं विरला एव केऽपि जानन्ति ॥?

“प्राक्त वन्ध पढ़ना, कुब्ज (१) कुसुमो को गूधना तथा प्रोढमदिलाओं को भोगना विरले डी कोड जानते हं ।” यां मी मराकृतवन्य आदि की उपमा प्रतीत होती है ओर उसे वाक्य का

कक यो, 73

९६ अलङ्ारसवंस्वम्‌

उपस्वारक होता है. क्योकि इस वाक्य मे वणनौयत्वेन प्रकेत हे प्रौटमदिला उसके अतिरिक्त प्राक्रतवन्धादि अप्रस्तुत पदार्थौ का जो उपादान किया गया दहै वह श्रोटमददिला' के साथ उनका साद्द्य वतलाने के छिए 1

[ दीपक मेँ प्रक्रत ओर अप्रक्र्ता का किसी एक धमंया किसी एक क्रिया में संवन्ध दिखलाय्‌ जाता है जिससे सदृद्य व्यक्त होता दे |

अपहुति जेसे-[ भगवान्‌ दिव पावंतीजी से कह रहे हें ] “हे पावती ! पर्याप्त मत्रामे खिलो कान्ति के इस चन्द्रमाके दारीरमे [ पिताकीगोद मं चिद्युके समान] प्रगल्भतावे साथ यह जोट सो कलंक विसित नहीं हो रहा हे, अपितु में समञ्तारहकि इसके रती अम्रतधारामे अत्यन्त दीतल वक्षःस्थल पर इसकी प्रिया रात रति से श्रान्त होकर गहरी नीदमेंसोरदीदहं > य्ह कल्क का रात कै साथ साद्य प्रतीत दोता हे वदी उपमाल्कार है ओर उससे वाच्या अपहृति का उपस्कार प्रतीत होतादहीहे।

[ अपहृति का अर्थं होता दै छिपाना इस अलंकार म॑ चमत्कारकारी तत्व यदौ छिपाना हे प्रस्तुत पच मँ कलंक का कल्कत्व “यह कलंक नदीं दै" इस निपेधोक्ति से छिपाया जा रहा दहै यह्‌ छिपाया जाना सादृद्य कै आधार पर ही संमंव दै अतएव याँ सादृद्य की व्यंजना होती हे ओर्‌ साद्रदय ही है उपमाल्कार 1 उसके द्वारा वाच्य ( राब्दतः कथित ) अपहुति अल्कार का उपस्कार या पोपण होता दै ]

त॒स्ययोभिता यथा =

“खयं ने द्विय॒णित उपधानभूत भुजा से सिरको; पुकित वक्षःस्थल से स्तनौ को, सुख से अर्धसमर्धित अधर को विंसी प्रकार विघटित किया ? य्ह चुजा आदि का सादृर्य प्रतीत दहोताहे इससे उपमालकार प्रतीत होता दै ओर उससे वाच्य ( तुल्ययोगिता ) का उपस्कार होता हे

[ जर्य एक ही धर्म मँ अनेक रेमे पदार्थो का अन्वय हो जिनमें प्रत्येक प्रस्त॒तदहदीदहौोया प्रत्येका अप्रस्त॒त ही वँ तुल्ययोगिता होती हे प्रस्त॒त पद्मं नायिका के समी अग प्रस्तृत हे ओर्‌ एवा विवरन क्रिया मेँ अन्वित होते है एकधमान्वयित्वरूपी साधम्यं के आधार पर उन सभी अंगो > साद्य कौ प्रतीति योती है सार्य उपमालकाररूप अतः यहो उपमाल्कार की व्यंजना मानी जाएगी ओर क्योकि उससे वाच्य ठस्ययोगिता का उपस्कार होता है अतः वह॒ भी अलंकार ही है ]

मूक जो “तुल्ययोगिता आदि मे" इस प्रकार आदि शब्द का प्रयोग किया गया दै उससे निदर्लनाटकार आदि किएजा सकते दहे ओर इसी प्रकार “उपमा आदि का" इस प्रकार जो

आदि पद्‌ का ग्रहण किया गया उससे उपमेयोपमा आदि उदाहरणार्थं ( निदर्शना मेँ उपमे- योपमा का उपस्कारकत्व ) यथा-“पर्यांप्त पवन वाले स्थान ( प्रवात ) मँ लगे हुए ( अतएव हवा की द्चंकोर मे द्चूरते हए ) नील कम में तनिक भी अन्तर रखने वाली अधौर चितवनयातो उस विद्चालनेत्रा ( पार्वती ) ने दिरनियो से खी होगी या ( वे्ती ही विदाना ) दहिरनियों ने उस पार्वती ) से 1” यँ ( पदार्थं ) निदशेना वाच्य हे, उसका उपस्वारक के रूप मे यों उपमेयोपमा प्रतीयमान है, क्योकि यदि उपमैयोपमा प्रतीत दो तो वाच्यः जिसमे याँ पदार्थौ का संबन्ध नदीं बनता, असंगत ही रहा आएगा इसलिए इस पद्य में मी अल्कार ही प्रतीयमान हे, वस्त॒ नीं निदा मे वाच्यार्थं रेसा रहता हे जिसमे पदार्थो का संबन्ध संमव नदीं होता, वाद ते उपमा द्वारा उसमे संगति लगाई जाती हें प्रस्तुत पमं सृगांगनाओं की चितवन उन्हीं भ्रगांगनाओं के पास है उते-पार्वती नहीं ठे सकतीं ओर पावेतौजी की चितवन पारवेतीजीकेही पास हे उसे मृगांगनाटे' नदीं ठे सकतीं, फलतः घ्वी दूसरे वगो चितवन का एकं दूसरे हारा कहा जा राह आदान संमव नहीं बाद मँ ये दोनों ही इन दोनो के समान हें एेसी साटृदयप्रतौति होती

भूमिका | १७

टं ता उत्त वाच्याथं सगत प्रतीत होता है उपमेयोपमा इसकिए व्यंग्य है किं यहाँ यह भी प्रतीति दोती हे कि इन दो चितवनों के समान कोई तीसरी चितवन नहीं है फलतः इस प्रकार के पूवे 'उपमेयोपमानन्वयाद्‌ः इस पद मं जो आदि शब्द आया है उसके उदाहरण के रूपमे लगने जो डस “प्रवातनीलो०ः आदि पद्य को उद्त किया वह ठीक नहीं, क्योकि उस प्रकरण में तो केवल वस्तुमात्र को व्यंजना का प्रतिपादन करना अभीष्ट रहादहै, अल्कार की व्यंजना का नहीं, “वाच्यो पस्कारकत्व- इस विदेपण को अगे भी जोड़ना चाहिए एेसा करने पर इस प्रकार क, अथे निकटेगा-““उस्प्रक्षा को जो वाच्योपरकारक कहा गया हैः इत्यादि वाच्योपस्कारक उत्प्रेक्षा का उदाहरण है- “महि लासहलभरिते तव हृदये सुभग ! सा अन्तीमा दिवसमनन्यकमां अगं तनुकमपि तनूकरोति” अधात्‌ “हे सुभग जिते कामिनियों चाहती हो ) तम्हारा हृदय सदस महिलाओं से भरा दे अतः वह वेचारी उसमें वन नहीं पाती, फलतः दिन भर अन्य कोड कायं नहीं करती, केवर पहले ते ही दुबे अपने ओंग को ओर दुवंल बनाती जा रही यदहो काव्यल्गाल्कार वाच्य दे क्याकिं हदय में नायिका के वनने का कारण यहाँ उक्तदहै। वह दहे हदय का सहस्र मदहिराओं से धिराहाना। उससे उ्प्रक्षाकी व्यंजनादहोतीदहे। वह इस प्रकार किं नायिका के नायक के चित्त मन वन पानेका मूल्कारणतो हे नायिका के प्रति नायक की राग्युन्यता, किन्तु उससे भिन्न ““मदिकासहस्रभरित्व' रूपी अन्य कारण वेसा होता बतलाया जा रहा है यह इई हेतूत्प्रेक्षा इससे वाच्य काव्यङ्िगि का उपस्कार होता हे। इसप्रकार अल्कार भी प्रतीयमान होकर वाच्य का उपस्कारक ( वाच्यदोभाधायक ) स्वीकार फिया गया हें

विमरिनी

अधुना रसस्यापि वाच्यो पस्कारकत्व दशेयितुमाह-रसवदित्यादि गश्ठतिशब्दादूजं- स्व्यादयः। आदिशब्दाच तदाभासादयः तच्र रसवदरुकारो यथा- रच्छ णो युगं व्यतीत्य सुचिरं श्रान्त्वा नितम्बस्थरे सध्येऽस्याखिवरीतरङ्गविषमे निस्पन्दतासागता मद्‌ दष्टिस्तृषितेव संप्रति हडानैरारुह्य तुङ्गो स्तनौ साकाङ्न्त॒ सुह रीत्तते जलरूलवप्रस्यन्द्नि रोचने ॥' अत्र वत्सराजस्य परस्परास्थावन्धरूपो रव्याख्यः स्थायिभावो विभावाजुभावव्यभि- चारिसंयोगाद्‌ रसीभूतः सन्‌ वाच्यो पस्कारकः तस्संव छितत्वेन वाच्यस्य सचमत्कार म्रतिपत्तेः अव रस को भी वाच्यां का शोभावधेक वतलाने कै किए लिखते हे-रसवदित्यादि प्रमृति | राब्द से उजस्वी आदि का ग्रहण अभिप्रेत है ओर आदि शब्द से उनफे आभास आदि उनमें से रसवदल्कार का उदाहरण है-“मेरी दृष्टि बड़ी कठिनाई से दोनो ऊरु पार कर॒ ओर नितम्ब- स्व चक्कर खाकर ज्या इस ( सन्दर वासवदत्ता ) के त्रिवरतरग से उवड़ खाबड मध्यभागं मं पहुची तो निस्पन्द हो गई फिर जिस किसी प्रकार वह धीरे-धीरे करके उत्त ग॒ स्तना पर चदा ता जव माना पियास होकर जललव वहा रही ओंखं वार-वार देख रह है ।› यहाँ वत्स- राज का परस्परम प्रेमरूपी रति नामक स्थायी भाव विमावानुभावव्यभिचासे के संयोग से रसरूपता को प्राप्त होकर वाच्य की शोभा वदाता है, क्योकि उससे युक्त होकर प्रतीत होने पर ही वाच्य मं चमत्कार प्रतीत होता है। {3

> अ०

१८ अलङ्कारसवस्वम्‌ विमरिनी

म्रेयोककारो यथा-- °तिष्टेस्को पव श्ात्म्रभावपिहिता दीवन सा कुप्यति स्वगांयोर्पतिता भवेन्मयि पुनर्मावाद्र॑मस्या मनः। तां हतं विद्ुधद्विषोऽपि चसे शक्ताः पुरोवर्तिनीं सखा चाव्यन्तमगोचरं नख्नयोयार्ते कोऽयं विधिः ॥' अत्र वितर्काख्यो व्यभिचारिभावो वाच्यश्लोभाधायक एव) ्रेयोऽकंकार जेसे-( उवंशी के र्तारूप से परिणत हो जाने पर पुरूरवा वितकँ करता है) हो सकता हं वह॒ ( उकेरी अपने ) प्रभाव ( देवी होने के कारण तिरस्करिणी विद्या) से कहीं दिपी दहो, विन्तु वह अधिक देर तक तो कुपित रहती नहीं संभव दं वह ( अपने मूलस्थान ) स्वरी कै लिए उड़ गईं हो, किन्तु उसका मन तो सानुराग दे युद पर मेरे देखते-देखते उसे राक्षस क्ोग भी नहीं हर सकते इतने पर भी वह आंखो से एकदम ओञ्चल दो गईं दं आखिर यह घटना क्या हे ।? यदा वितर्कनामक संचारी भाव व्यंजित होकर वाच्य की योभा वढातादै। विमरिनी उज॑र्यलंकारो यथा- ्‌ "टग्टीरासु सकौतुकं यदि मनस्तन्मे दशां विंशति. ्निःसंधो परिरम्भणे रतिरथो दोमण्डटी दृश्यताम्‌ म्रीतिश्वेत्परिचम्बने दशयुखी वदेहि ! खजा पुर पौलस्स्यस्य राघवस्य महः्पश्यो पचारान्तरम्‌ ॥° अत्र. सीतां प्रति रावणस्य रतिरनोचिव्येन प्रवृत्तेति रसाभासो वाच्यो पस्कारकः। यत्त स्वयसभ्यूद्यम्‌ ऊजैस्वी अटंकार जंसे--( रावण कौ भगवती सीता के प्रतिं दुषटोक्ति )--“हे सीता, यदि तेरा मन ओंखां की चेष्टाएं पसन्द करता हं तो मैरे पास बीस ओंखं हं, यदि तुञ्चे गाढ आखिगन पसन्द दै तो देख भैरी वीस भुजाएं हं आर यदि तञ्च चुम्बन पसन्ददहोतो उसकेकिएमीसे पास दस सुखँ इस प्रकार परे उपचारकी इष्टिसे भी मैरे जर रासे वीच, देख, कितना मारी अन्तर दे ।” यँ ( अननुरक्त परख्ी ) सीता कै प्रति रावण का रतिनामक स्थायी भाव व्यंजित होता है फलतः यह ॒रसामास हजा ओर ( क्योकि ) यह यद्यं वाच्यार्थं की रोमां ` वदा रहा है इसटिए ऊज॑स्वी अरुकार हआ अन्य ( समाहितादि अल्कार ) के उदाहरण काव्य प्रकाद्चा आदि मेँ ) स्वयं खोजे जा सकते हं |

विमरिनी

एतदेवोपसंहरति--तदित्थमित्यादिना त्रिविषमिति पयायोक्तादौ वस्तु, रूपकाद्‌ाव- रकारः, रसव दादौ रसः तदेवं चिरंतनः प्रतीयमान स्यारंकारान्तर्भाव एव तावटुक्तः तदुपस्का्यः पुनरादमा कैश्चिद्‌ पि नाभ्युपगतः | ^तदिस्थम्‌ = तो इस प्रकार?” इत्यादि दारा इस प्रकरण का उपसंहार करते है तीनो

प्रकार का अर्थात्‌ ( प्राचीनं ने ) पर्यायोक्तादि मे वस्तु, रूपकादि मे अट्कार ओौर रसवदादि अलंकारो मे रस (वाच्योपस्च्छारक्छ स्वीव्छार च्छियि\ दे ) इस प्रकार ( वस्तु अल्कार ओर रस तीनां

भूमिका | १९

प्रकार का प्रतीयमान अथं ) प्राचीनां ने अल्कार के ही वीच अन्तभूंत बतलाया है क्योकि उनके मत में तीनों ही प्रकार का वद अथं ( रूपक, उपमादि कै ही समान ) वाच्य का शोभाधायक होता दे ( ध्वनिवादी आचार्यो के समान ) इन प्राचौन आचार्यो मंसे किसीने भी वाच्यको उपस्कारक ओर प्रतीयमान को प्रधान ( आत्मभूत ) स्वीकार नदीं किया हे

[ अच्छा होता कि विमरिनौकार रसवत्‌ आदि कैवे ही उदाहरण प्रस्तत करते जो रद्रट आदि ने दिए दैः जेसा कि उन्होने भावालकार के प्रकरण में किया है। श्री रामचन्द्र दिवेदयी ने “रुद्रटेन तु" इस प्रसंग पर एक रिप्पणी देते हए लिखा हे--“प्रतीयमान अथै वस्तु अल्कार तथा रसरूप से तीन प्रकार का होता हे प्रतीयमान वस्तु-रूप अथे कीं गुणीभूत होता है ओर कहीं प्रधान इन दोनों प्रकार के अर्था का भावार्कार मे, उपमा आदि प्रतीयमान अकुकार का रूपक दीपक आदि अल्कारों मे तथा रस, भाव आदि का रसवत्‌ प्रेय आदि मे अन्तभाव रुद्रट ने किया हे 1

इसमे “रुद्रटः? के स्थान पर “रुद्रगादिः पद्‌ चाहिए रुद्रटने केवर भावाल्कारकेदो भेद अवदय प्रस्त॒त किए हें विन्तु रस, भाव का रसवत्‌ प्रेय आदि में अन्तभाव नहीं दिखाया भामह ओर उद्भट ने अवदय इनका प्रतिपादन किया हे

वस्तुतः “इह हि० से लेकर ‹शच्रिविधमपि प्रतीयमानतया ( ख्यापितमेव ) यहं तक वक्तव्य ओर प्रधटरक एक हीदहे। श्री द्विवेदी ने शुद्रटेनः से उसमे अन्तर कर दिया है उन्होने पाठ मी इसलिए स्वतन्त्र वाक्य के ही अनुरूप “रुद्रटेन तु द्िषैवोक्तः टसा स्वीकार किया है ]

वामन [ पूर्वोक्तं आचार्यो से कुछ अगे हे उन्दोने ] प्रतीयमान को अल्कार मे अन्तत दिखाते हए भी उससे उपस्कायं ( अल्कायं ) भूत एक आत्मा भी स्वीकार की है” इस तथ्य कौ स्पष्ट करते हये आगे कहते हे-- 'वामनेनेत्यादि ~ |

[ सवसव |

वामनेन तु सादश्यनिवन्धनाया लश्चणाया वक्रोक्त्यटंकारत्वं जवता कश्िद््‌ध्वनिमेदोऽटेकारतयेवोक्तः। केवट गुणविशिएटपदस्चनात्मिका रीतिः कान्यात्मकत्वेनोक्ता

उद्भ खादिभिस्त गुणालंकाराणां पायशः साम्यमेव सूचितम्‌ विषय- माचेण भेदप्रतिपादनात्‌ संघटनाधमत्वेन चेष्टः तदेवमलकारा एव काव्ये प्रधानमिति प्राच्यानां मतम्‌

काव्याल्कारसूत्रदृत्तिकार ›) वामन ने तो [ साददयाच्लक्षणा वक्रोक्तिः" इस प्रकार साटृरय- मूलक लक्षणा को वक्रोक्तिनामक अलंकार कहते इए ध्वनि का एक [ अविवक्षितवाच्य | भेद [ स्वीकार किया है किन्तु उसे भी उन्होने ] अरुकाररूप ही बतलाया हे [ क्योकि वक्रोक्ति एक अलकार ही हे ] काव्यकौी आत्मा उन्होने गुणविरिष्ट-पदरचनास्वरूप रीति को ही कहा हे

, उद्भट ने गुण ओर अलंकारो का प्रायः साम्य ही बतलाया है [ उनके मत में दोनों ही, काव्य मे समवायसम्बन्ध से ही रहते है, अलंकार संयोगसंबंध से ओर केवर गुण समवाय संबन्ध से नहो, वह तो रोकिक पदार्थौ की स्थिति है द्रष्टव्य = कान्यप्रकाशउर्लास ] भेद उनम केवर इसङ्ए माना गया है कि दोनों के विषय मे भेद है ओर गुण संघटना का धर्म माना गया है इस प्रकार प्राचीन आचार्यौ के मत मे कान्य में अल्कार ही प्रधान है।

= ` ` का चा "क नि --

२० अलटद्कारसवंस्वम्‌ विमदिनी वामनेन प्रतीयमानस्यारंकारान्तर्भावमभिदधतापि तदु पस्कायं आत्मा कश्चिदुक्तः इत्याह--वामने नेत्यादि तुशब्दः पूर भ्यो व्यतिरेकद्योतकः ! आत्मनोऽपि ग्रतिपाद्‌ कस्वात्‌ व्रवतेति यदह--"सादश्याच्चत्तणा वक्रोक्तिः इति एतदेवोद्‌ाजदहार "“उन्सिसील- कमर सरसीनां कंरवं निमिमील सुहूतम्‌' इति कथिदध्वनिभेद इति (अवि वक्सित- वाच्यादिःः केवलमिति यदि परमिव्यथंः। गुणेति यदाह-विरिष्टा पद्‌- रचना रीतिःः इति काव्यात्मकत्वेनेति यदाह- रीतिरात्मा काव्यस्येति काव्यव्वे- भयुपगताया रीतेः “तद्‌ तिश्यदहेतवस्व्वरंकाराःः इत्यायक्त्यान्तभावितध्वनयोऽलंकार! उपस्कारका इत्येतन्मतम्‌ | यँ तु ( तो ) चाब्द पूर्वोक्त आचार्यो से अन्तर का चयोतक दहे क्योकि वामन ने काव्यात्मा क्ाभी ग्रतिपादन कियाद कहते ष्ट साक कटा दह ““सद्र्यसे दाने वाटी लक्षणा वक्रोक्ति इसी पर उदाहरण भी दिया दै--“तलेयो के कमल उन्मीलित दो गए ओर कुसुद निमीलित [ यदह उन्मीकन ओर निमीलन लाक्षणिक हं | ध्वनि का एक कोड अद्‌ = अविवक्षितवाच्यरूप केवर का अर्थं है यदि परम्‌=किन्तु गुण इत्यादि जेसा कि कहा दे--“विरिष्ट पद्‌ रचना रौति दै" काव्यात्मकव्वेन-जेसा किं कदा दै-- “रीति काव्य कौ आत्मा इस प्रकार वामनकामत हे कि “विदिष्ट पदर चनारूप रीति काव्य को आत्मा हः ओर [गुर्णो से उत्पन्न | काव्यदोभा मे अति राय लाने वाले तच्च अलकार कहलाते हं" इस प्रकार से छक्षित अल्कार्‌ उस (रोति) कै उपस्कारकं

( योभावधक ) होते हं"?

विमरिनी अन्यैः पुनरेतदपि प्र्युक्तमिव्याह--उद्धटादिभिरित्यादिना प्रायद्ा इदि बाहुल्येने. व्यर्थः विषयमात्रेणेति भिन्नकच्याणां द्य पस्कायो पस्कारकत्वस्यानुपपत्तेः तथाव्वे

चारंकाराणामपि गुणो पस्कायंस्वं प्रसज्यते समानन्यायव्वात्‌ तद्गुणारुकाराणां तुस्य- त्ववादिन एवौद्धटाः। इत्थमनेन वाच्याश्रयाणामरूकाराणां मध्य एव ध्वनेरन्तर्भावा- दसिधाग्यापारगोचर एव ध्वनिः, पुनस्तद्वयतिरिक्तः कश्चिद्‌ ध्वनिर्नामेति चिरंतनानां मतसिव्युक्छम्‌

ददानीं यदुप्यन्यैरस्य भक्त्यन्तभूतस्वमुक्तं॑तदपि दंशंयितुमाह--वक्रोक्तीत्यादि

द्सरों ने तो इतना भी स्वीकार नदीं किया इस वातकोौ वतलने के ङि छिखते है-- “उद्धर? आदि प्रायः अर्थात्‌ वहुधा विषयमेदमात्रेण विपयमात्र कामद्‌ [ गुणों का विषय है श्लोभा- जनकता ओर अलंकारो का दोभावर्धकताः, किन्त इन दाना को प्रतीति एकदही साथ होती है] अलग-अलग समय मं प्रतीति होने पर [ युण हा उपस्काय ओर्‌ अल्कार्‌ हा उपस्कारक्‌ एेसा | उपस्काया पस्कारकभाव सम्बन्ध नदीं बनेगा; वसा मान्न पर्‌ | गुण मा उल्कारों के उपस्कारक ओर अल्कार भी गुणो कै उपस्कार्यं माने जा सकेये क्य।कि स्थिति दोनो समान है [ अर्थात्‌ पूववन्तीं जसे परवत्ता का उपस्कारक माना जाता हे वेते ही परवत्ती मी पूववत्ती का उदाहरण यथा गुणीमूतव्यंग्य मेँ प्रतीयमान का वाच्याथं कै प्रति उपस्कारक होना] इस कारण उद्धटनुयायी गुण आंर अल्कारां मं समानता ही मानते दह

दस प्रकार यों तक के मन्थ द्वारा यह प्रस्त किया गया किं प्राचीन आङंकारिक प्रतीयमान

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भूमिका २९

अथं को अभिधावृत्ति का विषय ही मान ठेते हे, उससे भिन्न नदी, क्योंकि उनके अनुसार उपमादि अन्य अल्कारो के दही समान ध्वनि भी अर्थ॑का ही एक अलंकार हे।

अव वक्रोक्तिः इत्यादि अथिम यन्धमं आचार्योँने जो प्रतीयमाना को भक्ति ( उपचार- वक्रता ) में अन्तभूत माना हे उसे बतलाते है--

| सवंस्व ]

वक्रोक्तिजीवितकारः पुनवेद्ग्ध्यभङ्गीभणितिस्वभावां बहुविधां वक्रोक्ति मेव प्राधान्यात्काव्यजोीवितसु क्तवान्‌ व्यापारस्य प्राघान्यं | काव्यस्य | प्रतिपेदे अभिधानय्रकारविरोषा प्व चाटकाराः सत्यपि जिभेदे पभरतीय- माने व्यापाररूपा भणितिरेव कवि संरम्भगोचरः उपचारवक्रतादिभिः समस्तो ध्वनिप्रपञ्चः स्वीरृतः केवलसुक्तिवेचिच्यजीवितं काव्यं, व्यङ्ग्याथेजीवितमिति तदीयं देनं व्यवस्थितम्‌

वक्रोक्तिजीवितकार कुन्तक ) ने वक्रोक्ति को काव्य का जीवित मानादहै। वक्रोक्ति को उन्दने “वेदग्ध्यमङ्गीभणितिः-- स्वरूप कहा है ओर उसके अनेक सेद वतलाए है वक्रोक्ति को काव्य का प्रधानतच्व मानने के लिए ) उन्होने यह भी प्रतिपादित कियादहेकि काव्यम व्यापार तत्तव भी प्रधानतत्व हं ( उनके मत मं ) अरुंकार अभिधान ( कथन, उक्ति) के ही विरिष्ट-विरिष्ट भेद हं ( साथ ही ) काव्य मे ( वस्तु, अलंकार ओर रस ) ये तीनों प्रकार के प्रतीयमान अथं रहते

अवद्य हं किन्तु कवि का संरम्भ ( जोर, अधिक ध्यान ) व्यापारस्वरूप भणिति ( उक्ति) पर ही रहता हं ध्वनि के अन्य अवान्तर मेदो को भी [ उन्होने ] उपचारवक्रता के अन्तरगत स्वीकार कर चखियादहं। [ इस प्रकार संक्षेप मे ] उन [ वक्रोक्तिजीवितकार ] का सिद्धान्त केवल इतना ही है कि “काव्य का प्राण ( प्रधानताव ) उक्तिवेचित्रय ही है, व्यंग्यार्थं नदीं

विभरिनी

वैदग्ध्येस्यनेन वक्रोक्तेः स्वरूपसुक्तस्‌ दाह-“वक्रोक्तिरेव पैदश्ध्यभङ्गीभणितिरूच्यतेः इति एवकारोऽन्यस्य काभ्यजीवितस्वग्यवच्छेद्कः काञ्यजीवितमिति काव्यस्यानु प्राणकमस्‌ तां विना काव्यमेव स्यादित्यर्थः यदाह--विचिन्नो यन्न वक्तोक्तितचिन्यं जीवितायतेः इति व्यापारस्येति कविप्रतिभोल्ञिखितस्य कर्मणः कविप्रतिभानिर्वति- तत्वमन्तरेण हि वकरोक्तिरेव स्यादिति कस्य जीवितत्वं घटत इति तद्‌ षक्तमेवान्वा- स्यात्र प्राधास्यं विवक्षितम्‌ अतश्च द्वयोः प्राधान्यस्य दुर्योजव्वमच्र नाशङ्कनीयम्‌ “वदर्ध्यभङ्गीभणितिः यह वक्रोक्ति का लक्षण हे, जेसा कि ( कुन्तक ने कारिका में ) कहा दै- उभावेतावल्कायोँ तयोः पुनर ल्करतिः

वक्रोक्तिरेव वेदग्ध्यभंगीभणितिरुच्यते ॥” १।१० कारिका ओर अर्थं अलंकाय है, ओर उन दोनों का अलंकार है कैवल वक्रोक्ति जिसका स्वरूपं है “व दरध्यभङ्गीमणितिः' = अर्थात्‌ वैदग्ध्य के कारण भंगिमा बोँकपन ) के साथ बोलना (कैव वक्रोक्ति” इस प्रकार केवर खाब्द कै प्रयोग का अथ है कि अन्य कोई तत्व कान्य का जीवातु नदीं हो सकता काव्यजीवित शाब्द का अर्थं है वह तत्त्व जो काव्य को अकाव्य से सिन्न कर ) काव्यत्व प्रदान करे फलतः आद्य यदह हुआ कि वक्रौक्तिके विना काव्य कान्य ही नहीं हो सकैगा जसा किं ( कारिका मेँ कुन्तक ने ) कहा भी है-“बिचित्र [मागं] वह है जिसमे वक्रोक्ति की

कुया

२२ अलङ्ारसवस्वम्‌

विचित्रता जीवन (या मप्राण) का काम करती दै [ कारिका १।४२ | व्यापार अथात्‌ कवि- प्रतिभा से उल्लिखित क्म वक्रोक्ति तब तक वक्रोक्ति दी नदीं हो सकती जव तक वद्‌ कविप्रतिभा से निष्पन्न हो ओर जव वह वक्रोक्ति दी सिद्ध नदीं हो सकेगी तव उसमें कान्यजीवितत्व केसे संभव होगा ! इसकल्टि यहां जो व्यापार की प्रधानताकी वातकी जा रीदे वह वक्रोक्तिकी प्रधानता की वात को ध्यान में रखकर दी की गदं दे, “इसलिए एक दी काव्यम दो कौ प्रधानता कखिन दै" ेसी डंका नदीं करनी चादिए विमज्लैः-निणेयसागर ओर ॒मोतौकाल्वनारसीदाससंसकरण मे यद्‌ मूल छपा हे ¢व्यापारस्य प्राधान्य काव्यस्य प्रतिपेदे” इसमे या तो “व्यापारप्राधान्यं काव्यस्य प्रतिपेदे” णेसा पाठ दोना चादिट जसा कि संजीविंनीकार ने स्वीकार कियादहै, या फिर “न्यापारस्य प्राधान्यं प्रतिपेदेःः ेसा अथात्‌ या तो व्यापार शब्द से षष्ठीविभक्ति दटादं जानी चाहिए या “काव्यस्य? यदह पद विमर्दनी में “न्यापारस्येतिःः रेसा प्रतीक दिया हृ दै अतः उसके अनुसार “कान्यस्य दाब्द दी अधिक है 1 दसकिएं हमने उसे कोष्ठक में डा दिया दें वक्रोक्तिजीवितकार ने एक वार वक्रोक्ति को प्रधान बतलाया ओर एक वार व्यापार को। इसकी संगति र्गाते हए विमरदिनीकार ने छ्खिा किदे व्यापार का अथं कविप्रतिमागत व्यापार है। यदि वह दहो तो वक्रोक्ति मेँ वक्रोक्तित्व दी निष्पन्न हो क्योकि कविप्रतिभा जिसमें नदीं रहती उसकी उक्ति में वक्रता नहीं आती फलतः साध्यसाधनमाव होने ते दोनो कौ प्रधानता मानी जा सकती है, वस्तुतः रहती तो प्रधानता केवल वक्रोक्तिकीदहीहे। हमारी समञ्च मेँ टीकाकार की एेसी संगति निरापद नदीं वक्रोक्ति उक्तिःरूप हे ओर उक्ति कृथन व्यापार हे, फलतः कान्य मे यदि वक्रोक्ति प्रधान हेतो इसका निषेध नहीं किया जा सकता कि व्यापार मी प्रधान है। व्यक्तिविवेककार आदि कै अनुसार कन्तक को व्यापार का अथं अभिधादृत्ति जेसी वृत्ति दी यदा मान्य है समुद्रवन्ध ने भी भटनायक ओर वक्रोक्तिजीवितकार को व्यापारप्राधान्यवादी आचाय माना 1, यददो व्यापार को अभिधादिरूप व्यापार स्वीकार करने पर ही उसका खण्डन मी कियाजा सक्ता दे क्योकि "कविप्रतिमाव्यापारः की प्रधानता काव्य में अस्वीकार नदीं कौ जा सकती आनन्दवदनाचायं इसीलिए प्रतीयमान अथं की व्यंजकं पदावखी ( सरस्वती ) मं अलौकिक ओर विदिष्ट प्रतिभा का परिसरण स्वीकार करते है-- सरस्वती स्वादु तद्वस्तु निष्यन्दमाना महतां कवीनाम्‌ अखोकसामान्यममिन्यनक्ति परिस्फुरन्तं प्रतिभाविदशेषम्‌ उ्योत १। “प्रतिमा का उन्मेष ही विश्व का उन्मैष है" एेसा अभिनव गप्र भी मानते है-- “यदुन्मीलनदकत्येव विरवसुन्मीरुति क्षणात्‌

प्रत्येक आचार्यं ने काव्य कै प्रति प्रतिमा कौ प्रधान कारण मानादीदहे। विमदिनीकार के मत मै व्यापार चरव्द का अभिधा अर्थं करने मजो आपत्ति है वह यही है

कि कथनव्यापार कण्ठताल्वादि के अभिघात से होने वाखा उच्चारणरूपी व्यापार है ओर वक्रोक्ति

अङरुकाररूप है अरंकार उच्चारणरूप नदीं दे, फलतः कथनव्यापार या उक्ति भी उन्हे नहीं कहा जा सकता किन्तु अन्धकार अलंकार को व्यापारस्वरूप ओर उक्तिरूपव्यापारस्वरूप बतला सटा है, फलतः उन्दने व्यापार को कविप्रतिभान्यापारपरक माना ओर शंका को निम किया परन्तु एसा करते इए वे यह्‌ भूर गये किं उन्टें पूव॑पक्च पर विचार करना है जो खण्डनीय है

यहाँ यह भी विचारणीय है कि कुन्तक ने अलंकार के। अभिधाव्यापार स्वरूप माना हैया नदीं इमे वक्रोक्तिजीवित मे एक भी णेसा स्थर नहीं मिला जहां अलंकार को अभिधात्मक कहा

भूमिका

गया हौ उन्हें असिधेय अवदय कहा गया है किन्तु व्यक्तिविवेककार ने ध्वनिरक्षण का खण्डन करते इए ध्वनिकारिका मे शब्द ओर अथ॑के दही समान अभिधा को भी शब्दतः उपादेय बतलाया दं ओर लिखा दे-

"किच यथा अभिधेयोऽथेः तद्विशेषण चोपात्त तदवदमिधाप्युपादानमहंत्येव, अन्यथा य॒त्र दी पकादेरल्कारादल्कारान्तरस्योपमादेः प्रतीतिस्तत्र ध्वनित्वमिष्टं स्यात्‌ , तल्लक्षणेनाव्यासेः अटकारार्णा चाभिधात्मत्वसुपगत तेषां भङ्गोमणिति-भेद रूपत्वात्‌ [ हिन्दीव्यक्तिविवेक पृष्ठ २२ |]

व्य॒क्तिविवेक के टीकाकार जो अलंकारसवंस्वकार से अभिन्न हें नेइस प्रकरण.पर भी अल्कारोंकी अभिधात्मकता पर उयंजनावादी कौ ओर से आक्षेप किया है। हमने चौखंभा से प्रकारित अपने हिन्दीव्यक्तिविवेक में यह अंडा भटीभोति स्पष्ट कर दिया हं उसे वहीं से देख लेना चाहिए

विमरिनी

अलंकारा इति तेनोक्त इति दोषः एव कारश्िरं तनोक्तभ्व निग्रकार विशेषव्यवच्छदकः ¦ सत्यपीति सदपि प्रतीयमानमनाद्व्येत्यथेः व्यापाररूपेति वक्रस्वभावेव्यथंः भणिति- रिव्युक्तिः कवीति तत्रेव कविः संरब्ध इत्यर्थः तत्संरम्भसन्तरेण हि वक्रोक्तिरेव स्यात्‌ नु प्रतीयमानस्यानादरः किमभावस्रुखेनान्यथा वा करत इत्याशाङ्कयाह-उप- चारेत्यादि उपचारवक्रतादी नामेव मध्ये ध्वनिरन्तभूत इति तातप्यार्थः यदाह-

“यत्र दूरान्तरेऽन्यस्मात्सामान्यसुपचर्यते खेदो नापि भवेत्करहु किचिदुदिक्तद्तितास्‌ यन्मूखा सरसोल्रेखा रूपकादिररंङ्ृतिः उपचारग्रधानासौ वक्रता काचिदिष्यते ॥› इति

एतासेबोदाजहार च- गअणं मत्तसेहं धाराटङ्ि जज्जुणाइं वणाद निरहकारमिअङ्को हरन्ति नीलखाओ गिसाो ॥'

अत्र मद्निरहंकारस्वे ओपचारिके इप्युपचारवक्रता आदिपदेन क्रियावक्रतादीनामपि हणम्‌ एवं सर्वोऽपि भ्वनिग्रपञ्चो चक्रोक्तिभिरेव स्वरतः सखन्स्थत एव यदि परं तस्य प्राधान्यमेव नास्तीव्याह - केवलमित्यादि तदीयमिति वक्रोक्तिजीवितकारसं बन्धी- व्यथः तदित्थं छत्तणामूरूवक्रोक्तिमध्यान्तर्मावाद्‌ध्वनेरेवे त्वं भरतिपादितस्‌ अकार = वक्रोक्तिजीवितकार दारा प्रतिपादित अल्कार। ५अरूकार अभिधारूप ही ह” यद्य “ही चान्द द्वारा इसका खण्डन किया गया कि अरुंकार भेदप्रभेदरूप से ध्वनि मे अन्तभूत हो

सकते हं सस्य पि अथात्‌ भले हौ तीन) ही प्रकारका प्रतीयमान अथै स्वीकार कर च्या तवमी.

कवि का आदर उसमे नदीं रहता दै व्यापाररूपा = वक्रस्वभावा भणिति = उक्ति कविसं० = अथ यह किं कवि मुख्यतः व्यापाररूप वक्रमणिति में ही प्रयत्नरीरु रहता है! क्योकि कविसंरंम यै विना कोड भी उक्ति वक्रोक्ति ही नहीं बन सकती ? |

प्रन उठता हं कि प्रतीयमान अथै का अनादर वक्रोक्तिकार ने किस प्रकार से किया है १उसका अभाव मानकर अथवा ओर किसी प्रकार से ? इस पर उत्तर देते हए छिखते है--उपचार आदि इसका तात्पयं यह कि ध्वनि को उपचारवक्रता जादि मे ही अन्तक्त मान च्याहै। जेसाकि वक्रोक्तिकार ने कदा है-“ज्होँ अन्य गुणों के कारण ) अत्यन्त भिन्न प्रस्तुत ) पदार्थं मे किसी भिन्न ( अप्रस्तुत ) पदाथ का सामान्य ( साधारण ) धमं भले ही वह बहुत ही छोटा क्यो हो,

इसलिए प्रतिपादित किया जातादहै किउस वर्णनीय प्रस्तुत पदाथ मे अतिदरायआ सके, उसे

< अचङ्ारसवस्वम्‌

उपचारवक्रता कहा जाता दे अत्यन्त सरस रूपकादि अलंकार का मूर यदी उपचारवक्रता होती हे 1? [ १।१२,१४ कारिका वक्रोक्तिजीवित ] ओर उदाहरण मी दिया दै-- “गगनं मत्तमेघं धाराडलिताजं नानि वनानि निरदंकारम्रगद्का हरन्ति नीलाश्च निदाः

अर्थात्‌ मत्त मेरा से युक्त आकाश, [ मैषसुक्त ] जलधाराओं से धुले अजजैन बृक्षवाले वन, तथा अहकारन्य चन्द्रमावाली नीटखी निराएटं भी चित्त आक्रष्ट करती हें [ गउडवह ] यदा मेघा मे भद" ओर चन्द्रमा “अहंकारशयल्यता' उपचरित ( अर्थात्‌ मैव तथा चन्द्र मँ नदो से युक्त ओर हतग्रम व्यक्तियों के साष्टद्य के कारण प्रयुक्त ) दै अतः यदद उपचारवक्रता (है। आदि राब्द से क्रियावक्रता) आदि भेद किए जा सकते ( क्रियावक्रतामं भी कुन्तकं ने 'उपचारम- नोज्ञता-' नामक मेद वतलाया हे ( द्रष्टव्य-वक्रोक्तिजीवित पृष्ठ २६६ विश्वेश्वर संस्करण ) इस प्रकार ध्वनि का संपूणं प्रपंच सिन्न-सिन्न वक्रोक्तियों के नाम से अपना ख्या गयादहं, परन्तु उसका ग्राधान्यमाच्र स्वीकार नदीं किया गया है इस तथ्य को कदने के किष छिखा = “केवर? इत्यादि तदीय = अर्थात्‌ वक्रोक्तिजीवितकार का इस प्रकार ङन्तकः ने वतलाया तौ धवनि-तत्वं ही किन्तु स्वतन्त्ररूप से नदीं अपितु क्षणामूल्कवक्रोक्ति के मेद नं अन्तभूंत करके

विमद -विमरिनी के निगयसागर संस्करण “मदनिरहकारत्वे आपचा।रक इत्युपचारवक्र- तादीनामपि ग्रहणम्‌” एेसी पंक्ति छपी दे। यहां “उपचारवक्रता?ः के पश्चात्‌ “आदिपदेन `` वक्रता- दीनामपि ग्रहणम्‌? यह अदा अवदय ही रहा कदाचित्‌ सुद्रणमंद्ृट गया हदं उपचारवक्रता कै वाद कन्तक ने “विदोषणवक्रता का निरूपण किया हं किन्तु उसमं उपचार ( लक्षणा ) काम में नहीं आता अगे क्रियावक्रता “उपचारमनोज्ञताः आदि मद मेदी वह काम में आती दहे अतः दमने थवक्रतादीनाः” की पत्ति फक्रियावक्रतादीनांः इस प्रकार कर दीदे दस विषयमे संजीविनी से कोड प्रकार नदीं मिता

विमद्िनी

कशिदप्यस्य वागविषयव्वाद छन्तणीयत्वजुक्तमिव्याद--भट्नायकेत्यादि

“वु आचार्यो ने ध्वनि को वाणी का अविषय = अनिव॑चनीय ओर इसलिए अलक्षुणीय कहा हे" उस विषय को प्रस्तुत करते हए कते है यक आदि

[ स्वस्व ]

भट्टनायकेन तु व्यङ्गयव्यापारस्य पोटोकत्याभ्युपगतस्य का्व्यारात्व॑ ब्रुवता न्यग्भावितशब्दाथस्वरूपस्य व्यापारस्येव भ्राघान्यसुक्तम्‌ तत्रा- प्यभिघाभावकत्वलक्चषणभ्यापारदयोत्तीणो रसचवणात्मा मोगापरपर्यायो

व्यापारः प्राघान्येन विश्रान्तिस्यानतयाङ्गीकृतः

मट्नायक ने व्यंग्यव्यापार कौ स्वीकार तो किया हे किन्तु उसका लक्षण नहीं किया ओर उत्ते ( स्वरूपतः स्वीकार करके भी ) काव्यका अद ( ही) वतखाया दे, ( उन्होने) प्राधान्य माना हेव्यापारका दी तथा दाब्दं ओर अ्थंदोनों को उस (व्यापार ) की अपेक्षा गुणीभूत ओर अप्रधान (दवा हृजा ) बतलाया है। व्यापारो में भी इन्होंने) अमिधा ओर भावकता नामकं दो व्यापार से उनके अगे आने वाला भोगनामक रसचव॑णास्वरूप व्यापार ही प्रमुख रूप सै हृदयविश्रान्तिकारी माना हे

इन कव अनि प्कककक ` करचक्रमाकरक चकता तः वहः

भूमिका २५ विमरिनी

प्ौटोक्त्येति। पुनर्छच्णकरणेन अत एवोक्तेः प्रौढत्वं यज्ञच्तयित॒मशक्येस्तस्याप्यभ्यु- पगमः ! काव्यांदत्वसिति पुनः काव्याव्मव्वम्‌ यदाह- ^ध्वनिर्नामापरो योऽपि व्यापारो व्यञ्जनात्मकः तस्य सिद्धेऽपि सदे स्यात्काव्यांात्वं रूपिता ॥‡ इति

व्यापारस्येत्ति। कविकमंणः 1 अन्यथा शब्दम्रधानेभ्यो वेद्‌ादिभ्योऽथंप्रधानेभ्यश्चति- हासादिभ्यः काव्यस्य वे रचण्यं स्यात्‌ यद्क्तम्‌- “शब्द्‌ प्राधान्यमाधित्य तत्र शाख परथणग्विदुः जथंतच्वेन युक्तं तु दन्त्याख्यानमेतयोः द्वयो गणस्वे व्यापार प्राधान्ये काव्यधी भवेत्‌? इति तत्रापीति कविकमंरूपस्य व्यापारस्य प्राधान्ये सव्यपीव्य्थः। अभिधा भावना चान्या तद्धोगी कृतिरेव च' इति काव्यं तावत्‌ ज्यश्च तेनोक्तस्‌ तत्रापि- (असिधाधासतां याते शब्दार्था्क्ती ततः ावनाभाव्य एषोऽपि शङ्ारादिगणो सतः इत्य शद्ुयस्य विषयं प्रतिपाद्य “वद्धो गीङ्कतिरूपेण उयाप्यते सिद्धिमान्नरः' इति तृती. योऽरः सहृदयगतस्तदंशद्वय चवेणात्मा ्दश्यमानाथ